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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 10 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - असुरः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - पाशविमोचन सूक्त
    217

    अ॒यं दे॒वाना॒मसु॑रो॒ वि रा॑जति॒ वशा॒ हि स॒त्या वरु॑णस्य॒ राज्ञः॑। तत॒स्परि॒ ब्रह्म॑णा॒ शाश॑दान उ॒ग्रस्य॑ म॒न्योरुदि॒मं न॑यामि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒यम्‍ । दे॒वाना॑म्‍ । असु॑र: । वि । रा॒ज॒ति॒ । वशा॑ । हि । स॒त्या । वरु॑णस्य । राज्ञ॑: ।तत॑: । परि॑ । ब्रह्म॑णा । शाश॑दान: । उ॒ग्रस्य॑ । म॒न्यो: । उत्‍ । इ॒मम्‍ । न॒या॒मि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अयं देवानामसुरो वि राजति वशा हि सत्या वरुणस्य राज्ञः। ततस्परि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिमं नयामि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अयम्‍ । देवानाम्‍ । असुर: । वि । राजति । वशा । हि । सत्या । वरुणस्य । राज्ञ: ।तत: । परि । ब्रह्मणा । शाशदान: । उग्रस्य । मन्यो: । उत्‍ । इमम्‍ । नयामि ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 10; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    वरुण का क्रोध प्रचण्ड है।

    पदार्थ

    (अयम्) यह (देवानाम्) विजयी महात्माओं का (असुरः) प्राणदाता [वा प्रज्ञावान् वा प्राणवान्] परमेश्वर (विराजति) बड़ा राजा है, (वरुणस्य) वरुण अर्थात् अति श्रेष्ठ (राज्ञः) राजा परमेश्वर की (वशा) इच्छा (सत्या) सत्य (हि) ही है। (ततः) इस लिये (ब्रह्मणा) वेदज्ञान से (परि) सर्वथा (शाशदानः) तीक्ष्ण होता हुआ मैं (उग्रस्य) प्रचण्ड परमेश्वर के (मन्योः) क्रोध से (इमम्) इस को [अपने को] (उत् नयामि) छुड़ाता हूँ ॥१॥

    भावार्थ

    सर्वशक्तिमान् परमेश्वर के क्रोध से डर कर मनुष्य पाप न करें और सदा उसे प्रसन्न रक्खें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−अयम्। पुरोवर्ती। देवानाम्। १।४।३। दिव्यगुणवतां विदुषाम्। असुरः। असेरुरन्। उ० १।४२। इति असु क्षेपे-उरन्। ञ्नित्यादिर्नित्यम्। पा० ६।१।१९७। इति नित्त्वाद् आद्युदात्तः ॥ अस्यति शत्रून्। यद्वा, अस गतिदीप्त्यादानेषु−उरन्। असति गच्छति व्याप्नोति सर्वत्र, दीप्यते स्वयम्, आदत्ते वा साधून्। यद्वा। असुं प्राणं राति ददातीति, असु+रा दानादानयोः−क। मेघनाम−निघ० १।१०। असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वं वानवत्वं वापिवासुरिति प्रज्ञानामास्यत्यनर्थानस्ताश्चास्यामर्था वसुरत्वमादिलुप्तम्−निरु० १०।३४। क्षेप्ता। शूरः। व्यापकः। दीप्यमानः। ग्रहीता। प्राणदाता। प्रज्ञावान्। यद्वा, मेघवद् उदारः। वरुणविशेषणमेतत्। वि। विशेषेण। राजति। राजृ दीप्तौ। दीप्यते, ईष्टे ईश्वरो भवति−निघ० २।२१। वशा। वश स्पृहि-अप्, टाप्। इच्छा, स्पृहा। हि। अवश्यम्। यस्मात्। सत्या। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति सत्+यत्, टाप्। सद्भ्यो हिता, अवितथा। वरुणस्य। १।३।३। व्रियते स्वीक्रियते स वरुणः। अतिश्रेष्ठस्य। परमेश्वरस्य। राज्ञः। राजति, ऐश्वर्यकर्मा−निघ० २।२१। कनिन् युवृषितक्षिराजि०। उ० १।१५६। इति राजृ दीप्तौ−ऐश्वर्ये च-कनिन्। स्वामिनः, अधिपतेः, ईश्वरस्य। ब्रह्मणा। १।८।४। वेदज्ञानेन। शाशदानः। शद्लृ शातने यङ्लुगन्ताद् छन्दसि शानच्। शाशद्यमानः−निरु० ६।१६। अत्यर्थं तीक्ष्णः। विजयी। उग्रस्य। ऋज्रेन्द्राग्रवज्र०। उ० २।२८। इति उच समवाये-रक्। उच्यति क्रुधा सम्बध्यते। उत्कटस्य, प्रचण्डस्य। मन्योः। यजिमनिशुन्धिदसिजनिभ्यो युच्। उ० ३।२०। इति मन ज्ञाने गर्वे, धृतौ च-भावे कर्तरि वा-युच्। मन्युर्मन्यतेर्दीप्तिकर्मणः क्रोधकर्मणो वधकर्मणो वा−निरु० १०।२९। क्रोधात्। उत्+नयामि। उपसर्गस्य व्यवधानम्। ऊर्ध्वं गमयामि, मोचयामीत्यर्थः ॥

