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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 6 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 1
    ऋषिः - सिन्धुद्वीपं कृतिः, अथवा अथर्वा देवता - अपांनपात् सोम आपश्च देवताः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - जल चिकित्सा सूक्त
    341

    शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शं योर॒भि स्र॑वन्तु नः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शम् । न॒: । दे॒वी: । अ॒भिष्ट॑ये । आप॑: । भ॒व॒न्तु॒ । पी॒तये॑ ।शम् । यो: । अ॒भि । स्र॒व॒न्तु॒ । न॒: ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शम् । न: । देवी: । अभिष्टये । आप: । भवन्तु । पीतये ।शम् । यो: । अभि । स्रवन्तु । न: ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आरोग्यता के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (देवीः) दिव्य गुणवाले (आपः) जल [जल के समान उपकारी पुरुष] (नः) हमारे (अभिष्टये) अभीष्ट सिद्धि के लिये और (पीतये) पान वा रक्षा के लिये (शम्) सुखदायक (भवन्तु) होवें। और (नः) हमारे (शम्) रोग की शान्ति के लिये और (योः) भय दूर करने के लिये (अभि) सब ओर से (स्रवन्तु) वर्षा करें ॥१॥

    भावार्थ

    वृष्टि से जल के समान उपकारी पुरुष सबके दुःख की निवृत्ति और सुख की प्रवृत्ति में प्रयत्न करते रहें ॥१॥ मन्त्र १, यजुर्वेद ३६।१२। मन्त्र १-३ ऋग्वेद म० १० सू० ९ म० ४, ६, ७। तथा मन्त्र २, ३ ऋग्वेद म० १ सू० २३ म० २०, २१ हैं ॥

    टिप्पणी

    १−शम्। १।३।१। सुखं, सुखकारिण्यः। देवीः। १।४।३। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति जसि पूर्वसवर्णदीर्घः। देव्यः। दिव्याः। अभिष्टये। अभि+इष वाञ्छायाम्-क्तिन्। शकन्ध्वादिषु पररूपं वक्तव्यम्। वा० पा० ६।१।९४। इति पररूपम्। अभीष्टसिद्धये। आपः। १।४।३। जलानि, जलवद् गुणिनः पुरुषाः। पीतये। घुमास्थागापाजहातिसां हलि। पा० ६।४।६६। इति पा पाने-क्तिनि प्रत्यये ईत्वम्। यद्वा। पा रक्षणे, ओप्यायी, प्यैङ् वृद्धौ वा-क्तिन्, क्तिच् वा। यथा। पः किच्च। उ० १।७१। इति पा-तु प्रत्ययः। पिबति पाति वा स पीतुः। कित्वाद् ईकारः। पानाय, रक्षणाय, वृद्धये। शम्। १।३।१। रोगशमनाय। योः। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति यु मिश्रणामिश्रणयोः-विच्, सकारश्छान्दसः यद्वा। यु-डोस्। शंयोः....... शमनं च रोगाणां यावनं च भयानाम्, इति निरु०। ४।२१। भयपृथक्कारणाय। अभि। सर्वतः। स्रवन्तु। स्रु प्रस्रवणे। वर्पन्तु ॥

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    विषय

    रोगशमन-भययावन

    पदार्थ

    १. (न:) = हमारे लिए (देवी:) = रोगों को जीतने की कामनावाले [दिव् विजिगीषा] (आप:) = जल (शम्) = शान्ति देनेवाले हों। ये जल (अभिष्टये) = रोगों पर आक्रमण करने के लिए हों और इसप्रकार (पीतये) = रक्षण के लिए (भवन्तु) = हों। जल रोगों को जीतने की कामना करते हैं, उनपर आक्रमण करते हैं और उन्हें समाप्त करके हमारा रक्षण करते हैं। यहाँ विजय-प्राप्ति के क्रम का अति सुन्दरता से उपक्षेप हुआ है-'कामना, आक्रमण, विजय'। विजय-प्राप्ति के लिए प्रत्येक क्षेत्र में सर्वप्रथम कामना की आवश्यकता होती है, उसके बाद पुरुषार्थ और तब विजय सम्भव होती है। २. (शंयो:) = शान्ति देनेवाले, रोगों का शमन और भयों का यावन करनेवाले ये जल (न:) = हमारे (अभि) = दोनों ओर (स्त्रवन्तु) = प्रवाहित हों। अन्दर पीने के रूप में तथा बाहर स्नान के रूप में इनका प्रयोग होता है। इस प्रयोग में सामान्य नियम है कि 'अन्दर गरम, बाहर ठण्डा'। ठण्डे पानी से स्नान पौष्टिक है और 'गरम पानी पीना' कफ-रोगों को न होने देने का साधन है।

