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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 35/ मन्त्र 4
    ऋषिः - अथर्वा देवता - हिरण्यम्, इन्द्राग्नी, विश्वे देवाः छन्दः - अनुष्टुब्गर्भा चतुष्पदा त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
    111

    समा॑नां मा॒सामृ॒तुभि॑ष्ट्वा व॒यं सं॑वत्स॒रस्य॒ पय॑सा पिपर्मि। इ॑न्द्रा॒ग्नी विश्वे॑ दे॒वास्ते ऽनु॑ मन्यन्ता॒महृ॑णीयमानाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    समा॑नाम् । मा॒साम् । ऋ॒तुऽभि॑: । त्वा॒ । व॒यम् । स॒म्ऽव॒त्स॒रस्य॑ । पय॑सा । पि॒प॒र्मि॒ ।इ॒न्द्र॒ग्नी इति॑ । विश्वे॑ । दे॒वा: । ते । अनु॑ । म॒न्य॒न्ता॒म् । अहृ॑णीयमाना: ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समानां मासामृतुभिष्ट्वा वयं संवत्सरस्य पयसा पिपर्मि। इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते ऽनु मन्यन्तामहृणीयमानाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    समानाम् । मासाम् । ऋतुऽभि: । त्वा । वयम् । सम्ऽवत्सरस्य । पयसा । पिपर्मि ।इन्द्रग्नी इति । विश्वे । देवा: । ते । अनु । मन्यन्ताम् । अहृणीयमाना: ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 35; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सुवर्ण आदि धन प्राप्ति के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (वयम्) हम लोग (त्वा) तुझको [आत्मा को] (समानाम्) अनुकूल (मासाम्) महीनों की (ऋतुभिः) ऋतुओं से और (संवत्सरस्य) वर्ष के (पयसा) दुग्ध वा रस से (पिपर्मि=पिपर्मः) पूर्ण करते हैं। (इन्द्राग्नी) वायु और अग्नि [वायु और अग्नि के समान गुणवाले] (ते) वह (विश्वे देवाः) सब दिव्य गुणयुक्त पुरुष (अहृणीयमानाः) संकोच न करते हुए (अनु मन्यन्ताम्) [हम पर] अनुकूल रहें ॥४॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य महीनों, ऋतुओं और वर्षों का अनुकूल विभाग करते हैं, वह वर्ष भर की उपज, अन्न, दूध, फल, पुष्प आदि से पुष्ट रहते हैं और वायु के समान वेगवाले और अग्नि के समान तेजस्वी विद्वान् महात्मा उस पुरुषार्थी मनुष्य के सदा शुभचिन्तक होते हैं ॥३॥

    टिप्पणी

    ४−उमानाम्। षम वैक्लव्ये पचाद्यच्। अविषमानाम्। पूर्णानाम्। साधूनाम्, अनुकूलानाम्। मासाम्। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति माङ् माने−असुन्। मासानाम्। ऋतुभिः। अर्त्तेश्च तुः। उ० १।७२। इति ऋ गतौ−तु, स च कित्। वसन्तादिकालविशेषैः। त्वा। त्वाम् पुरुषम्। सम्-वत्सरस्य। संपूर्वाच्चित्। उ० ३।७२। इति सम्+वस निवासे−सरन्, सस्य तकारः। संवसन्ति ऋतवो यत्र। वर्षस्य, द्वादशमासात्मकस्य कालस्य। पयसा। पय गतौ वा पीङ् पाने−असुन्। दुग्धेन सारेण वा, धान्यफलादिना, इत्यर्थः। पिपर्मि। पॄ पालनपूरणयोः, जुहोत्यादिः। एकवचनं बहुवचने। वयं पिपर्मः पालयामः, पूरयामः। इन्द्राग्नी। वाय्वग्नी। यथा श्रीमद्दयानन्दभाष्ये, य० २१।२०। इन्द्राग्नी=इन्द्रश्चाग्निश्च तौ वाय्वग्नी। तद्वद् गुणवन्तः। विश्वे। सर्वे। देवाः। दिव्यगुणाः पुरुषाः। अनु-मन्यन्ताम्। अनु+मन बोधे−लोट्। अनुजानन्तु, स्वीकुर्वन्तु, अनुकूलं कुर्वन्तु। अहृणीयमानाः। कण्ड्वादिभ्यो यक्। पा० ३।१।२७। इति हृणीङ् रोषणे लज्जायां वैमनस्ये च−यक्। ङित्त्वाद् आत्मनेपदम्। ततः शानच्। हृणीयते=क्रुध्यति, निघ० २।१२। अक्रुध्यन्तः, असङ्कुचन्तः ॥ इति षष्ठोऽनुवाकः ॥ इति प्रथमं काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाडाधिष्ठितबडोदेपुरीगतश्रावणमास-दक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये प्रथमं काण्डं समाप्तम् ॥ इदं काण्डं प्रयागनगरे श्रावणमासे रक्षाबन्धनतिथौ १९६९ तमे विक्रमीये संवत्सरे धीरवीरचिरप्रतापिमहायशस्विश्रीराजराजेश्वरजार्जपञ्चममहोदयस्य सुसाम्राज्ये सुसमाप्तिमगात् ॥

