Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 7 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 7/ मन्त्र 7
    ऋषि: - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - यातुधाननाशन सूक्त
    10

    त्वम॑ग्ने यातु॒धाना॒नुप॑बद्धाँ इ॒हा व॑ह। अथै॑षा॒मिन्द्रो॒ वज्रे॒णापि॑ शी॒र्षाणि॑ वृश्चतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वम् । अ॒ग्ने॒ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । उप॑ऽबध्दान् । इ॒ह । आ । व॒ह॒ ।अथ॑ । ए॒षा॒म् । इन्द्र॑: । वज्रे॑ण । अपि॑ । शी॒र्षाणि॑ । वृ॒श्च॒तु ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वमग्ने यातुधानानुपबद्धाँ इहा वह। अथैषामिन्द्रो वज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वम् । अग्ने । यातुऽधानान् । उपऽबध्दान् । इह । आ । वह ।अथ । एषाम् । इन्द्र: । वज्रेण । अपि । शीर्षाणि । वृश्चतु ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 7; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (अग्ने) हे अग्नि ! (त्वम्) तू (उप बद्धान्) दृढ़ बाँधे हुए (यातुधानान्) दुःखदायी राक्षसों को (इह) यहाँ पर (आवह) ले आ। (अथ) और (इन्द्रः) वायु (वज्रेण) कुल्हाड़े से (एषाम्) इनके (शीर्षाणि) मस्तकों को (अपि) भी (व्रश्चतु) काट डाले ॥७॥

    भावार्थ - अग्नि के समान प्रतापी और (इन्द्र) वायु के समान वेगवान् राजा उत्पातियों को कारागार में डाल दे और उनके सिर उड़ा दे ॥ इसी प्रकार सब मनुष्य अध्यात्म विषय में आत्मा को सेनानी, और लोभ, मोह, आदि को शत्रु और गृहस्थिति में गृहपति को सेनापति और विघ्नों को वैरी मान कर योग्य व्यवहार करें ॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    Agni, round up and bring here the evil doers caught and bound. And if it is otherwise inevitable, let Indra, even with his thnderbolt of justice and power, eliminate their incorrigible heads.


    Bhashya Acknowledgment
    Top