अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 32 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 32/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - द्यावापृथिवी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - महद्ब्रह्मा सूक्त

    इ॒दं ज॒नासो॑ वि॒दथ॑ म॒हद्ब्रह्म॑ वदिष्यति। न तत्पृ॑थि॒व्यां नो॑ दि॒वि येन॑ प्रा॒णन्ति॑ वी॒रुधः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒दम् । ज॒ना॒स॒: । वि॒दथ॑ । म॒हत् । ब्रह्म॑ । व॒दि॒ष्य॒ति॒ । न । तत् । पृ॒थि॒व्याम् । नो इति॑ । दि॒वि । येन॑ । प्रा॒णन्ति॑ । वी॒रुध॑: ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदं जनासो विदथ महद्ब्रह्म वदिष्यति। न तत्पृथिव्यां नो दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इदम् । जनास: । विदथ । महत् । ब्रह्म । वदिष्यति । न । तत् । पृथिव्याम् । नो इति । दिवि । येन । प्राणन्ति । वीरुध: ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 32; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (जनासः) हे मनुष्यो ! (इदम्) इस बात को (विदथ) तुम जानते हो, वह [ब्रह्मज्ञानी] (महत्) पूजनीय (ब्रह्म) परम ब्रह्म का (वदिष्यति) कथन करेगा। (तत्) वह ब्रह्म (न) न तो (पृथिव्याम्) पृथिवी में (नो) और न (दिवि) सूर्य्यलोक में है (येन) जिसके सहारे से (वीरुधः) यह उगती हुयी जड़ी-बूटी [लतारूप सृष्टि के पदार्थ] (प्राणन्ति) श्वास लेती हैं ॥१॥

    भावार्थ -
    यद्यपि वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् परब्रह्म भूमि वा सूर्य्य आदि किसी विशेष स्थान में वर्तमान नहीं है, तो भी वह अपनी सत्ता मात्र से ओषधि अन्न आदि सब सृष्टि का नियमपूर्वक प्राणदाता है। ब्रह्मज्ञानी लोग उस ब्रह्म का उपदेश करते हैं ॥१॥ केनोपनिषत् में वर्णन है, खण्ड १ मन्त्र ३। न तत्र चक्षुर्गगच्छति न वाग् गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद् व्याचचक्षिरे ॥१॥ न वहाँ आँख जाती है, न वाणी जाती है, न मन, हम न जानते हैं न पहिचानते हैं, कैसे वह इस जगत् का अनुशासन करता है। वह जाने हुए से भिन्न है और न जाने हुए से ऊपर है। ऐसा हमने पूर्वजों से सुना है, जिन्होंने हमें उसकी शिक्षा दी थी ॥ और भी केनोपनिषत् का वचन है, अ० १ म० ८ ॥ यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥२॥ जो प्राण द्वारा नहीं श्वास लेता है। जिस करके प्राण चलाया जाता है, उसको ही तू ब्रह्म जान, यह वह नहीं है जिसके पास वे बैठते हैं ॥

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