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    विषय

    गृहस्थ में संयम

    पदार्थ

    १. (वयम्) = कर्मतन्तु का सन्तान करनेवाला [वेञ् तन्तुसन्ताने] मैं, है [जलों के तेज] बीर्य ! (त्वा) = तुझे (समानां पयसा) = शुक्ल व कृष्णपक्ष के आप्यायन से (पिपर्मि) = अपने में पूरित करता हूँ। मास समरूप से शुक्ल व कृष्ण इन दो पक्षों में बँटा होता है, अत: इन पक्षों को यहाँ 'समा' शब्द से स्मरण किया गया है। गृहस्थ में होते हुए भी कम-से-कम पक्षभर अपने में शक्ति को पूर्ण करने का प्रयत्न करना चाहिए। इससे ऊपर उठकर (मासाम्) = [पयसा पिपर्मि]-मासों के आप्यायन से इस शक्ति को अपने में पूरित करता हूँ और उन्नत होकर (ऋतुभि:) = दो-दो मास से बनी हुई ऋतुओं से मैं इसे अपने में धारण करता हूँ और इससे उत्तम सङ्कल्प यह है कि संवत्सरस्य [पयसा पिपर्मि]-वर्षभर के आप्यायन से मैं तुझे अपने में पूरित करता हूँ। २. इसप्रकार अपने में शक्ति का संयम करने पर (इन्द्राग्नी) = इन्द्र और अग्नि-शक्ति तथा प्रकाश के देवता तथा (ते विश्वेदेवाः) = वे अन्य सब दिव्य गुण भी (अहणीयमाना:) = हमारे प्रति किसी भी प्रकार के रोषवाले न होते हुए (अनुमन्यन्ताम्) = अनुकूल मतवाले हों, अर्थात् इस शक्ति के रक्षण से हमें सब दिव्य गुणों की प्राप्ति हो।

    भावार्थ

    शक्ति के रक्षण के लिए मनुष्य गृहस्थ में भी पर्यास संयम से चले और अपने में दिव्य गुणों का वर्धन करे।

    विशेष

    सम्पूर्ण सूक्त 'हिरण्य बन्धन', अर्थात् हितरमणीय वीर्यशक्ति को शरीर में ही बद्ध करने के महत्त्व को प्रतिपादित कर रहा है। इसका बन्धन करनेवाला 'अथर्वा' है-वासनाओं से डाँवाडोल न होनेवाला।