    भावार्थ

    जल रोगों पर आक्रमण करके हमारा रक्षण करते हैं। ये रोगों का शमन व भयों का यावन [दूर] करनेवाले हैं।

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    भाषार्थ

    (देवी=देव्यः) दिव्य गुणों वाले (आप:) जल (नः शम्) हमारे लिये शान्तिदायक, (अभिष्टये) अभीष्ट सुख के लिये (पीतये) तथा पीने के लिये (भवन्तु) हों । (शम् ) प्राप्त रोगों के शमन के लिये (योः) तथा भविष्य में आनेवाले रोगों के भय को पृथक करने के लिये (न:) हमारी ओर (अभिस्रवन्तु) प्रवाहित हों।

    टिप्पणी

    [योः=यु अमिश्रणे (अदादिः), अमिश्रणम्=पृथक्करणम्। यो:= यु+ डोस् (औणादिक प्रत्यय) शं योः = "शमनं च रोगाणां यावनं च भयानाम्" निरुक्त (४।३।२१)।]

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    विषय

    जलों का वर्णन

    भावार्थ

    ( देवीः ) दिव्यगुणयुक्त ( आपः ) जल ( नः ) हमारे ( अभिष्टये ) यज्ञ और अभीष्ट सुख साधन के लिये और (पीतये ) पान करने के लिये ( शं ) कल्याणकारी हों और ( नः ) हमारे ( शं ) प्राप्त रोगों के शमन और ( योः ) रोगों को दूर ही से निवारण करने के लिये ( अभि स्रवन्तु ) सब ओर से बहें, स्रवित हों ।

    टिप्पणी

    ‘शं नो भवन्तु पीतये ’ इति सामवेदे ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अपोनप्त्रीयं सूक्तम्। अथर्वा कृतिः सिन्धुद्वीपश्च ऋषी। ऋग्वेदे त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धु द्वीपोऽवाम्बरीष ऋषिः। आपो देवताः। पथ्यापंक्तिश्छन्दः । चतुर्ऋचं सृक्तम् ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Waters for Health and Happiness

    Meaning

    May the divine waters be for our peace and bliss of our cherished desire and bring us showers of peace, protection and blessedness with freedom from ill health and disease.

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    Translation

    May the divine waters be propitious to us, for the fulfillment of desires, and for our drinking. Let them shower on us joy and fearlessnéss. (also Rg. X.9.4)

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    Translation

    May these wholesome waters be the sources of Pleasure to us for the sake of desired health and drinking purpose and may they rain down happiness on us all around.

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    Translation

    May excellent waters be helpful for our bliss and drink. May they flow all round, for curing our ailments, and preventing us from falling a prey to them.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−शम्। १।३।१। सुखं, सुखकारिण्यः। देवीः। १।४।३। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति जसि पूर्वसवर्णदीर्घः। देव्यः। दिव्याः। अभिष्टये। अभि+इष वाञ्छायाम्-क्तिन्। शकन्ध्वादिषु पररूपं वक्तव्यम्। वा० पा० ६।१।९४। इति पररूपम्। अभीष्टसिद्धये। आपः। १।४।३। जलानि, जलवद् गुणिनः पुरुषाः। पीतये। घुमास्थागापाजहातिसां हलि। पा० ६।४।६६। इति पा पाने-क्तिनि प्रत्यये ईत्वम्। यद्वा। पा रक्षणे, ओप्यायी, प्यैङ् वृद्धौ वा-क्तिन्, क्तिच् वा। यथा। पः किच्च। उ० १।७१। इति पा-तु प्रत्ययः। पिबति पाति वा स पीतुः। कित्वाद् ईकारः। पानाय, रक्षणाय, वृद्धये। शम्। १।३।१। रोगशमनाय। योः। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति यु मिश्रणामिश्रणयोः-विच्, सकारश्छान्दसः यद्वा। यु-डोस्। शंयोः....... शमनं च रोगाणां यावनं च भयानाम्, इति निरु०। ४।२१। भयपृथक्कारणाय। अभि। सर्वतः। स्रवन्तु। स्रु प्रस्रवणे। वर्पन्तु ॥

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    बंगाली (3)