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    विषय

    राजा वरुण

    पदार्थ

    १. (अयम्) = यह (देवानाम् असुरः) = [असून् राति] देवों में प्राणशक्ति का सञ्चार करनेवाला प्रभु (विराजति) = विशेषरूप से चमकता है अथवा वह सम्पूर्ण संसार का शासन करता है। सब देवों को दीसि देनेवाला वह प्रभु ही है-('तेन देवा देवतामग्र आयन्') = उस प्रभु से ही सब देव देवत्व को प्राप्त हुए। ('तस्य भासा सर्वमिदं विभाति') = उस प्रभु की दीप्ति से ही ये सूर्यादि देव दील हो रहे हैं। २. राज्ञः उस देदीप्यमान वरुणस्य-संसार से सब पापों का निवारण करनेवाले–अन्तवादी को पाशों से जकड़नेवाले [ये ते पाशा: सस सस ब्रेधा तिष्ठन्ति विषिता रुशन्तः छिनन्तु सर्वे अनृतं वदन्तम्] उस प्रभु की (वशा:) = इच्छाएँ (हि) = निश्चय से (सत्या:) = सत्य हैं। प्रभु जो चाहते हैं, वही होता है। प्रभु की शासन-व्यवस्था में कोई किसी प्रकार का विघात नहीं कर सकता। ३. (ततः) = उस प्रभु से प्राप्त (ब्रह्मणा) = ज्ञान के द्वारा (परिशाशदान:) = चारों ओर वर्तमान कामादि शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करता हुआ मैं (उग्रस्य) = उस तेजस्वी प्रभु के (मन्यो:) = क्रोध से (इमम्) = इस अपने को (उत् नयामि) = ऊपर उठाता हूँ, अपने को प्रभु के क्रोध का पात्र नहीं बनने देता। प्रभु के क्रोध का भाजन तो वही व्यक्ति होता है जो कामादि शत्रुओं का इस शरीर में प्रवेश होने देता है। ज्ञान के द्वारा इन शत्रुओं का संहार करने पर हम प्रभु के प्रिय होते हैं।

    भावार्थ

    प्रभु संसार के शासक हैं। ज्ञान प्राप्त करके और वासनाओं का नाश करने पर हम प्रभु के कोप से दूर रहते हैं।

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    भाषार्थ

    (अयम्) यह (देवानाम् ) देवों के मध्य में (असुरः) प्राणप्रदाता (वि राजति) विराजता है। (उग्रस्य वरुणस्य राज्ञः) उग्र वरुण -राजा की (वशा) इच्छा (सत्या) सत्य है। तो भी (ब्रह्मणा शाशदाना) वेदविद्या द्वारा अतितीक्षण हुआ मैं (इमम्) इसको, (वरुणस्य राज्ञः) वरुण-राजा के (ततः मन्योः) उस क्रोध से (परि) परिवर्जित१ करके, (उन्नयामि) उन्नति के मार्ग में मैं ले चलता हूँ।

