Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 15 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 15/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - सिन्धुसमूहः छन्दः - भुरिग्बृहती सूक्तम् - पुष्टिकर्म सूक्त
    123

    सं सं स्र॑वन्तु॒ सिन्ध॑वः॒ सं वाताः॒ सं प॑त॒त्रिणः॑। इ॒मं य॒ज्ञं प्र॒दिवो॑ मे जुषन्तां संस्रा॒व्ये॑ण ह॒विषा॑ जुहोमि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सम् । सम् । स्र॒व॒न्तु॒ । सिन्ध॑व: । सम् । वाता॑: । सम् । प॒त॒त्रिण॑: ।इ॒मम् । य॒ज्ञम् । प्र॒ऽदिव॑: । मे॒ । जु॒ष॒न्ता॒म् । स॒म्ऽस्रा॒व्येण । ह॒विषा॑ । जु॒हो॒मि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः। इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम् । सम् । स्रवन्तु । सिन्धव: । सम् । वाता: । सम् । पतत्रिण: ।इमम् । यज्ञम् । प्रऽदिव: । मे । जुषन्ताम् । सम्ऽस्राव्येण । हविषा । जुहोमि ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 15; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (सिन्धवः) सब समुद्र (सम् सम्) अत्यन्त अनुकूल (स्रवन्तु) बहें, (वाताः) विविध प्रकार के पवन और (पतत्रिणः) पक्षी (सम् सम्) बहुत अनुकूल बहैं। (प्रदिवः) बड़े तेजस्वी विद्वान् लोग (इमम्) इस (मे) मेरे (यज्ञम्) सत्कार को (जुषन्ताम्) स्वीकार करें, (संस्राव्येण) बहुत आर्द्रभाव [कोमलता] से भरी हुयी (हविषा) भक्ति के साथ [उनको] (जुहोमि) मैं स्वीकार करता हूँ ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को योग्य है कि नौका आदि से समुद्रयात्रा को, विमान आदि से वायुमण्डल में जाने आने के मार्गों को और यथायोग्य व्यवहार से पक्षी आदि सब जीवों को अनुकूल रक्खें और विज्ञानपूर्वक सब पदार्थों से उपकार लेवें और विद्वानों में पूर्ण प्रीति और श्रद्धा रक्खें, जिससे वह भी उत्साहपूर्वक वर्ताव करें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−सम् सम्। अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते−निरु० १०।४२। अत्यन्त-सम्यक्, अत्यनुकूलाः। स्रवन्तु। स्रु गतौ, स्रवणे च-लोट्। गच्छन्तु, प्रवहन्तु। सिन्धवः। १।४।३। स्यन्दनशीलाः। समुद्राः। स्त्रियां, नद्यः। सम्=संस्रवन्तु। उपसर्गवशात् स्रवन्तु इति सर्वत्र अनुषज्यते। अनुकूलाः प्रवर्तन्ताम्। वाताः। १।११।६। विविधपवनाः। सम्। सम्यग् अनुकूलाश्चरन्तु। पतत्रिणः। पतत्रं पक्षः। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति पतत्र−इनि मत्वर्थे। पक्षिणः। इमम्। प्रवर्तमानम्। यज्ञम्। १।९।४। यागं विदुषां पूजनम्। प्र-दिवः। प्र+दिवु द्युतिस्तुतिगत्यादिषु−क्विप्। प्रकृष्टप्रकाशाः, देवाः, विद्वांसः। जुषन्ताम्। जुषी प्रीतिसेवनयोः−लोट्। सेवन्ताम्, स्वीकुर्वन्तु। सम् स्राव्येण। स्रु गतौ-ण। तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इति संस्राव-यत्। यद्वा। अचो यत्। पा० ३।१।९७। इति सम्+स्रु-णिच्-यत्। संस्रावेण सम्यक् स्रवणेन आर्द्रभावेन युक्तेन। हविषा। १।४।३। आत्मदानेन, भक्त्या। जुहोमि। यु दानादानादनेषु-लट्। अहम् आददे, स्वीकरोमि तान् प्रदिवः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    को सङ्गठन यज्ञ में आहुति