    पदार्थ

    (দেবীঃ) দিব্যগুণযুক্ত (আপঃ) জল (নঃ) আমাদের (অভিষ্টয়ে) অভিষ্ট সিদ্ধির জন্য ও (পীতয়ে) পান বা রক্ষার জন্য (শম্) সুখদায়ক (ভবন্তু) হউক এবং (নঃ) আমাদের (শম্) শান্তির জন্য ও (য়োঃ) ভয় দূর করিবার জন্য (অভি) সবদিক হইতে (প্রবস্তু) বর্ষণ করুক।।
    ‘য়োঃ’ য়ু মিশ্রণামিশ্রণেয়োঃ বিচ্। য়ু ডোস্ । শং য়ো.....শমনং চ রোগানাং য়াবনং চ ভয়ানাং। নিরুক্ত ৪.২১ । এই মন্ত্র ঋগ্বেদে ১০.৯.৪; যজুর্বেদে ৩৬.১২।।

    भावार्थ


    দিব্যগুণযুক্ত জল আমাদের অভীষ্ট সিদ্ধির জন্য ও পান বা রক্ষার জন্য সুখ দায়ক হউক এবং আমাদের শান্তির জন্য ও ভয় দূর করিবার জন্য সবদিক হইতে বর্ষণ করুন।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    শং নো দেবীরভীষ্টয় আপো ভবন্তু পীতয়ে ৷ শং য়োরভি প্রবন্তু নঃ।।

    ऋषि | देवता | छन्द

    অর্থবা কৃতিৰ্বা। আপঃ। গায়ত্রী

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    मन्त्र विषय

    (আরোগ্যতোপদেশঃ) আরোগ্য­তার জন্য উপদেশ

    भाषार्थ

    (দেবীঃ) দিব্য গুণধারী (আপঃ) জল [জলের সমান উপকারী পুরুষ] (নঃ) আমাদের (অভিষ্টয়ে) অভিষ্ট সিদ্ধির জন্য এবং (পীতয়ে) পান বা রক্ষার জন্য (শম্) সুখদায়ক (ভবন্তু) হোক। এবং (নঃ) আমাদের (শম্) রোগের শান্তির জন্য এবং (যোঃ) ভয় দূর করার জন্য (অভি) সমস্ত দিক থেকে (স্রবন্তু) বর্ষণ করুক॥১॥

    भावार्थ

    বৃষ্টির মাধ্যমে জলের সমান উপকারী পুরুষ সকলের দুঃখের নিবৃত্তি এবং সুখের প্রবৃত্তির ক্ষেত্রে চেষ্টা করতে থাকুক ॥১॥ মন্ত্র ১, যজুর্বেদ ৩৬।১২, মন্ত্র ১-৩ ঋগ্বেদ ম০ ১০ সূ০ ৯ ম০ ৪, ৬, ৭ তথা মন্ত্র ২, ৩ ঋগ্বেদ ম০ ১ সূ০ ২৩ ম০ ২০, ২১ এ আছে ॥

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    भाषार्थ

    (দেবী=দেব্যঃ) দিব্য গুণান্বিত (আপঃ) জল (নঃ শম্) আমাদের জন্য শান্তিদায়ক, (অভিষ্টয়ে) অভীষ্ট সুখের জন্য (পীতয়ে) এবং পান করার জন্য (ভবন্তু) হোক । (শম্) প্রাপ্ত রোগের শমনের জন্য (যোঃ) এবং ভবিষ্যতে আগত রোগের ভয়কে পৃথক করার জন্য (নঃ) আমাদের জন্য (অভিস্রবন্তু) প্রবাহিত হোক।

    टिप्पणी

    [যোঃ=যু অমিশ্রণে (অদাদিঃ), অমিশ্রণম্=পৃথক্করণম্। যোঃ= যু+ ডোস্ (ঔণাদিক প্রত্যয়) শং যোঃ = “শমনং চ রোগাণাং যাবনং চ ভয়ানাম্” নিরুক্ত (৪।৩।২১)।]

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    हिंगलिश (1)

    Subject

    जल का महत्व

    Word Meaning

    दिव्य गुणों वाले जल, हमारे लिए शांतिदायक, अभीष्ट सुखों के लिए तथा पान करने के लिए उपलब्ध हों | (अस्वच्छता) के कारण रोग, मलिनता इत्यादि का शमन करने के लिए , तथा रोगों की सम्भावनाओं को दूर करने के लिए, स्वच्छ जल सब समय उपलब्ध हो |

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