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अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 1 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - ब्रह्मौदनः छन्दः - अनुष्टुब्गर्भा भुरिक्पङ्क्तिः सूक्तम् - ब्रह्मौदन सूक्त
    387

    अग्ने॒ जाय॒स्वादि॑तिर्नाथि॒तेयं ब्र॑ह्मौद॒नं प॑चति पु॒त्रका॑मा। स॑प्तऋ॒षयो॑ भूत॒कृत॒स्ते त्वा॑ मन्थन्तु प्र॒जया॑ स॒हेह॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अग्ने॑ । जाय॑स्व । अदि॑ति: । ना॒थि॒ता । इ॒यम् । ब्र॒ह्म॒ऽओ॒द॒नम् । प॒च॒ति॒ । पु॒त्रऽका॑मा । स॒प्त॒ऽऋ॒षय॑: । भू॒त॒ऽकृत॑: । ते । त्व‍ा॒ । म॒न्थ॒न्तु॒ । प्र॒ऽजया॑ । स॒ह । इ॒ह ॥१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्ने जायस्वादितिर्नाथितेयं ब्रह्मौदनं पचति पुत्रकामा। सप्तऋषयो भूतकृतस्ते त्वा मन्थन्तु प्रजया सहेह ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने । जायस्व । अदिति: । नाथिता । इयम् । ब्रह्मऽओदनम् । पचति । पुत्रऽकामा । सप्तऽऋषय: । भूतऽकृत: । ते । त्व‍ा । मन्थन्तु । प्रऽजया । सह । इह ॥१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्ने) हे तेजस्वी विद्वान् पुरुष ! (जायस्व) प्रसिद्ध हो, [जैसे] (इयम्) यह (नाथिता) पतिवाली, (पुत्रकामा) पुत्रों की कामनावाली (अदितिः) अदिति [अखण्ड व्रतवाली वा अदीन स्त्री] (ब्रह्मौदनम्) ब्रह्म-ओदन [वेदज्ञान, अन्न वा धन के बरसानेवाले परमात्मा] को (पचति) पक्का [मनमें दृढ़] करती है, [वैसे ही] (ते) वे (भूतकृतः) उचित कर्म करनेवाले (सप्तऋषयः) सात ऋषि [व्यापनशील वा दर्शनशील अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] (इह) यहाँ पर (प्रजया सह) प्रजा के साथ [मनुष्यों के सहित] (त्वा) तुझ [विद्वान्] को (मन्थन्तु) मथें [प्रवृत्त करें] ॥१॥

    भावार्थ

    हे मनुष्य जैसे माता वेद आदि शास्त्रों में प्रवीण होकर सन्तान से प्रीति करती हुई परमेश्वर की आज्ञापालन में तत्पर होती है, वैसे ही तू अपनी इन्द्रियों मन और बुद्धि से उपकार लेकर सन्तानसहित पुरुषार्थ कर ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(अग्ने) हे तेजस्विन् विद्वन् (जायस्व) प्रसिद्धो भव (अदितिः) अ० २।२८।४। दो अवखण्डने, दीङ् क्षये वा-क्तिन्, नञ्समासः। अदितिरदीना देवमाता-निरु० ४।२२। अखण्डव्रताऽदीना स्त्री (नाथिता) अ० ४।२३।७। नाथ-इतच्, टाप्। नाथवती समभर्तृका (इयम्) प्रसिद्धा (ब्रह्मौदनम्) अ० ४।३५।७। बृंहेर्नोऽच्च। उ० ४।१४६। बृहि वृद्धौ-मनिन्, नकारस्य अकारः, रत्वं च। ब्रह्म, अन्नम् निघ० २।७। ब्रह्म धनम्-निघ० २।१०। उन्देर्नलोपश्च उ० २।७६। उन्दी क्लेदने-युच्। ओदनो मेघः-निघ० १।१०। ओदनमुदकदानं मेघम्-निरु० ६।३४। ब्रह्मणो वेदज्ञानस्यान्नस्य धनस्य वा सेचकं वर्षकं परमात्मानम् (पचति) पक्वं मनसि दृढं करोति (पुत्रकामा) शीलिकामिभक्ष्याचरिभ्यो णः। वा० पा–० ३।२।१। कामेर्णप्रत्ययः। पुत्रादीन् कामयमाना (सप्तऋषयः) अ० ४।११।९। ऋष गतौ दर्शने च-इन्। ऋत्यकः। पा० ६।१।१२८। इति प्रकृतिभावः। सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे-यजु० ३४।५५। सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी-निरु० १२।३७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धयः (भूतकृतः) अ० ६।१०८।४। भूतमुचितं कर्म कुर्वन्ति ते (ते) प्रसिद्धाः (त्वा) त्वां विद्वांसम् (मन्थन्तु) विलोडयन्तु। प्रवर्तयन्तु (प्रजया) प्रजागणेन (सह) साकम् (इह) अस्मिन् गृहाश्रमे ॥