    पदार्थ

    १. (सिन्धवः) = नदियाँ (सम) = मिलकर (संस्त्रवन्तु) = उत्तमता से बहती रहें। छोटे-छोटे स्त्रोत अलग-अलग ही बहते रहें तो वे शीघ्र ही सूख जाएँगे और उनमें किसी प्रकार की शक्ति भी नहीं दीखती। ये स्रोत मिलकर एक प्रबल वेगवाली नदी के रूप में बहते हैं और मार्ग में आये वृक्ष आदि को उखाड़कर आगे बढ़ते जाते हैं। २. इसीप्रकार (वाता:) = वायुएँ भी (सम्) = मिलकर ही प्रबल वेगवाली हो जाती हैं। बायुवेग भी अलग-अलग होकर बहना चाहें तो वे शायद पत्तों को भी न हिला सकें। ३. (पतत्त्रिण:) = पक्षी भी (सम्) = मिलकर ही शक्ति-सम्पन्न बनते हैं। एक टिडी का कोई अर्थ ही नहीं, परन्तु टिडीदल अत्यन्त भयङ्कर रूप धारण कर लेता है। ४. प्रभु कहते हैं कि-(मे) = मेरे (इमम्) = इस (यज्ञम्) = सङ्गठन के भाव को [यज्-सङ्गतिकरण] (प्रदिव:) = प्रकृष्ट ज्ञानी पुरुष (जुषन्ताम्) = प्रीतिपूर्वक सेवित करें । ज्ञानी सङ्गठन के महत्व को समझते हैं और वे मिलकर ही चलते हैं। अज्ञान व मूर्खता में सब अपने ही स्वार्थ को देखते हैं, परिणामतः वहाँ

    सङ्गठन नहीं हो पाता। ५. एक ज्ञानी पुरुष निश्चय करता है कि (संत्राव्येन) = मिलकर चलने के लिए सङ्गठन के लिए हितकर (हविषा) = दान की वृत्ति से (जुहोमि) = मैं अपनी आय के अंश को आहुति के रूप में देता हूँ। यह अंश कर व दान के रूप में दिया जाकर सङ्गठन को दृढ़ बनानेवाला होता है।

    भावार्थ

    नदियाँ, बायुएँ व पक्षिगण सङ्गठन के महत्त्व को व्यक्त कर रहे हैं। हम सङ्गठन यज्ञ में अवश्य आहुति देनेवाले हों।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (सिन्धवः) स्यन्दनशील नदियाँ (सम् सम् ) परस्पर संगत हुए, परस्पर मिले जलों समेत (स्रवन्तु) स्त्रवित हों, प्रवाहित हों, ( वाता: ) गमनशील बागु (सम्) परस्पर मिलकर स्रवित हों, ( पतत्रिणः सम् ) पक्षियों के सदृश परस्पर मिलकर उड़नेवाले व्यावहारिक वायुयान उड़ें। (प्रदिवः) प्रज्ञानी व्यवहारी (मे इमम् यज्ञम्) मेरे इस व्यावहारिक-यज्ञ को (जुषन्ताम्) प्रीति पूर्वक सेवित करें। (संस्राव्येण हविषा) परस्पर मिलकर एकत्रित हुई हविः द्वारा (जुहोमि) मैं राष्ट्रपति यज्ञ करता हूँ ।