    टिप्पणी

    [वरुण="वृणोति व्रियते वाऽसौ वरुणः" (उणा० ३।५३) जो वरुण– परमेश्वर उपासकों की वरण करता है तथा उपासकों द्वारा जिसका वरण किया जाता है । ततः=पञ्चम्यर्थे सार्वविभक्तिक: तसिल्। वशा= इच्छा, वश कान्तौ (अदादिः), कान्तिः= कामना, इच्छा। परि= अपपरी वर्जने (अष्टा० १।४।८८) वरुण:= वरुण-सूक्त (अथर्व० १६।१।२, ३, ४, ५, ७)। मन्यु होता है अवबोध तथा ज्ञानपूर्वक। परन्तु वह जब उग्ररूप हो जाता है तब वह क्रोधरूप हो जाता है। मन्यु की प्राप्ति की प्रार्थना हुई है "मन्युरसि मन्युं मयि धेहि" (अथर्व० २०।१५।५)। वरुण का उग्रमन्यु भूचाल, बाढ़ और महायुद्धों में प्रकट होता है। असुरः= असुः प्राणं (निरुक्त ११।१८) 'अनवत्त्वम्' [अन प्राणने], (१०।३।३४)+रा (दाने अदादिः)।] [१. परि=परित्रिगर्तेभ्यो वृष्टो देवः (विष्णुपुराण)। त्रिगर्त= जलन्धर (आप्टे)। (१) "कि" ज्ञाने (जुहोत्यादिः)। (२) णम प्रह्वत्वे शब्दे च (भ्वादिः)।]

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    भाषार्थ

    (अयम्) यह (देवानाम् ) देवों के मध्य में (असुरः) प्राणप्रदाता (वि राजति) विराजता है। (उग्रस्य वरुणस्य राज्ञः) उग्र वरुण-राजा की (वशा) इच्छा (सत्या) सत्य है। तो भी (ब्रह्मणा शाशदानः) वेदविद्या द्वारा अतितीक्षण हुआ मैं (इमम्) इसको, (वरुणस्य राज्ञः) वरुण-राजा के (ततः मन्योः) उस क्रोध से (परि) परिवर्जित१ करके, (उन्नयामि) उन्नति के मार्ग में मैं ले चलता हूँ।

    टिप्पणी

    [वरुण="वृणोति व्रियते वाऽसौ वरुणः" (उणा० ३।५३) जो वरुण– परमेश्वर उपासकों की वरण करता है तथा उपासकों द्वारा जिसका वरण किया जाता है । ततः=पञ्चम्यर्थे सार्वविभक्तिक: तसिल्। वशा= इच्छा, वश कान्तौ (अदादिः), कान्तिः= कामना, इच्छा। परि= अपपरी वर्जने (अष्टा० १।४।८७) वरुण:= वरुण-सूक्त (अथर्व० १६।१।२, ३, ४, ५, ७)। मन्यु होता है अवबोध तथा ज्ञानपूर्वक। परन्तु वह जब उग्ररूप हो जाता है तब वह क्रोधरूप हो जाता है। मन्यु की प्राप्ति की प्रार्थना हुई है "मन्युरसि मन्युं मयि धेहि" (अथर्व० २०।१५।५)। वरुण का उग्रमन्यु भूचाल, बाढ़ और महायुद्धों में प्रकट होता है। असुरः= असुः प्राणं (निरुक्त ११।१८) 'अनवत्त्वम्' [अन प्राणने], (निरुक्त १०।३।३४)+रा (दाने अदादिः)।] [१. परि=परित्रिगर्तेभ्यो वृष्टो देवः (विष्णुपुराण)। त्रिगर्त= जलन्धर (आप्टे)। (१) "कि" ज्ञाने (जुहोत्यादिः)। (२) णम प्रह्वत्वे शब्दे च (भ्वादिः)।]