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    विषय

    ब्रह्मौदन का पचन

    पदार्थ

    १. हे (अग्ने) = यज्ञाग्ने ! (जायस्व) = तू हमारे घरों में प्रादुर्भूत हो। (इयम्) = यह (अदिति:) = अदीना देवमाता-दीनता से दूर रहनेवाली व दिव्य गुणों को धारण करनेवाली (नाथिता) = ऐश्वर्यवाली होती हुई [नाथ् ऐश्वर्य], (पुत्रकामा) = उत्तम सन्तान की कामनावाली होकर (ब्रह्मौदनं पचति) = ज्ञान के भोजन का परिपाक करती है, अथवा घर में उसी भोजन को पकाती है, जोकि बुद्धिवर्धक होकर ज्ञानवृद्धि का कारण बनता है। घर में उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि [क] घर में यज्ञाग्नि प्रज्वलित रहे, [ख] माता अदीनवृत्ति की हो व दिव्य गुणों को धारण करनेवाली हो, [ग] ऐश्वर्यवाली होती हुई यह स्वाध्यायशील हो तथा बुद्धिवर्धक सात्त्विक भोजन का ही घर में परिपाक करे, [घ] उसके अन्दर उत्तम सन्तान की प्राप्ति की कामना हो। २. (सप्तऋषयः) = [सम् to worship] प्रभु का पूजन करनेवाले [ऋष् to kill] व पूजन द्वारा वासना का विनाश करनेवाले, (भूतकृत:) = यथार्थ [सत्य] कर्मों को ही करनेवाले (ते) = गृहवासी जन (प्रजया सह) = सन्तानों के साथ (इह) = यहाँ-घर में हे अग्ने! (त्वा मन्थन्तु) = तेरा मन्थन करें। हम अरणि मन्धन द्वारा यज्ञाग्नि प्रज्वलित करके यज्ञों को करनेवाले हों।

    भावार्थ

    सन्तान की उत्तमता के लिए आवश्यक है कि १. घर में अग्निहोत्र नियम से हो-यज्ञमय वातावरण हो। २. माता अदीनवृत्ति की व दिव्यगुणों को धारण करनेवाली हो। ३. माता ऐश्वर्यवाली होती हुई उत्तम सन्तान की प्राप्ति की इच्छा से ब्रह्मौदन का परिपाक करे। ४. घर के लोग उपासना द्वारा वासना का विनाश करें-उत्तम कर्मों को करनेवाले हों। ५. सन्तानों के साथ मिलकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करें।

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    भाषार्थ

    (अग्ने) अग्निवत् तेजस्विन् हे अग्रणी ! (जायस्व) तू प्रकट हो, (इयम् अदितिः) यह पृथिवी (नाथिता) नाथवती होना चाहती है, अपना स्वामी चाहती है, (पुत्रकामा) तुझ जैसे पुत्र की कामना वाली हो कर, (ब्रह्माैदनम्) ब्रह्मज्ञों१ तथा वेदज्ञों के निमित्त (ओदन पचति) खेतों में ओदन को परिपक्व करती है। (ते भूतकृतः) वे सत्यानुष्ठानी (सप्तऋषयः) सात ऋषि, (प्रजया सह) प्रजा के साथ मिलकर (इह) इस राष्ट्र या साम्राज्य में (त्वा मन्थन्तु) मन्थन करके तुझे उत्पन्न करें, अर्थात् प्रकट करें, जैसे कि वे मन्थन करके अग्नि को प्रकट करते हैं ।