    टिप्पणी

    [यह यज्ञ है व्यापारिक-यज्ञ। राष्ट्रपति इस यज्ञ को करता है। वह परस्पर सहयोगियों द्वारा धनसंग्रह करता है, यह संस्राव्य-हविः है, पारस्परिक दान रूपी हवि है। व्यापारिक१-वायुयानों द्वारा यह यज्ञ सम्पन्न किया जाता है। ये यान पक्षियों की आकृतिवाले, अर्थात् पंखोंवाले होते हैं। प्रदिवः= प्रज्ञानी व्यवहारी "प्र+ दिव:" दिवु क्रीडाविजिगीषा "व्यवहार" आदि (दिवादिः)। संखाव्य-हवि का स्वरूप मन्त्र (३ और ४) में स्पष्ट है।] [१. व्यापारिक वायुयानों के स्वरूपज्ञानार्थ, देखो (अथर्व० ३।१५।१-६)।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (सिन्धवः) स्यन्दनशील नदियाँ (सम् सम्) परस्पर संगत हुए, परस्पर मिले जलों समेत (स्रवन्तु) स्रवित हों, प्रवाहित हों, ( वाता: ) गमनशील बागु (सम्) परस्पर मिलकर स्रवित हों, ( पतत्रिणः सम् ) पक्षियों के सदृश परस्पर मिलकर उड़नेवाले व्यावहारिक वायुयान उड़ें। (प्रदिवः) प्रज्ञानी व्यवहारी (मे इमम् यज्ञम्) मेरे इस व्यावहारिक-यज्ञ को (जुषन्ताम्) प्रीति पूर्वक सेवित करें। (संस्राव्येण हविषा) परस्पर मिलकर एकत्रित हुई हविः द्वारा (जुहोमि) मैं राष्ट्रपति यज्ञ करता हूँ ।

    टिप्पणी

    [यह यज्ञ है व्यापारिक-यज्ञ। राष्ट्रपति इस यज्ञ को करता है। वह परस्पर सहयोगियों द्वारा धनसंग्रह करता है, यह संस्राव्य-हविः है, पारस्परिक दान रूपी हवि है। व्यापारिक१-वायुयानों द्वारा यह यज्ञ सम्पन्न किया जाता है। ये यान पक्षियों की आकृतिवाले, अर्थात् पंखोंवाले होते हैं। प्रदिवः= प्रज्ञानी व्यवहारी "प्र+ दिव:" दिवु क्रीडाविजिगीषा "व्यवहार" आदि (दिवादिः)। संस्राव्य-हवि का स्वरूप मन्त्र (३ और ४) में स्पष्ट है।] [१. व्यापारिक वायुयानों के स्वरूपज्ञानार्थ, देखो (अथर्व० ३।१५।१-६)।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    गमनागमन के साधन

    भावार्थ

    ( सिंधवः ) नदियें, नहरें ( सं स्रवन्तु ) जिस प्रकार मेल से बहती हैं, अर्थात् जिस प्रकार जल का बिन्दु बिन्दु परस्पर मिलकर नदी या नहर के रूप में बहता है, (वाताः सम्) जिस प्रकार वायु का एक एक परमाणु मिलकर महावायु के रूप में बहता है, ( पतत्रिणः ) तथा जिस प्रकार पक्षी सदा मिलकर उड़ते हैं इसी प्रकार ( प्रदिवः ) उत्कृष्ट ज्ञानसम्पन्न, ज्ञानवृद्ध पुरुष (इमं) इस (यज्ञं) राष्ट्रयज्ञ में ( जुषन्ताम् ) प्रेमपूर्वक मिलकर अर्थात् परस्पर मेल से एकमत होकर आवें, मैं राजा ( संस्राव्येण ) प्रजा के प्रत्येक जन से बह कर आई हुई ( हविषा ) कर रूप हवि द्वारा (जुहोमि) राष्ट्र-यज्ञ को रचता हूं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। सिन्धुर्देवता । १, ३, ४ अनुष्टुप् छन्दः। २ भुरिक्पथ्यापंक्तिः। चतुऋचं सूक्तम् ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Joint Power

    Meaning

    Let the streams of water join together, they would flow together as rivers, let currents of wind blow together, and together they blow as storms, let birds fly together, and they fly as bird power in unity. Let brilliant men join this yajna of mine and conduct it together as a joint power, a nation. I perform this yajna with the oblations of liquid ghrta from different streams in unison. (Diversity and unity are two sides of the same one reality, root and branches of the same one tree. It is the unity of the seed and the root of the tree which bears and holds and sustains the diversity of branches and leaves together, it is not the other way round. In our world, world economy is one yajna, national economies are oblations into the same one world vedi. One world, one economy, no enemy in the same one community of humanity. Dream? Distant? Hence the leading performer calls upon the Pradivah, leading lights of world vision, to join and conduct the yajna.)