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    विषय

    ईश्वर और राजा ।

    भावार्थ

    ( अयं ) यह परमात्मा ( देवानां ) दिव्यपदार्थों में ( असुरः ) प्राणशक्ति का देने वाला होकर (विराजति) विराजमान हो रहा है । ( हि ) निश्चय से ( वरुणस्य ) सब से श्रेष्ठ, परम वरणीय और पापों के निवारक, ( राज्ञः ) राजाओं के राजा ईश्वर की ( वशा ) इच्छा या नियम (सत्या ) सत्य है । ( ततः परि ) उस परमात्मा से आए हुए ( ब्रह्मणा ) वेदज्ञान द्वारा ( शाशदानः ) तीक्ष्ण बुद्धि और बलवान् तपस्वी होकर मैं (इमं) इस राजा को (उग्रस्य) सर्वशक्तिमान् ( मन्योः ) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर के अनुग्रह से ( उत् नयामि ) उन्नत, राज्यसिंहासन पद को प्राप्त कराता हूं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। असुरो वरुणो देवता। १, २ त्रिष्टुप्, ३ ककुम्मती अनुष्टुप्। ४ अनुष्टुप् चतुर्ऋचं सूक्तम् ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Freedom from Sin

    Meaning

    This Varuna, immanent and transcendent cosmic spirit of justice, love and law, life giver of all devas, vibrant powers of nature and humanity, shines and rules over all. The bonds and bounds of this self-refulgent ruler are ever true and inviolable. Therefore, enlightened, energised and refined by the infinite knowledge and vision of the power and passion of this refulgent omnipotent saviour and protector, I raise this man, this ruler, this self, above the carnal mind to freedom of spirit within the bounds of divine law above the bonds and snares of the arrestive punitive law.

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    Subject

    Asura

    Translation

    This bestower of life (asura) of the bounties of nature rules a supreme. The will of the venerable Lord, the king of all, has to be complied with. Even then strengthened with prayer, I save this man from the wrath of the furious one (asuh=prana).

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    Translation

    The Supreme-Being is All-impelling power among all the physical forces; the law of this paramount Lord is true and inviolable. I the priest having attained the higher penetration and power from His Vedic speech, ward of this King off from the anger of Almighty.

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    Translation

    This Lord, is the Ruler of divine objects, that receive sustenance from Him. Verily, the wishes of God, the Averter of sins, and the King of Kings, must be accomplished. Triumphant with the knowledge of the Vedas, revealed by Him, and through the grace of the Almighty Father, I make this King occupy the throne.

