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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 32/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - द्यावापृथिवी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - महद्ब्रह्मा सूक्त
    160

    इ॒दं ज॒नासो॑ वि॒दथ॑ म॒हद्ब्रह्म॑ वदिष्यति। न तत्पृ॑थि॒व्यां नो॑ दि॒वि येन॑ प्रा॒णन्ति॑ वी॒रुधः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒दम् । ज॒ना॒स॒: । वि॒दथ॑ । म॒हत् । ब्रह्म॑ । व॒दि॒ष्य॒ति॒ । न । तत् । पृ॒थि॒व्याम् । नो इति॑ । दि॒वि । येन॑ । प्रा॒णन्ति॑ । वी॒रुध॑: ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदं जनासो विदथ महद्ब्रह्म वदिष्यति। न तत्पृथिव्यां नो दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इदम् । जनास: । विदथ । महत् । ब्रह्म । वदिष्यति । न । तत् । पृथिव्याम् । नो इति । दिवि । येन । प्राणन्ति । वीरुध: ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 32; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    ब्रह्मविचार का उपदेश।

    पदार्थ

    (जनासः) हे मनुष्यो ! (इदम्) इस बात को (विदथ) तुम जानते हो, वह [ब्रह्मज्ञानी] (महत्) पूजनीय (ब्रह्म) परम ब्रह्म का (वदिष्यति) कथन करेगा। (तत्) वह ब्रह्म (न) न तो (पृथिव्याम्) पृथिवी में (नो) और न (दिवि) सूर्य्यलोक में है (येन) जिसके सहारे से (वीरुधः) यह उगती हुयी जड़ी-बूटी [लतारूप सृष्टि के पदार्थ] (प्राणन्ति) श्वास लेती हैं ॥१॥

    भावार्थ

    यद्यपि वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् परब्रह्म भूमि वा सूर्य्य आदि किसी विशेष स्थान में वर्तमान नहीं है, तो भी वह अपनी सत्ता मात्र से ओषधि अन्न आदि सब सृष्टि का नियमपूर्वक प्राणदाता है। ब्रह्मज्ञानी लोग उस ब्रह्म का उपदेश करते हैं ॥१॥ केनोपनिषत् में वर्णन है, खण्ड १ मन्त्र ३। न तत्र चक्षुर्गगच्छति न वाग् गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद् व्याचचक्षिरे ॥१॥ न वहाँ आँख जाती है, न वाणी जाती है, न मन, हम न जानते हैं न पहिचानते हैं, कैसे वह इस जगत् का अनुशासन करता है। वह जाने हुए से भिन्न है और न जाने हुए से ऊपर है। ऐसा हमने पूर्वजों से सुना है, जिन्होंने हमें उसकी शिक्षा दी थी ॥ और भी केनोपनिषत् का वचन है, अ० १ म० ८ ॥ यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥२॥ जो प्राण द्वारा नहीं श्वास लेता है। जिस करके प्राण चलाया जाता है, उसको ही तू ब्रह्म जान, यह वह नहीं है जिसके पास वे बैठते हैं ॥

    टिप्पणी

    १−इदम्। वक्ष्यमाणम्। जनासः। १८।१। आज्जसेरसुक्। पा० ७।१।५०। इति जसि असुक्। हे जनाः, विद्वांसः। विदथ। विद ज्ञाने अदादिः−लट् मध्यमबहुवचनं छन्दसि शः। यूयं वित्थ, जानीथ। महत्। १।१०।४। पूजनीयम् ब्रह्म। १।८।४। परब्रह्म, परमात्मानम्, परमकारणम्। वदिष्यति। वद वाक्ये−लृट्। कथयिष्यति। न। निषेधे। तत्। ब्रह्म। पृथिव्याम्। १।२।१। प्रख्यातायां भूमौ। नो इति। न−उ। नैव। दिवि। १।३०।३। द्युलोके, सूर्यमण्डले। येन। ब्रह्मणा। प्राणन्ति। प्र+अन जीवने, अदादिः। जीवन्ति, श्वसन्ति। वीरुधः। विशेषेण रुणद्धि वृक्षानन्यान् सा वीरुत्। वि+रुध आवरणे−क्विप्, दीर्घश्च। अथवा। वि+रुह प्रादुर्भावे−क्विप्। न्यङ्क्वादीनां च पा० ७।३।३५। इति हस्य धः। विरोहणशीलाः। वितस्ता लतादयः। लतादिवद् विरोहिताः सृष्टिपदार्थाः ॥

