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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 31 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 31/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - आशापाला वास्तोष्पतयः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - पाशविमोचन सूक्त
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    आशा॑नामाशापा॒लेभ्य॑श्च॒तुर्भ्यो॑ अ॒मृते॑भ्यः। इ॒दं भू॒तस्याध्य॑क्षेभ्यो वि॒धेम॑ ह॒विषा॑ व॒यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आशा॑नाम् । आ॒शा॒ऽपा॒लेभ्य॑: । च॒तु:ऽभ्य॑: । अ॒मृते॑भ्य: । इ॒दम् । भू॒तस्य॑ । अधि॑ऽअक्षेभ्य: । वि॒धेम॑ । ह॒विषा॑ । व॒यम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आशानामाशापालेभ्यश्चतुर्भ्यो अमृतेभ्यः। इदं भूतस्याध्यक्षेभ्यो विधेम हविषा वयम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आशानाम् । आशाऽपालेभ्य: । चतु:ऽभ्य: । अमृतेभ्य: । इदम् । भूतस्य । अधिऽअक्षेभ्य: । विधेम । हविषा । वयम् ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 31; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (इदम्) इस समय (वयम्) हम (आशानाम्) सब दिशाओं के मध्य (आशापालेभ्यः) आशाओं के पालनेहारे, (चतुर्भ्यः) प्रार्थना के योग्य [अथवा, चार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] (अमृतेभ्यः) अमर रूपवाले, (भूतस्य) संसार के (अध्यक्षेभ्यः) प्रधानों की (हविषा) भक्ति से (विधेम) सेवा करें ॥१॥

    भावार्थ - सब मनुष्यों को उत्तम गुणवाले पुरुषों अथवा चतुर्वर्ग, धर्म, अर्थ, काम [ईश्वर में प्रेम] और मोक्ष की प्राप्ति के लिये सदा पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिये। इनके ही पाने से मनुष्य की सब आशाएँ वा कामनाएँ पूर्ण होती हैं ॥१॥


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    Meaning -
    Now with havi we do this homage to the four immortal guardians of the four quarters of space who oversee, control and protect all forms of existence. (The ruler guardians of the quarters of space according to Atharva Veda 3, 27, 1-6 are Agni, Indra, Varuna and Soma of the east, south, west and north, while Vishnu and Brhaspati are guardian rulers of the nether and upper directions. In the case of the human personality as well this same order of divine care is applicable, and these six versions of the power of Brahma Supreme protect us against hate, enmity and jealousy while they augment our physical, mental and spiritual potential as well.)


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