अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 15 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 15/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - सिन्धुसमूहः छन्दः - भुरिग्बृहती सूक्तम् - पुष्टिकर्म सूक्त

    सं सं स्र॑वन्तु॒ सिन्ध॑वः॒ सं वाताः॒ सं प॑त॒त्रिणः॑। इ॒मं य॒ज्ञं प्र॒दिवो॑ मे जुषन्तां संस्रा॒व्ये॑ण ह॒विषा॑ जुहोमि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सम् । सम् । स्र॒व॒न्तु॒ । सिन्ध॑व: । सम् । वाता॑: । सम् । प॒त॒त्रिण॑: ।इ॒मम् । य॒ज्ञम् । प्र॒ऽदिव॑: । मे॒ । जु॒ष॒न्ता॒म् । स॒म्ऽस्रा॒व्येण । ह॒विषा॑ । जु॒हो॒मि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः। इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम् । सम् । स्रवन्तु । सिन्धव: । सम् । वाता: । सम् । पतत्रिण: ।इमम् । यज्ञम् । प्रऽदिव: । मे । जुषन्ताम् । सम्ऽस्राव्येण । हविषा । जुहोमि ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 15; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (सिन्धवः) सब समुद्र (सम् सम्) अत्यन्त अनुकूल (स्रवन्तु) बहें, (वाताः) विविध प्रकार के पवन और (पतत्रिणः) पक्षी (सम् सम्) बहुत अनुकूल बहैं। (प्रदिवः) बड़े तेजस्वी विद्वान् लोग (इमम्) इस (मे) मेरे (यज्ञम्) सत्कार को (जुषन्ताम्) स्वीकार करें, (संस्राव्येण) बहुत आर्द्रभाव [कोमलता] से भरी हुयी (हविषा) भक्ति के साथ [उनको] (जुहोमि) मैं स्वीकार करता हूँ ॥१॥

    भावार्थ -
    मनुष्यों को योग्य है कि नौका आदि से समुद्रयात्रा को, विमान आदि से वायुमण्डल में जाने आने के मार्गों को और यथायोग्य व्यवहार से पक्षी आदि सब जीवों को अनुकूल रक्खें और विज्ञानपूर्वक सब पदार्थों से उपकार लेवें और विद्वानों में पूर्ण प्रीति और श्रद्धा रक्खें, जिससे वह भी उत्साहपूर्वक वर्ताव करें ॥१॥

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