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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 13 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 13/ मन्त्र 1
    ऋषि: - भृग्वङ्गिराः देवता - विद्युत् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - विद्युत सूक्त
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    नम॑स्ते अस्तु वि॒द्युते॒ नम॑स्ते स्तनयि॒त्नवे॑। नम॑स्ते अ॒स्त्वश्म॑ने॒ येना॑ दू॒डाशे॒ अस्य॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नम॑: । ते॒ । अ॒स्तु॒ । वि॒ऽद्युते॑ । नम॑: । ते॒ । स्त॒न॒यि॒त्नवे॑ ।नम॑: । ते॒ । अ॒स्तु॒ । अश्म॑ने । येन॑ । दु॒:ऽदाशे॑ । अस्य॑सि ॥१३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे। नमस्ते अस्त्वश्मने येना दूडाशे अस्यसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नम: । ते । अस्तु । विऽद्युते । नम: । ते । स्तनयित्नवे ।नम: । ते । अस्तु । अश्मने । येन । दु:ऽदाशे । अस्यसि ॥१३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    [हे परमेश्वर !] (ते) तुझ (विद्युते) कौंधा लेती हुयी, बिजुली रूप को (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे, (ते) तुझ (स्तनयित्नवे) गड़गड़ाते हुए, बादलरूप को (नमः) नमस्कार होवे। (ते) तुझ (अश्मने) पाषाण रूप को (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे, (येन) जिस [पत्थर] से (दूडाशे) दुःखदायी पुरुष को (अस्यसि) तू ढा देता है ॥१॥

    भावार्थ - न्यायकारी परमात्मा दुःखदायी अधर्मी पापियों को आधिदैविक आदि दण्ड देकर असह्य विपत्तियों में डालता है, इसलिये सब मनुष्य उस के कोप से डर कर उस की आज्ञा का पालन करें और सदा आनन्द भोगें ॥१॥


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    Meaning -
    O lord omnipotent, homage to you for electric energy, homage to you for thunder energy, homage to you for the energy that strikes like a deadly bolt, and for that which attracts and repels and conducts itself to the targets and into the absorbent materials, and by which you strike at the enemy.


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