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject

    Sindhu etc.—Rivers

    Translation

    May the rivers flow to meet together, together the winds and also the birds together. May the excellent divine persons come to this sacrifice of mine. I hereby perform a sacrifice of confluence. (i.e. with a confluent oblation).

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Let the rivers flow usually, let the wind blow usually and let the birds fly together freely. Let learned men attend this Yajna which I perform with the oblation of fluent ghee.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    As the streams flow together, winds blow together, and birds fly together, so should learned persons serve my state devotedly and harmoniously. I welcome them with humble veneration.

    Footnote

    I refers to a king. Them refers to learned persons,

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−सम् सम्। अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते−निरु० १०।४२। अत्यन्त-सम्यक्, अत्यनुकूलाः। स्रवन्तु। स्रु गतौ, स्रवणे च-लोट्। गच्छन्तु, प्रवहन्तु। सिन्धवः। १।४।३। स्यन्दनशीलाः। समुद्राः। स्त्रियां, नद्यः। सम्=संस्रवन्तु। उपसर्गवशात् स्रवन्तु इति सर्वत्र अनुषज्यते। अनुकूलाः प्रवर्तन्ताम्। वाताः। १।११।६। विविधपवनाः। सम्। सम्यग् अनुकूलाश्चरन्तु। पतत्रिणः। पतत्रं पक्षः। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति पतत्र−इनि मत्वर्थे। पक्षिणः। इमम्। प्रवर्तमानम्। यज्ञम्। १।९।४। यागं विदुषां पूजनम्। प्र-दिवः। प्र+दिवु द्युतिस्तुतिगत्यादिषु−क्विप्। प्रकृष्टप्रकाशाः, देवाः, विद्वांसः। जुषन्ताम्। जुषी प्रीतिसेवनयोः−लोट्। सेवन्ताम्, स्वीकुर्वन्तु। सम् स्राव्येण। स्रु गतौ-ण। तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इति संस्राव-यत्। यद्वा। अचो यत्। पा० ३।१।९७। इति सम्+स्रु-णिच्-यत्। संस्रावेण सम्यक् स्रवणेन आर्द्रभावेन युक्तेन। हविषा। १।४।३। आत्मदानेन, भक्त्या। जुहोमि। यु दानादानादनेषु-लट्। अहम् आददे, स्वीकरोमि तान् प्रदिवः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    बंगाली (3)

    पदार्थ

    (সিন্ধবঃ) সব সমুদ্র (সম্ সম্) অতীব অনুকূল হইয়া প্রবাহিত (বাতাঃ) বিভিন্ন বায়ু ও (পতত্রিণঃ) পক্ষী (সম্ সম্) অত্যন্ত অনুকূল হইয়া চলুক। (প্রদিবঃ) তেজস্বী বিদ্বানেরা (ইমম্) এই (মে) আমার (য়জ্ঞং) শুভকর্মানুষ্ঠানকে (জুবত্তাম্) গ্রহণ করুন (সংস্রাব্যেণ) অত্যন্ত আর্দ্র ভাবপূর্ণ (হবিষা) ভক্তির সহিত (জুহোমি) স্বীকার করিতেছি।।

    भावार्थ

    সব সমুদ্র ও বিভিন্ন বায়ু আমাদের অনুকূলে প্রবাহিত হউক। বিদ্বানেরা আমাদের শুভ কর্মানুষ্ঠানকে গ্রহন করুন। আমরা অতীব আর্দ্র ভাবপূর্ণ ভক্তির সহিত বিদ্বানদের প্রতি সদ্ব্যবহার করি।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    সং সং স্রবন্তু সিন্ধবঃ সং বাতাঃ সং পতত্ৰিণঃ । ইমং য়জ্ঞং প্রদিবো মে জুষন্তাং সংস্রাব্যেণ হবিসা জুহোমি।।

    ऋषि | देवता | छन्द

    অর্থবা। সিন্ধাদয়ো মন্ত্রোক্তাঃ। অনুষ্টুপ্ (ভুরিগৃহতী)

