अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 7 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 7/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा, क्षुद्रः देवता - स्कन्धः, आत्मा छन्दः - विराड्जगती सूक्तम् - सर्वाधारवर्णन सूक्त
    पदार्थ -

    (अस्य) इस [सर्वव्यापक ब्रह्म] के (कस्मिन् अङ्गे) कौन से अङ्ग में (तपः) तप [ब्रह्मचर्य आदि तपश्चरण वा ऐश्वर्य] (अधि तिष्ठति) जमकर ठहरता है, (अस्य) इसके (कस्मिन् अङ्गे) किस अङ्ग में (ऋतम्) सत्यशास्त्र [वेद] (अधि) दृढ़ (आहितम्) स्थापित है। (अस्य) इस के (क्व) कहाँ पर (व्रतम्) व्रत [नियम], (क्व) कहाँ पर (श्रद्धा) श्रद्धा [सत्य में दृढ़ विश्वास] (तिष्ठति) स्थित है, (अस्य) इसके (कस्मिन् अङ्गे) कौन से अङ्ग में (सत्यम्) सत्य [यथार्थ कर्म] (प्रतिष्ठितम्) ठहरा हुआ है ॥१॥

    भावार्थ -

    ब्रह्मजिज्ञासु के प्रश्नों का उत्तर आगे मन्त्र ४ में है। अर्थात् सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान्, निराकार परमात्मा की सत्ता मात्र में सब तप, वेद आदि और अग्नि, वायु आदि ठहरे हैं ॥१॥

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