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    विषय

    सबका प्राण

    पदार्थ

    १. (जनास:) = हे लोगो! (इदं विदथ) = इस बात को समझ लो कि (न तत् पृथिव्याम्) - न तो वह तत्त्व पृथिवी में ही है और (नो दिवि) = न ही धुलोक में है (येन) = जिससे (वीरुधः) = ये सब फैलनेवाली व विविधरूप से उगनेवाली लताएँ, वनस्पतियों (प्राणन्ति) = प्राणित होती हैं। (महद् ब्रह्म) = यह महनीय वेदज्ञान (वदिष्यति) = इसी बात का प्रतिपादन करेगा। २. देखने में तो यही लगता है कि पृथिवी इन सब बनस्पतियों को जन्म देती है और धुलोक से होनेवाली वृष्टि उन वनस्पतियों के उगने का कारण बनती है। पृथिवी इन वनस्पतियों की माता है तो घलोक पिता है-('द्यौष्पिता पृथिवी माता') ऐसा वेद कहता भी है, परन्तु जब यह विचार चलता है कि पृथिवी व धुलोक में इस शक्ति को कौन रखता है तब विचारशील पुरुष इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि इनमें शक्ति-स्थापन करनेवाला कोई और है-वही 'ब्रह्म' है। वही प्राणों का प्राण है। ब्रह्म ही ह्युलोक को उग्न और पृथिवी को दृढ़ बनाता है। प्रभु से शक्ति प्राप्त करके ही ये द्यावापृथिवी इन वीरुधों को प्राणित करनेवाले होते हैं, अत: वस्तुत: प्राणित करनेवाला तो प्रभु ही है। ये सब वनस्पतियाँ प्राणित होकर प्रभु की ही महिमा को प्रकट कर रही हैं।

    भावार्थ

    द्यावापृथिवी से प्राणित होनेवाली ये सब वनस्पतियाँ मूल में प्रभु से ही प्राणित हो रही हैं।

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    पदार्थ

    शब्दार्थ =  ( जनास: ) = हे मनुष्यो ! ( इदम् विदथ ) =  इस बात को तुम जानते हो कि ब्रह्मवेत्ता पुरुष  ( महद् ब्रह्म वदिष्यति ) = पूजनीय परब्रह्म का उपदेश करेगा  ( तत् ) = वह ब्रह्म  ( न पृथिव्याम् ) = न तो पृथिवी में है और  ( न दिवि ) = न सूर्यलोक में है।  ( येन ) = जिसके सहारे से  ( वीरुधः ) = यह जड़ी-बूटियाँ सृष्टि के पदार्थ  ( प्राणन्ति ) = श्वास लेते हैं । 

    भावार्थ

    भावार्थ = सर्वव्यापक ब्रह्म भूमि और सूर्यादि किसी विशेष स्थान में वर्त्तमान नहीं है तो भी वह अपनी सत्ता मात्र से ओषधि, अन्नादि सब सृष्टि का नियम पूर्वक प्राणदाता है। ब्रह्मज्ञानी लोग ऐसे ब्रह्म का उपदेश करते हैं । 

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    भाषार्थ

    (जनासः) हे उत्पन्न मनुष्यो ! (इदम् विदथ) यह जानो ( महद् ब्रह्म ) महद्-बह्म का (वदिष्यति ) यह कथन करेगा कि (न तत् ) न वह (पृथिव्याम् ) केवल पृथिवी में है, (नो दिवि ) न केवल द्युलोक में है, (येन ) जिस द्वारा कि (वीरुधः) विरोहण करनेवाली ओषधियाँ (प्राणन्ति) प्राण धारण करती हैं, जीवित हैं।