    यहाँ प्रथम काण्ड समाप्त होता है। इस काण्ड का आरम्भ आचार्य द्वारा विद्यार्थी में शरीर की शक्तियों को धारण कराने से होता है। उन शक्तियों को धारण करने के लिए समाप्ति पर यह 'हिरण्य-बन्धन'-वीर्यरक्षण साधनरूप से उपदिष्ट हुआ है। एवं, जीवन का पहला नियम यही है कि 'हम पूर्ण स्वस्थ बनें। स्वास्थ्य के लिए वीर्य का रक्षण करें'। इस नियम का पालन करनेवाला अब प्रभु-भक्ति की कामनावाला बनता है। 'वेनृ' धातु का अर्थ to know, to perceive तथा to worship है। उस प्रभु की महिमा को देखना, उसके द्वारा प्रभु को जानना व उसकी पूजा-उपासना करना। यह 'वेन' ही द्वितीय काण्ड के प्रथम सूक्त का ऋषि है।

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    भाषार्थ

    (समानाम्) चान्द्रवर्षों के (मासाम्) मासों सम्बन्धी (ऋतुभिः) ऋतुओं के [ज्ञान१] द्वारा (संवत्सरस्य) तथा सौरवर्ष के [मासों सम्बन्धी ऋतुओं के [ज्ञान१] द्वारा (वयम् ) हम गुरुजन (त्वा) हे ब्रह्मचारिन् ! तुझे पूरित करते हैं, ( पृ पूरणे ) तथा (पयसा) दुग्ध आदि सात्त्विक अन्न द्वारा (पिपर्मि) मैं आचार्य तुझे परिपालित करता हूँ। (इन्द्राग्नी ) साम्राज्य का इन्द्र अर्थात् सम्राट्, तथा अग्नि अर्थात अग्रणी प्रधानमन्त्री तथा (विश्वेदेवाः) सब दिव्य अधिकारी (अहृणीयमानाः) रोष के बिना (ते) तेरे लिये [हे ब्रह्मवारिन् ! ] (अनु मन्यन्ताम् ) अनुमोदित करें, स्वीकृत करें।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में वयम् द्वारा बहुवचन तथा पिपर्मि द्वारा एकवचन के कथन से पदान्वय क्लिष्ट हुआ है। अहृणीयमानाः= हृणीङ् रोषणे (कण्ड्वादिः)। गुरुकुलों की पाठविधि तथा भोजन की व्यवस्था केवल गुरुजनों तथा आचार्य के अधीन हो जाने से साम्राज्य के अधिकारियों में दोष होना सम्भावित है। इन्द्रः= सम्राट् (यजु:० ८।३७)। पिपर्मि=पॄ पालनपूरणयोः (जुहोत्यादिः)। ह्रस्वान्तोऽयमित्येके (जुहोत्यादिः)।] [१. ज्ञान यथा "चान्द्र वर्ष=३५४ दिन का। चान्द्र मास है दर्श से दर्श तक २९ १/२ दिन का। संवत्सर है पृथिवी का सूर्य-की-परिक्रमा का काल ३६५ दिनों का, और प्रति चतुर्थ वर्ष ३६६ दिनों का। ऋतुएं हैं ६। इत्यादि ज्ञान ब्रह्मचारी को गुरुजन देते हैं।] [सूक्त ३५ का सार-- कौशिक सूत्रानुसार (५७।३१) उपनयनकर्मण्यपि आयुष्कामस्य ब्रह्मचारिणः आज्यहोमे विनियुक्तम् कहा है। उपनयन है समीप प्राप्त करना, उप (समीप) + नयन (णीञ् प्रापणे)। आचार्य ब्रह्मचारी का उपनयन कर उसे अपने समीप प्राप्त कर लेता है, ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट कर लेता है। एतदनुसार ही सूक्तार्थ किया गया है। अतः सूक्त में "हिरण्य" का अर्थ है रेत: अर्थात् वीर्य, और "प्रथमजम् ओज:" का अर्थ है प्रथमाश्रम में पैदा हुआ ओज (मन्त्र २)। उपनयन और इसके उद्देश्य की व्याख्या (अथर्व० ११।७।३) में देखो।]

