अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 1 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 11/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - ब्रह्मौदनः छन्दः - अनुष्टुब्गर्भा भुरिक्पङ्क्तिः सूक्तम् - ब्रह्मौदन सूक्त

    अग्ने॒ जाय॒स्वादि॑तिर्नाथि॒तेयं ब्र॑ह्मौद॒नं प॑चति पु॒त्रका॑मा। स॑प्तऋ॒षयो॑ भूत॒कृत॒स्ते त्वा॑ मन्थन्तु प्र॒जया॑ स॒हेह॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अग्ने॑ । जाय॑स्व । अदि॑ति: । ना॒थि॒ता । इ॒यम् । ब्र॒ह्म॒ऽओ॒द॒नम् । प॒च॒ति॒ । पु॒त्रऽका॑मा । स॒प्त॒ऽऋ॒षय॑: । भू॒त॒ऽकृत॑: । ते । त्व‍ा॒ । म॒न्थ॒न्तु॒ । प्र॒ऽजया॑ । स॒ह । इ॒ह ॥१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्ने जायस्वादितिर्नाथितेयं ब्रह्मौदनं पचति पुत्रकामा। सप्तऋषयो भूतकृतस्ते त्वा मन्थन्तु प्रजया सहेह ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने । जायस्व । अदिति: । नाथिता । इयम् । ब्रह्मऽओदनम् । पचति । पुत्रऽकामा । सप्तऽऋषय: । भूतऽकृत: । ते । त्व‍ा । मन्थन्तु । प्रऽजया । सह । इह ॥१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 1; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (अग्ने) हे तेजस्वी विद्वान् पुरुष ! (जायस्व) प्रसिद्ध हो, [जैसे] (इयम्) यह (नाथिता) पतिवाली, (पुत्रकामा) पुत्रों की कामनावाली (अदितिः) अदिति [अखण्ड व्रतवाली वा अदीन स्त्री] (ब्रह्मौदनम्) ब्रह्म-ओदन [वेदज्ञान, अन्न वा धन के बरसानेवाले परमात्मा] को (पचति) पक्का [मनमें दृढ़] करती है, [वैसे ही] (ते) वे (भूतकृतः) उचित कर्म करनेवाले (सप्तऋषयः) सात ऋषि [व्यापनशील वा दर्शनशील अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] (इह) यहाँ पर (प्रजया सह) प्रजा के साथ [मनुष्यों के सहित] (त्वा) तुझ [विद्वान्] को (मन्थन्तु) मथें [प्रवृत्त करें] ॥१॥

    भावार्थ -
    हे मनुष्य जैसे माता वेद आदि शास्त्रों में प्रवीण होकर सन्तान से प्रीति करती हुई परमेश्वर की आज्ञापालन में तत्पर होती है, वैसे ही तू अपनी इन्द्रियों मन और बुद्धि से उपकार लेकर सन्तानसहित पुरुषार्थ कर ॥१॥

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