    टिप्पणी

    [मन्त्र द्व्यर्थक है। यज्ञियाग्नि का तथा राष्ट्राग्रणीरूप राजाग्नि का वर्णन हुआ है। यज्ञियाग्नि को यज्ञर्षि लोग दो अरणियों से मथ कर प्रकट करते हैं, राजाग्नि को सप्तर्षि-तथा-प्रजा दो अरणियां बन कर, परस्पर सहमति से मन्थन अर्थात् छानबीन करके जन्म देते या प्रकट करते हैं। पृथिवी जो खेतों में अन्न पकाती है उसे ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर के प्रसादन के निमित्त, यज्ञियाग्नि में आहुत करना होता है। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञों और वेदज्ञों के उपभोग के निमित्त, कृष्युत्पन्न ओदन को राजाग्नि के प्रति अर्पित करना होता है। यज्ञियाग्नि आहुतान्न को सर्वत्र प्रसारित कर सर्वोपकार करती है, इसी प्रकार राजाग्नि प्राप्त अन्न का विभागपूर्वक सर्वत्र अर्थात् सब प्रजा में बांट देती है। पृथिवी विना स्वामी के नहीं रह सकती, इस लिये वह राजा के रूप में पुत्र की कामना करती है। अदितिः पृथिवीनाम (निघं० १।१)। सप्तऋषयः = राज्य के सुचारुरूप में संचालन के लिये न्यून-से-न्यून सात ऋषिकोटि के अमात्य चाहियें। यथा “सचिवान् सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान्" (मनु० तथा सत्यार्थप्रकाश, समुल्लास ६)। मनु ने भी प्रथम सात सचिवों को नियुक्त करने का निर्देश किया है। आधिदैविक जगत् में भी सप्तर्षि मण्डल हैं, जिस में कि सात ऋषि विराजते हैं। आध्यात्मिक जगत् में भी सात ऋषि हैं जो कि शरीर का संचालन करते हैं। इसी प्रकार आधिभौतिक अर्थात् राष्ट्रिय जीवन में भी मनु ने ७ सचिवों की विधि लिखी है। आध्यात्मिक जगत में सात ऋषि यथा "सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे" (यजु० ३४।५५)। ये सात ऋषि हैं, ५ ज्ञानेन्द्रियां, १ मन और सातवीं विद्या। ये सातों ऋषि हैं। परन्तु इन द्वारा प्राप्त ज्ञान को, स्वार्थ भावना तथा लोभ, काम, क्रोध आदि वृत्तियां विकृत कर देती हैं। परन्तु सात्विक व्यक्ति को इन सात ऋषियों द्वारा प्राप्त ज्ञान मूलतः यथार्थ होता है। ब्रह्मौदनम् = ब्रह्म के नाम पर ब्रह्मज्ञों और वेदज्ञों की अन्नादि द्वारा सेवा। मन्त्र के अनुसार ऋषियों, जो कि ब्रह्मज्ञ और वेदज्ञ होते हुए, अमात्यरूप से प्रजा के शासन में, राजा की सहायता करते हैं उनकी, तथा तत्सदृश राष्ट्र के अन्य ब्रह्मज्ञों और वेदज्ञों की अन्नादि द्वारा सत्कार पूर्वक सेवा "ब्रह्मौदन" है। ऐसे व्यक्ति आधिभौतिक दृष्टि से राष्ट्र के देव हैं। इसीलिये ऐसों को संस्कृत में "भूदेव" कहते हैं। ऐसे व्यक्तियों की सेवा से पृथिवी तैर जाती है, पृथिवीस्थ प्रजा दुःखों के नद से पार हो जाती है। मन्त्र ५ में "यो देवानां स इमां पारयाति" में "इमाम्" से अभिप्राय पृथिवी की प्रजा है]। [१. इस का वास्तविक अभिप्राय है कि "ब्रह्म के प्रसादनार्थ, ब्रह्मज्ञों तथा वेदज्ञों का परिपक्व ओदन द्वारा सत्कार करना"। मन्त्र ३७ वें की व्याख्या में इस अभिप्राय को स्पष्ट किया गया है। सूक्त ११।१ में जहां ब्रह्मौदन शब्द पठित है, वहां इस की यही व्याख्या जाननी चाहिये।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brahmaudana