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    विषय

    दीर्घ जीवन का उपाय।

    भावार्थ

    ( वयं ) हम आचार्यगण ( त्वा ) तुझ ब्रह्मचारी को ( समानां ) बहुत वर्षों और ( मासानां ) मासों और ( संवत्सरस्य ) पूर्ण वर्ष के ( पयसा ) पयस=पुष्टिकारक सारभूत सामर्थ्य से और ( ऋतुभिः ) नाना ऋतुओं के बल से ( पिपर्मि ) तपद्वारा पूर्ण करते हैं ( इन्द्राग्नी ) इन्द्र परमेश्वर और अग्नि तुम्हारा मुख्य आचार्य दोनों और ( विश्वदेवाः ) समस्त उपस्थित विद्वान् पुरुष ( अहृणीयमानाः ) संकोच रहित होकर ( ते ) तुझे इस उत्तम कार्य के निमित्त ( अनुमन्यन्ताम् ) अनुमति दें। इति षष्ठोऽनुवाकः। प्रथमं काण्डं समाप्तम्। [ पञ्चत्रिंशञ्च सूक्तानि त्रिपञ्चाशत् शतं ऋचः ]

    टिप्पणी

    ‘ऋतुभिस्तघाऽहम् संव०’ इति ह्विटनिकामितः पाठः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    आयुष्कमोऽथर्वा ऋषिः। हिरण्यं विश्वेदेव वा देवताः। १-३ जगत्यः। ४ अनुष्टुप् गर्भा चतुष्पदा त्रिष्टुप्। चतुर्ऋचं सूक्तम् ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Health, Efficiency and Long Age

    Meaning

    We strengthen you toward completion of your personality with the vigour and vitality of life and nature over months and years season by season. May Indra, Agni and all the divinities of nature and humanity be favourable to you without reserve or hesitation.

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    Translation

    With the seasons of even months (samana masa) I fill you with the milk of the year. May the resplendent Lord, the adorable Lord and all the enlightened ones approve you ungrudgingly.

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    Translation

    We fill him with the vigour of juice produced in the year through the round of months, seasons and autumns. May the forces like Indra, the electricity; Agni, the heat and other physical forces without causing damage be suitable to him.

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    Translation

    We fill thee with the strength of friendly mouths and seasons, with the full year's sweet essence do we fill thee. May God, thy teacher and all learned persons without hesitation give thee their assent, to fulfill thy vow of celibacy.

    Footnote

    ‘We’ refers to Acharyas, preceptors, Thee refers to the Brahmchari. Sweet essence refers to milk, fruits and com, the Brahmchari uses during the year.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−उमानाम्। षम वैक्लव्ये पचाद्यच्। अविषमानाम्। पूर्णानाम्। साधूनाम्, अनुकूलानाम्। मासाम्। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति माङ् माने−असुन्। मासानाम्। ऋतुभिः। अर्त्तेश्च तुः। उ० १।७२। इति ऋ गतौ−तु, स च कित्। वसन्तादिकालविशेषैः। त्वा। त्वाम् पुरुषम्। सम्-वत्सरस्य। संपूर्वाच्चित्। उ० ३।७२। इति सम्+वस निवासे−सरन्, सस्य तकारः। संवसन्ति ऋतवो यत्र। वर्षस्य, द्वादशमासात्मकस्य कालस्य। पयसा। पय गतौ वा पीङ् पाने−असुन्। दुग्धेन सारेण वा, धान्यफलादिना, इत्यर्थः। पिपर्मि। पॄ पालनपूरणयोः, जुहोत्यादिः। एकवचनं बहुवचने। वयं पिपर्मः पालयामः, पूरयामः। इन्द्राग्नी। वाय्वग्नी। यथा श्रीमद्दयानन्दभाष्ये, य० २१।२०। इन्द्राग्नी=इन्द्रश्चाग्निश्च तौ वाय्वग्नी। तद्वद् गुणवन्तः। विश्वे। सर्वे। देवाः। दिव्यगुणाः पुरुषाः। अनु-मन्यन्ताम्। अनु+मन बोधे−लोट्। अनुजानन्तु, स्वीकुर्वन्तु, अनुकूलं कुर्वन्तु। अहृणीयमानाः। कण्ड्वादिभ्यो यक्। पा० ३।१।२७। इति हृणीङ् रोषणे लज्जायां वैमनस्ये च−यक्। ङित्त्वाद् आत्मनेपदम्। ततः शानच्। हृणीयते=क्रुध्यति, निघ० २।१२। अक्रुध्यन्तः, असङ्कुचन्तः ॥ इति षष्ठोऽनुवाकः ॥ इति प्रथमं काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाडाधिष्ठितबडोदेपुरीगतश्रावणमास-दक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये प्रथमं काण्डं समाप्तम् ॥ इदं काण्डं प्रयागनगरे श्रावणमासे रक्षाबन्धनतिथौ १९६९ तमे विक्रमीये संवत्सरे धीरवीरचिरप्रतापिमहायशस्विश्रीराजराजेश्वरजार्जपञ्चममहोदयस्य सुसाम्राज्ये सुसमाप्तिमगात् ॥