    टिप्पणी

    [न पृथिव्याम् नो दिवि= अपितु वह सर्वत्र विद्यमान है। वह है महद्-ब्रह्म। सायण ने "महद्-ब्रह्म" का अर्थ किया है। "ब्रह्मण: प्रथमकार्यम् आप:"। सम्भवतः इसलिये कि वीरुधें आपः द्वारा ही " प्राणन्ति" हैं। परन्तु मन्त्र में महद्-ब्रह्म द्वारा समग्र जगत् को, चाहे वह जड़ हो या चेतन, अध्यात्म दृष्टि से देखा है। समग्र जगत् उसी द्वारा प्राणधारण कर रहा है, केवल "आप:" ही नहीं।]

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    विषय

    ब्रह्म का विवेचन।

    भावार्थ

    ( जनासः ) हे जीवो ! ( इदम् ) इस ( महत् ) सबसे महान् (ब्रह्म) ब्रह्म को ( विदथ ) तुम जानो, ( वदिष्यति ) यह ब्रह्म ज्ञानी उसके सम्बन्ध में उपदेश करेगा । यथाः—( तत् ) वह ब्रह्म ( न पृथिव्याम् ) न केवल पृथिवी में हैं, ( नो दिवि ) न धुलोक में हैं और न केवल अन्तरिक्ष में ही है, अपितु सर्वत्र है, वह वह है जिस द्वारा कि ( वीरुधः ) वनस्पति आदि जगत् ( प्राणन्ति ) प्राण धारण कर रहे हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मऋषिः । द्यावापृथिवी देवते । ब्रह्मसूक्तम् । १, ३, ४ अनुष्टुप् छन्दः । २ ककुम्मती । चतुऋचं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brahma: Life-Universal

    Meaning

    O seekers, know this. Only the self-realised soul would speak of life’s infinite and ultimate reality, the Spirit that is comprehended neither on the earth nor in heaven—the life spirit by which the forms and structures of life evolve and breathe in the expansive universe.

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    Subject

    Dyava--Prthivi-Cosmogony

    Translation

    O men, let you listen and understand this.He will speak of the great spiritual knowledge. That, from which the plants draw their life, is neither on earth nor in the sky.

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    Translation

    O' Ye people, know the great God, about whom the man of spiritual wisdom would tell you, through whom the plants breath life, is neither in earth nor in heaven but everywhere.

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    Translation

    O people, know this Mighty God, of Whom a seer will speak. He is present not only on Earth, or heaven, but everywhere. The plants receive breathing from Him.

    Footnote

    This verse clearly supports the theory that there is life in plants. This theory was put before the world by Dr. J.C. Bose. He got this idea from this verse and developed it to demonstrate its truth through scientific apparatus.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−इदम्। वक्ष्यमाणम्। जनासः। १८।१। आज्जसेरसुक्। पा० ७।१।५०। इति जसि असुक्। हे जनाः, विद्वांसः। विदथ। विद ज्ञाने अदादिः−लट् मध्यमबहुवचनं छन्दसि शः। यूयं वित्थ, जानीथ। महत्। १।१०।४। पूजनीयम् ब्रह्म। १।८।४। परब्रह्म, परमात्मानम्, परमकारणम्। वदिष्यति। वद वाक्ये−लृट्। कथयिष्यति। न। निषेधे। तत्। ब्रह्म। पृथिव्याम्। १।२।१। प्रख्यातायां भूमौ। नो इति। न−उ। नैव। दिवि। १।३०।३। द्युलोके, सूर्यमण्डले। येन। ब्रह्मणा। प्राणन्ति। प्र+अन जीवने, अदादिः। जीवन्ति, श्वसन्ति। वीरुधः। विशेषेण रुणद्धि वृक्षानन्यान् सा वीरुत्। वि+रुध आवरणे−क्विप्, दीर्घश्च। अथवा। वि+रुह प्रादुर्भावे−क्विप्। न्यङ्क्वादीनां च पा० ७।३।३५। इति हस्य धः। विरोहणशीलाः। वितस्ता लतादयः। लतादिवद् विरोहिताः सृष्टिपदार्थाः ॥