    इस भाष्य को एडिट करें

    मन्त्र विषय

    (ঐশ্বর্যপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ) ঐশ্বর্য প্রাপ্তির উপদেশ

    भाषार्थ

    (সিন্ধবঃ) সকল সমুদ্র (সম্ সম্) অত্যন্ত অনুকূলভাবে (স্রবন্তু) বহমান/প্রবাহিত হোক, (বাতাঃ) বিবিধ প্রকারে বায়ু এবং (পতত্রিণঃ) পক্ষী (সম্ সম্) বহু অনুকূলভাবে বহমান হোক। (প্রদিবঃ) উত্তম তেজস্বী বিদ্বানগণ (ইমম্) এই (মে) আমার (যজ্ঞম্) সৎকারকে (জুষন্তাম্) স্বীকার করুক, (সংস্রাব্যেণ) বহু আর্দ্রভাব [কোমলতা] যুক্ত (হবিষা) ভক্তির সাথে [তাঁদের] (জুহোমি) আমি স্বীকার করছি ॥১॥

    भावार्थ

    মনুষ্যদের উচিত, নৌকা আদি দ্বারা সমুদ্রযাত্রাকে, বিমান আদি দ্বারা বায়ুমণ্ডলে গমন-আগমনের মার্গসমূহকে এবং যথাযোগ্য ব্যবহার দ্বারা পক্ষী আদি সকল জীবকে অনুকূল রাখা এবং বিজ্ঞানপূর্বক সকল পদার্থ দ্বারা উপকার গ্রহণ করা। এবং বিদ্বানদের মধ্যে পূর্ণ প্রীতি ও শ্রদ্ধা রাখা/জ্ঞাপন করা, যাতে তাঁরাও উৎসাহপূর্বক আচরণ করে ॥১॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (সিন্ধবঃ) স্যন্দনশীল/প্রবাহমান নদী-সমূহ (সম্ সম্) পরস্পর সঙ্গত হয়ে, পরস্পর মিলে জল সমেত (স্রবন্তু) স্রবিত হোক, প্রবাহিত হোক, (বাতাঃ) গমনশীল বায়ু (সম্) পরস্পর মিলে সবিত হোক, (পতত্রিণঃ সম্) পক্ষীদের সদৃশ পরস্পর মিলেমিশে উড্ডয়ণকারী/উড্ডয়নশীল ব্যাবহারিক বায়ুযান উড্ডয়ন করুক। (প্রদিবঃ) প্রজ্ঞানী ব্যবহারী (মে ইমম্ যজ্ঞম্) আমার এই ব্যাবহারিক১-যজ্ঞকে (জুষন্তাম্) প্রীতিপূর্বক সেবিত করুক। (সংস্রাব্যেণ হবিষা) পরস্পর মিলে একত্রিত হওয়া হবিঃ দ্বারা (জুহোমি) আমি রাষ্ট্রপতি যজ্ঞ করি।

    टिप्पणी

    [এই যজ্ঞ হলো বাণিজ্যিক-যজ্ঞ। রাষ্ট্রপতি এই যজ্ঞ করেন। তিনি পরস্পর সহযোগীদের দ্বারা ধনসংগ্রহ করেন, এটা হলো সংস্রাব্য-হবিঃ, পারস্পরিক দান রূপী হবি। বাণিজ্যিক১- বায়ুযান দ্বারা এই যজ্ঞ সম্পন্ন করা হয়। যে যান পক্ষীদের মতো আকৃতির হয়, অর্থাৎ ডানাবিশিষ্ট হয়। প্রদিবঃ= প্রজ্ঞানী ব্যবহারী "প্র+দিবঃ" দিবু ক্রীড়াবিজিগীষা "ব্যবহার" আদি (দিবাদিঃ)। সংস্রাব্য-হবি এর স্বরূপ মন্ত্র (৩ ও ৪) এ স্পষ্ট রয়েছে।] [১. বাণিজ্যিক বায়ুযানের স্বরূপজ্ঞানার্থ, দেখুন (অথর্ববেদ ৩/১৫/১-৬)।]

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top