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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 2/ मन्त्र 2
    ऋषि: - अथर्वा देवता - चन्द्रमा और पर्जन्य छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रोग उपशमन सूक्त
    106

    ज्या॑के॒ परि॑ णो न॒माश्मा॑नं त॒न्वं कृधि। वी॒डुर्वरी॒यो ऽरा॑ती॒रप॒ द्वेषां॒स्या कृ॑धि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ज्याके । परि॑ । नः॒ । न॒म॒ । अश्मा॑नम् । त॒न्वम् । कृ॒धि॒ ।वी॒डुः । वरी॑यः । अरा॑तीः । अप॑ । द्वेषां॑सि । आ । कृ॒धि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ज्याके परि णो नमाश्मानं तन्वं कृधि। वीडुर्वरीयो ऽरातीरप द्वेषांस्या कृधि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ज्याके । परि । नः । नम । अश्मानम् । तन्वम् । कृधि ।वीडुः । वरीयः । अरातीः । अप । द्वेषांसि । आ । कृधि ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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    पदार्थ -
    [हे इन्द्र] (ज्याके) जय के लिये (नः) हमको (परि) सर्वथा (नम) तू झुका, (तन्वम्) [हमारे] शरीर को (अश्मानम्) पत्थर सा [सुदृढ़] (कृधि) बना दे। (वीडुः) तू दृढ़ होकर (अरातीः) विरोधों और (द्वेषांसि) द्वेषों को (अप=अपहृत्य) हटाकर (वरीयः) बहुत दूर (आकृधि) कर दे ॥२॥ अथवा, (ज्याके) दोनों जय के साधनों [मेघ और भूमि] को (नः परि) हमारी ओर (नम) तू झुका। यह अर्थ प्रयुक्त करो ॥

    भावार्थ - परमेश्वर में पूर्ण विश्वास करके मनुष्य आत्मबल और शरीरबल प्राप्त करें और सब विरोधों को मिटावें। सायणाचार्य ने अर्थ किया है कि (ज्याके) हे कुत्सित चिल्ला ! (नः) हमको (परि) छोड़ कर (नम) झुक। हमारी समझ में वह असंगत है, संपूर्ण सूक्त का देवता इन्द्र है ॥


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    Meaning -
    O Jyaka, earth, mother, bow string, develop us and build our body, the social system, the nation, to the strength of adamant and steel. Strong as you are, eliminate the jealous and the enemies, the niggards and the frustraters.


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