    Footnote

    I refers to the priest.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−अयम्। पुरोवर्ती। देवानाम्। १।४।३। दिव्यगुणवतां विदुषाम्। असुरः। असेरुरन्। उ० १।४२। इति असु क्षेपे-उरन्। ञ्नित्यादिर्नित्यम्। पा० ६।१।१९७। इति नित्त्वाद् आद्युदात्तः ॥ अस्यति शत्रून्। यद्वा, अस गतिदीप्त्यादानेषु−उरन्। असति गच्छति व्याप्नोति सर्वत्र, दीप्यते स्वयम्, आदत्ते वा साधून्। यद्वा। असुं प्राणं राति ददातीति, असु+रा दानादानयोः−क। मेघनाम−निघ० १।१०। असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वं वानवत्वं वापिवासुरिति प्रज्ञानामास्यत्यनर्थानस्ताश्चास्यामर्था वसुरत्वमादिलुप्तम्−निरु० १०।३४। क्षेप्ता। शूरः। व्यापकः। दीप्यमानः। ग्रहीता। प्राणदाता। प्रज्ञावान्। यद्वा, मेघवद् उदारः। वरुणविशेषणमेतत्। वि। विशेषेण। राजति। राजृ दीप्तौ। दीप्यते, ईष्टे ईश्वरो भवति−निघ० २।२१। वशा। वश स्पृहि-अप्, टाप्। इच्छा, स्पृहा। हि। अवश्यम्। यस्मात्। सत्या। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति सत्+यत्, टाप्। सद्भ्यो हिता, अवितथा। वरुणस्य। १।३।३। व्रियते स्वीक्रियते स वरुणः। अतिश्रेष्ठस्य। परमेश्वरस्य। राज्ञः। राजति, ऐश्वर्यकर्मा−निघ० २।२१। कनिन् युवृषितक्षिराजि०। उ० १।१५६। इति राजृ दीप्तौ−ऐश्वर्ये च-कनिन्। स्वामिनः, अधिपतेः, ईश्वरस्य। ब्रह्मणा। १।८।४। वेदज्ञानेन। शाशदानः। शद्लृ शातने यङ्लुगन्ताद् छन्दसि शानच्। शाशद्यमानः−निरु० ६।१६। अत्यर्थं तीक्ष्णः। विजयी। उग्रस्य। ऋज्रेन्द्राग्रवज्र०। उ० २।२८। इति उच समवाये-रक्। उच्यति क्रुधा सम्बध्यते। उत्कटस्य, प्रचण्डस्य। मन्योः। यजिमनिशुन्धिदसिजनिभ्यो युच्। उ० ३।२०। इति मन ज्ञाने गर्वे, धृतौ च-भावे कर्तरि वा-युच्। मन्युर्मन्यतेर्दीप्तिकर्मणः क्रोधकर्मणो वधकर्मणो वा−निरु० १०।२९। क्रोधात्। उत्+नयामि। उपसर्गस्य व्यवधानम्। ऊर्ध्वं गमयामि, मोचयामीत्यर्थः ॥

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    बंगाली (3)

    पदार्थ

    (অয়ং) এই (দেবানাং) বিদ্বানদের (অসুরঃ) প্রাণদাতা পরমেশ্বর (বিরাজতি) শ্রেষ্ঠ রাজা। (বরুণস্য) শ্রেষ্ঠ (রাজ্ঞঃ) রাজা পরমেশ্বরের (বশা) ইচ্ছা (সত্যা) সত্য (হি) ই। (ততঃ) এজন্য (ব্রহ্মণা) বেদজ্ঞান দ্বারা (পরি) সর্বদা (শাশদানঃ) তীক্ষ্ণ হইয়া (উগ্রস্য) প্রচণ্ড পরমেশ্বরের (মন্যোঃ) ক্রোধ হইতে (ইমম্) ইহাকে (উত্নয়ামি) মুক্ত করিতেছি।।
    অসুরঃ’ অসুং প্রাণং রাতি দদাতি ইতি। অসু+রা দানাদানয়োঃ ক। প্রাণদাতা।।

    भावार्थ

    প্রাণদাতা পরমেশ্বর বিদ্বানদের নিকট শ্রেষ্ঠ রাজা। শ্রেষ্ঠ রাজা পরমেশ্বরের ইচ্ছাই সত্য। এজন্য বেদজ্‌হান লাভ করিয়া আমি তীক্ষ্ণ জ্ঞানবান হইয়া সেই প্রচণ্ড পরমেশ্বরের ক্রোেধরূপী দণ্ড হইতে নিজেকে নিষ্কৃতি দান করি।।
    সর্বশক্তিমান পরমেশ্বরের প্রতি ভয় থাকিলে মানুষ কখনো পাপ করিতে পারে না। তাহাকে প্রসন্ন রাখাই সত্যাচরণ।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    অয়ং দেবানামসুরো বি রাজতি বশা হি সত্যা বরুণস্য রাজ্ঞঃ। ততস্পরি ব্রহ্মণা শাশদান উগ্রস্য মন্যোরুদিনং নয়ামি।।