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    बंगाली (3)

    पदार्थ

    হে আত্মন! (বয়ং) আমরা (ত্বা) তোমাকে (সমানাং) অনুকূল (মাসাং) মাসের (ঋতুভিঃ) ঋতু দ্বারা (পিপর্মি) পূর্ণ করি। (ইন্দ্রাগ্নী) বায়ুর তুল্য বলবান ও অগ্নির তুল্য তেজস্বী (তে) সেই (বিশ্বে দেবাঃ) সব দিব্য গুণযুক্ত পুরুষ (অহনীয়মানাঃ) সংকোচ না করিয়া (অন্যমন্যন্তাং) আমাদের প্রতি অনুকূল থাকুন।।

    भावार्थ

    হে আত্মন! আমরা অনুকূল মাস ও ঋতু দ্বারা এবং বর্ষব্যাপিী রস দ্বারা তোমাকে পূর্ণ করি। বায়ু তুল্য বলবান ও অগ্নি তুল্য তেজস্বী দিব্য গুণ যুক্ত পুরুষেরা সংকোচ না করিয়া আমাদের প্রতি অনুকূল আচরণ করুন।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    সমানাং মাসামৃতুভিষ্টবা বয়ং সংবৎসরস্য পয়সা পিপর্মি। ইন্দ্ৰাগ্নী বিশ্বে দেবাস্তেনু মন্যন্তামহণীয়মানাঃ।।

    ऋषि | देवता | छन्द

    অর্থবা (আয়ুষ্কামঃ)। হিরণ্যম্। অনুষ্টুগৰ্ভা চতুষ্পদা ত্রিষ্টুপ্

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    मन्त्र विषय

    (সুবর্ণাদিধনলাভোপদেশঃ) সুবর্ণ আদি ধন প্রাপ্তির জন্য উপদেশ

    भाषार्थ

    (বয়ম্) আমরা (ত্বা) তোমাকে [আত্মাকে] (সমানাম্) অনুকূল (মাসাম্) মাসের (ঋতুভিঃ) ঋতুসমূহে এবং (সংবৎসরস্য) বর্ষের (পয়সা) দুগ্ধ বা রস দ্বারা (পিপর্মি=পিপর্মঃ) পূর্ণ করি। (ইন্দ্রাগ্নী) বায়ু এবং অগ্নি [বায়ু এবং অগ্নির ন্যায় গুণবান] (তে) সেই (বিশ্বে দেবাঃ) সকল দিব্য গুণযুক্ত পুরুষ (অহৃণীয়মানাঃ) সংকোচ না করে (অনু মন্যন্তাম্) [আমরাদের] অনুকূল থাকুক ॥৪॥

    भावार्थ

    যে মনুষ্য মাসের, ঋতুর এবং বর্ষের অনুকূল বিভাগ করেন, তিনি সম্পূর্ণ বর্ষ উপজ, অন্ন, দুধ, ফল, পুষ্প আদি দ্বারা পুষ্ট থাকেন এবং বায়ুর ন্যায় বেগবান এবং অগ্নির ন্যায় তেজস্বী বিদ্বান মহাত্মা সেই পুরুষার্থী মনুষ্যের সদা শুভচিন্তক হয়ে থাকেন ॥৪॥

