अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 25 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 25/ मन्त्र 1
    ऋषि: - भृग्वङ्गिराः देवता - यक्ष्मनाशनोऽग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - ज्वरनाशक सूक्त

    यद॒ग्निरापो॒ अद॑हत्प्र॒विश्य॒ यत्राकृ॑ण्वन्धर्म॒धृतो॒ नमां॑सि। तत्र॑ त आहुः पर॒मं ज॒नित्रं॒ स नः॑ संवि॒द्वान्परि॑ वृङ्ग्धि तक्मन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । अ॒ग्नि: । आप॑: । अद॑हत् । प्र॒ऽविश्य॑ । यत्र॑ । अकृ॑ण्वन् । ध॒र्म॒ऽधृत॑: । नमां॑सि । तत्र॑ । ते॒ । आ॒हु॒: । प॒र॒मम् । ज॒नित्र॑म् । स: । न॒: । स॒मऽवि॒द्वान् । परि॑ । वृ॒ङ्ग्धि॒ । त॒क्म॒न् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यदग्निरापो अदहत्प्रविश्य यत्राकृण्वन्धर्मधृतो नमांसि। तत्र त आहुः परमं जनित्रं स नः संविद्वान्परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । अग्नि: । आप: । अदहत् । प्रऽविश्य । यत्र । अकृण्वन् । धर्मऽधृत: । नमांसि । तत्र । ते । आहु: । परमम् । जनित्रम् । स: । न: । समऽविद्वान् । परि । वृङ्ग्धि । तक्मन् ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 25; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (यत्) जिस सामर्थ्य से (अग्निः) व्यापक अग्नि [ताप] ने (प्रविश्य) प्रवेश करके (अपः) व्यापनशील जल को (आ अदहत्) तपा दिया है और (यत्र) जिस [सामर्थ्य] के आगे (धर्मधृतः) मर्यादा के रखनेवाले पुरुषों ने (नमांसि) अनेक प्रकार से नमस्कार (अकृण्वन्) किया है। (तत्र) उस [सामर्थ्य] में (ते) तेरे (परमम्) सबसे ऊँचे (जनित्रम्) जन्मस्थान को (आहुः) वह [मर्यादापुरुष] बताते हैं, (सः=स त्वम्) सो तू, (तक्मन्) हे जीवन को कष्ट देनेवाले, ज्वर ! [ज्वरसमान पीडा देनेवाले ईश्वर !] (संविद्वान्) [यह बात] जानता हुआ (नः) हमको (परि वृङ्धि) छोड़ दे ॥१॥

    भावार्थ -
    जो परमेश्वर उष्णस्वभाव अग्नि द्वारा शीतलस्वभाव जल को तपाता है अर्थात् विरुद्ध स्वभाववालों को संयोग-वियोग से अनुकूल करके सृष्टि का धारण करता है, जिस परमेश्वर से बढ़ कर कोई मर्यादापालक नहीं है, जो स्वयंभू सबका अधिपति है और ज्वर आदि रोगों से पापियों को दण्ड देता है, उस न्यायी जगदीश्वर का स्मरण करते हुए हम पापों से बच कर सदा आनन्द भोगें, सब विद्वान् लोग उस ईश्वर के आगे सिर झुकाते हैं ॥१॥

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