    ऋषि | देवता | छन्द

    অর্থবা। অসুরঃ। ত্রিষ্টুপ্

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    मन्त्र विषय

    (বরুণস্য ক্রোধঃ প্রচণ্ডঃ) বরুণের প্রচণ্ড ক্রোধ

    भाषार्थ

    (অয়ম্) এই (দেবানাম্) বিজয়ী মহাত্মাদের (অসুরঃ) প্রাণদাতা [বা প্রজ্ঞাবান্ বা প্রাণবান্] পরমেশ্বর (বিরাজতি) বড়ো রাজা, (বরুণস্য) বরুণ অর্থাৎ অতি শ্রেষ্ঠ (রাজ্ঞঃ) রাজা পরমেশ্বরের (বশা) ইচ্ছা (সত্যা) সত্য (হি) ই হয়। (ততঃ) এইজন্য (ব্রহ্মণা) বেদজ্ঞানের মাধ্যমে (পরি) সর্বদা (শাশদানঃ) তীক্ষ্ণ হয়ে/ হতে থাকা আমি (উগ্রস্য) পরমেশ্বরের প্রচণ্ড (মন্যোঃ) ক্রোধ থেকে (ইমম্) এঁকে [নিজেকে] (উৎ নয়ামি) মুক্ত করি॥১।।

    भावार्थ

    সর্বশক্তিমান্ পরমেশ্বরের ক্রোধের ভয়ে মনুষ্য যেন কখনো পাপ না করে এবং সর্বদা পরমেশ্বরকে প্রসন্ন রাখে ॥১॥

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    भाषार्थ

    (অয়ম্) এই (দেবানাম্) দেবতাদের মধ্যে (অসুরঃ) প্রাণপ্রদাতা (বি রাজতি) বিরাজ করে। (উগ্রস্য বরুণস্য রাজ্ঞঃ) উগ্র বরুণ-রাজার (বশা) ইচ্ছা (সত্যা) সত্য। তবুও (ব্রহ্মণা শাশদানঃ) বেদবিদ্যা দ্বারা অতিতীক্ষ্ণ আমি (ইমম্) একে, (বরুণস্য রাজ্ঞঃ) বরুণ-রাজার (ততঃ মন্যোঃ) সেই ক্রোধ থেকে (পরি) পরিবর্জিত১ করে, (উন্নয়ামি) উন্নতির মার্গে আমি নিয়ে চলি।

    टिप्पणी

    [বরুণ="বৃণোতি ব্রিয়তে বাঽসৌ বরুণঃ" (উণা০ ৩।৫৩) যে বরুণ–পরমেশ্বর উপাসকদের বরণ করে এবং উপাসকদের দ্বারা যার বরণ করা হয়। ততঃ=পঞ্চম্যর্থে সার্ববিভক্তিকঃ তসিল্। বশা= ইচ্ছা, বশ কান্তৌ (অদাদিঃ), কান্তিঃ= কামনা, ইচ্ছা। পরি= অপপরী বর্জনে (অষ্টা০ ১।৪।৮৭) বরুণঃ= বরুণ-সূক্ত (অথর্ব০ ১৬।১।২, ৩, ৪, ৫, ৭)। মন্যু হল অববোধ তথা জ্ঞানপূর্বক। কিন্তু তা যখন উগ্ররূপ হয়ে যায় তখন ক্রোধরূপ হয়ে যায়। মন্যুর প্রাপ্তির প্রার্থনা হয়েছে "মন্যুরসি মন্যুং ময়ি ধেহি" (অথর্ব০ ২০।১৫।৫)। বরুণের উগ্রমন্যু ভূমিকম্প, বন্যা এবং মহাযুদ্ধে প্রকট হয়। অসুরঃ= অসুঃ প্রাণং (নিরুক্ত ১১।১৮) 'অনবত্ত্বম্' [অন প্রাণনে], (নিরুক্ত ১০।৩।৩৪)+রা (দানে অদাদিঃ)।] [১. পরি=পরিত্রিগর্তেভ্যো বৃষ্টো দেবঃ (বিষ্ণুপুরাণ)। ত্রিগর্ত= জলন্ধর (আপ্টে)। (১) "কি" জ্ঞানে (জুহোত্যাদিঃ)। (২) ণম প্রহ্বত্বে শব্দে চ (ভ্বাদিঃ)।]

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