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    बंगाली (4)

    पदार्थ

    (জনাসঃ) হে মনুষ্য! (ইদং) ইহা (বিদথ) তুমি জানিতেছ, ব্রহ্মজ্ঞানী (মহৎ) পূজনীয় (ব্রহ্ম) পরব্রহ্মের মহিমা (বদিয়াতি) বলিলেন। (তৎ) সেই ব্রহ্ম (ন পৃথিব্যাং) শুধু সূর্য লোকে নহেন (য়েন) যাহার আশ্রয়ে (বীরুধঃ) গুল্ম লতা (প্রাণন্তি) শ্বাস গ্রহণ করে।।

    भावार्थ

    হে মনুষ্য! ইহা তুমি জান ব্রহ্মজ্ঞানীরাই পরব্রহ্মের মহিমা কীর্তন করেন। সেই ব্রহ্ম শুধু পৃথিবীতে বা সূর্যলোকে থাকেন না অর্থাৎ তিনি সর্বত্র। তাহার আশ্রয়ে তৃণ গুল্ম লতাও শ্বাস গ্রহণ করিতেছে।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    ইদং জনাসো বিদথ মহৎ ব্রহ্ম বদিস্যতি । ন তৎ পৃথিব্যাং নো দিবি য়েন প্রাণন্তি বারুধঃ।।

    ऋषि | देवता | छन्द

    ব্রহ্মা। দ্যাব্যাপৃথিবী। অনুষ্টুপ্

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    পদার্থ

     

    ইদং জনাসো বিদথ মহদ্ ব্রহ্ম বদিষ্যতি ৷

    ন তৎপৃথিব্যাং নো দিবি য়েন প্রাণন্তি বীরূধঃ ।।৭২।।

    (অথর্ব ১।৩২।১)

    পদার্থঃ (জনাসঃ) হে মানুষ! (ইদম্ বিদথ) এই কথা তুমি জেনে নাও যে ব্রহ্মবেত্তা পুরুষ (মহদ্ ব্রহ্ম বদিষ্যতি) পূজনীয় পরমব্রহ্মের উপদেশ প্রদান করেন । (তৎ) সেই ব্রহ্ম (ন পৃথিব্যাম্) না কেবল পৃথিবীতে আছেন (ন দিবি) না কেবল সূর্যলোকে আছেন, (য়েন) যার কৃপায় (বীরূধঃ) এই লতাগুল্ম সৃষ্ট হওয়া পদার্থ (প্রাণন্তি) শ্বাস নেয়। 

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ সর্বব্যাপক ব্রহ্ম কেবল ভূমি বা সূর্যাদি কোনো বিশেষ স্থানে বর্তমান নয়, তিনি সর্বব্যাপী। তিনি নিজ সত্তামাত্র থেকে ঔষধি অন্নাদি সব সৃষ্টির নিয়ম অনুসারে প্রাণদাতা। ব্রহ্মজ্ঞানী ব্যক্তি এমন ব্রহ্মেরই উপদেশ করেন ।।৭২।।

     

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    मन्त्र विषय

    (ব্রহ্মবিচারোপদেশঃ) ব্রহ্মবিচারের উপদেশ

    भाषार्थ

    (জনাসঃ) হে মনুষ্যগণ ! (ইদম্) এই কথা (বিদথ) তোমরা জানো, সেই [ব্রহ্মজ্ঞানী] (মহৎ) পূজনীয় (ব্রহ্ম) পরম ব্রহ্মের (বদিষ্যতি) কথন করবেন। (তৎ) সেই ব্রহ্ম (ন) না তো (পৃথিব্যাম্) পৃথিবীতে (নো) এবং না (দিবি) সূর্যলোকে রয়েছেন (যেন) যার সাহায্য দ্বারা (বীরুধঃ) এই বর্ধিত/ক্রমবর্ধমান ভেষজ [লতারূপ সৃষ্টির পদার্থ] (প্রাণন্তি) শ্বাস গ্রহণ করে ॥১॥