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    भाषार्थ

    (সমানাম্) চান্দ্রবর্ষের (মাসাম্) মাস সম্বন্ধিত (ঋতুভিঃ) ঋতুর [জ্ঞান ১] দ্বারা (সংবৎসরস্য) তথা সৌর বর্ষের [মাস সম্বন্ধিত ঋতুর [জ্ঞান] দ্বারা (বয়ম্) আমরা গুরুজন (সা) হে ব্রহ্মচারী ! তোমাকে পরিপূর্ণ করি, [পৄ পূরণে] এবং (পয়সা) দুগ্ধ আদি সাত্ত্বিক অন্ন দ্বারা (পিপর্মি) আমি আচার্য তোমাকে পরিপালিত করি। (ইন্দ্রাগ্নী) সাম্রাজ্যের ইন্দ্র অর্থাৎ সম্রাট, এবং অগ্নি অর্থাৎ অগ্রণী প্রধানমন্ত্রী এবং (বিশ্বেদেবাঃ) সমস্ত দিব্য অধিকারী (অহৃণীয়মানাঃ) রোষ ছাড়া, (তে) তোমার জন্য [হে ব্রহ্মচারী !] (অনু মন্যতাম্) অনুমোদিত করে/করুক, স্বীকৃত করে/করুক।

    टिप्पणी

    [মন্ত্রে বয়ম্ দ্বারা বহুবচন তথা পিপর্মি দ্বারা একবচনের কথনে পদান্বয় ক্লিষ্ট হয়েছে। অহৃণীয়মানাঃ=হ্রীণঙ্ রোষণে (কণ্ড্বাদিঃ)। গুরুকুলের পাঠবিধি ও ভোজনের ব্যবস্থা কেবল গুরুজন এবং আচার্যের অধীন হয়ে যাওয়ায় সাম্রাজ্যের আধিকারিকদের মধ্যে দোষ হওয়ার সম্ভাবনা রয়েছে। ইন্দ্রঃ=সম্রাট্ (যজুঃ০ ৮।৩৭)। পিপর্মি= পৄ পালনপূরণয়োঃ (জুহোত্যাদিঃ)। হ্রস্বান্তোঽয়মিত্যেকে (জুহোত্যাদিঃ)।] --সূক্ত ৩৫ এর সার -- কৌশিক সূত্রানুসারে (৫৭।৩১) উপনয়নকর্মণ্যপি আয়ুষ্কামস্য ব্রহ্মচারিণঃ আজ্যহোমে বিনিযুক্তম্ বলা হয়েছে। উপনয়ন হলো সম্মুখীন প্রাপ্ত করা, উপ (সমীপ) + নয়ন (ণীঞ্ প্রাপণে)। আচার্য ব্রহ্মচারীর উপনয়ন করে তাঁকে নিজের নিকটবর্তী করে নেয়, ব্রহ্মচর্যাশ্রমে প্রবিষ্ট করে নেয়। এতদনুসারে সূক্তার্থ করা হয়েছে। অতএব সূক্তে "হিরণ্য" এর অর্থ হলো রেতঃ অর্থাৎ বীর্য, এবং "প্রথমজম্ ওজঃ" এর অর্থ হলো প্রথমাশ্রমে উৎপন্ন ওজ (মন্ত্র ২)। উপনয়ন এবং ইহার উদ্দেশ্যের ব্যাখ্যা (অথর্ব০১১।১৭।৩) তে দেখো।] [১. জ্ঞান যথা "চান্দ্র বর্ষ=৩৫৪ দিনের। চান্দ্র মাস হলো ২৯-১/২(সাড়ে উনত্রিশ) দিনের। সংবৎসর হলো পৃথিবীর সূর্যের পরিক্রমার সময় ৩৬৫ দিনের, এবং প্রতি চতুর্থ বর্ষ ৩৬৬ দিনের। ঋতু হলো ৬টি। ইত্যাদি জ্ঞান ব্রহ্মচারীকে গুরুজন দেয়। ইহা কালজ্ঞান।]

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