    भावार्थ

    যদিও সেই সর্বব্যাপী, সর্বশক্তিমান পরব্রহ্ম ভূমি বা সূর্য আদি কোনো বিশেষ স্থানে বর্তমান নয়, তবুও তিনি নিজের সত্তা মাত্র দ্বারা ঔষধি অন্ন আদি সকল সৃষ্টির নিয়মপূর্বক প্রাণদাতা। ব্রহ্মজ্ঞানীগণ সেই ব্রহ্মের উপদেশ প্রদান করেন॥১॥ কেনোপনিষদে বর্ণনা রয়েছে খণ্ড ১ মন্ত্র ৩। ন তত্র চক্ষুর্গগচ্ছতি ন বাগ্ গচ্ছতি নো মনো ন বিদ্মো ন বিজানীমো যথৈতদনুশিষ্যাদন্যদেব তদ্বিদিতাদথো অবিদিতাদধি। ইতি শুশ্রুম পূর্বেষাং যে নস্তদ্ ব্যাচচক্ষিরে ॥১॥ না সেখানে চক্ষু গমন করে, না বাণী গমন করে, না মন, আমরা না জানি না চিনি, কিরূপে তিনি এই জগতের অনুশাসন করেন। তিনি জ্ঞাত বস্তু থেকে ভিন্ন এবং অজ্ঞাত বস্তুরও উপরে। এরূপ আমরা পূর্বজদের থেকে শুনেছি, যারা আমাদের সেই পরমেশ্বরের শিক্ষা দিয়েছিলেন ॥ আরও কেনোপনিষদের বচন রয়েছে, অ০ ১ ম০ ৮ ॥ যৎ প্রাণে ন প্রাণিতি যেন প্রাণঃ প্রণীয়তে। তদেব ব্রহ্ম ত্বং বিদ্ধি নেদং যদিদমুপাসতে ॥২॥ যিনি প্রাণ দ্বারা না শ্বাস গ্রহণ করেন, বরং যাঁর দ্বারা প্রাণ চালিত হয়, তাঁকেই তুমি ব্রহ্ম বলে জানো। এটি ব্রহ্ম নয় যার পাশে তারা বসে রয়েছে। ॥

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    भाषार्थ

    (জনাসঃ) হে উৎপন্ন মনুষ্যগণ ! (ইদম্ বিদথ) এটা জানো যে, এই [ব্রহ্মজ্ঞানী] (মহদ্ ব্রহ্ম) পূজনীয়-ব্রহ্মের (বদিষ্যতি) এই কথন করবেন যে, (ন তৎ) না তিনি [ব্রহ্ম] (পৃথিব্যাম্) কেবল পৃথিবীতে রয়েছেন, (নো দিবি) না কেবল দ্যুলোকে রয়েছেন, (যেন) যেই ব্রহ্মের সহায়তায় (বীরুধঃ) উৎপন্ন ঔষধি (প্রাণন্তি) প্রাণ ধারণ করে, জীবিত আছে।

    टिप्पणी

    [ন পৃথিব্যাম্ নো দিবি=বরং তিনি সর্বত্র বিদ্যমান রয়েছেন। তিনি হলেন মহদ্-ব্রহ্ম। সায়ণ "মহৎ-ব্রহ্ম" এর অর্থ করেছেন "ব্রহ্মণঃ প্রথমকার্যম্ আপঃ"। সম্ভবতঃ এজন্যই যে বীরুৎ জল দ্বারাই "প্রাণন্তি" হয়। কিন্তু মন্ত্রে মহদ্-ব্রহ্ম দ্বারা সমগ্র জগতকে, তা জড় হোক বা চেতন, আধ্যাত্ম দৃষ্টিতে দেখা হয়েছে। সমগ্র জগৎ উনার দ্বারাই প্রাণধারণ করছে, কেবল "আপঃ" নয়।]

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