    Meaning

    Arise, Agni, manifest into creative activity, this Aditi, mastered and energised by Providence, seeking progeny, prepares and matures the holy food for Brahma with desire. And those seven sages, creators of the forms of being, alongwith certain created forms stir and chum you to come up into creative activity. (Agni is a term of vesatile meaning, from the leading light and creative will of the universe upto the creative passion of the intelligent soul of the individual, always playing a leading role in the situation. It means Ishvara, or the Samrat who is world leader and ruler, or Raja, national leader and ruler, or any head of an institution or organisation, or head of the family. Aditi would mean the consort power, Prakrti, earth, motherland, the people, members of the institution or organisation, lady of the house, the body with sense and mind. Creative activity would mean positive progress of the world, country, society, institution, organisation, family, the individual. Seven sages would mean creative and cooperative forces : five elements with Ahankara and Mahat mutations of Prakrti in the cosmic context, seven pranic energies in the biological context, ministers and advisors, law and order and defence forces in the socio-political context, five senses with will and judgement in the individual context. In short, Agni is the creative passion and power, Aditi is the consort, seven sages are the auxiliaries, and Brahmaudana is the food and the state of nature just mature for creation. A word about churning (manth) and food (odana): All change of form comes into being when Prakrti from the state of constancy is activated into the state of mutability by divine will. From Satyam, Prakrti becomes Satyam-and-Rtam. Rtam is the law of mutability through which the changing world of new forms becomes a mutation of Satyam. In other words, Satyam and Rtam, coustancy and mutability are two sides of the same thing. Just as two pieces of arani wood produce fire by attrition, so does Prakrti produce new forms by the ‘churning’ process of Satyam and Rtam. Now food: In Prashna Upanishad the disciple asks the first question: How do different forms of being come into existence: The reply: Prajapati, with the desire to create, created Prana, life energy, and Rayi, food. Prana is the consumer, Rayi, is the food consumed, the result is new forms of being. In this Sukta, in this mantra, Aditi is the consort with desire, she prepares the food for Brahma, that is, she brings up the seed state with desire. And no plant is born unless the seed is consumed. In this way, the entire process of change and creative evolution is concentrated in this mantra: Consumption, transformation, creation.

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    Subject

    Brahmaudana , Accompanying a rice-dish offering

    Translation

    Agni, be thou born; (indestructible) Aditi here, suppliant, cooks a brahman-rice-dish, adorable-sons: the seven -seers hing, being makers, let them churn you, here together with progeny.

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    Translation

    This igneous element or all—pervading heat is created (by God). This indivisible material cause under the providence of Divine (Adit) like a woman desiring progeny prepares the (Brahmaudanam) i.e. makes its homogenous substance transmuted in the subtle luminous whole (Virat) which contains all the forms of the world in it. The seven world-creating elements Churn this firy element to various purpose with the Jivas or the worldly objects in this state of creation.

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    Translation

    O noble learned person, attain to fame! Just as a married, high spirited woman, yearning for children, firmly fixes in her mind God, the Bestower of Vedic knowledge, food, and riches, so should the seven Rishis, the doers of noble deeds, in domestic life, kindle thee with offspring.

    Footnote

    Seven Rishin: Skin, Eye, Ear, Tongue, Nostril, Mind and Intellect.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अग्ने) हे तेजस्विन् विद्वन् (जायस्व) प्रसिद्धो भव (अदितिः) अ० २।२८।४। दो अवखण्डने, दीङ् क्षये वा-क्तिन्, नञ्समासः। अदितिरदीना देवमाता-निरु० ४।२२। अखण्डव्रताऽदीना स्त्री (नाथिता) अ० ४।२३।७। नाथ-इतच्, टाप्। नाथवती समभर्तृका (इयम्) प्रसिद्धा (ब्रह्मौदनम्) अ० ४।३५।७। बृंहेर्नोऽच्च। उ० ४।१४६। बृहि वृद्धौ-मनिन्, नकारस्य अकारः, रत्वं च। ब्रह्म, अन्नम् निघ० २।७। ब्रह्म धनम्-निघ० २।१०। उन्देर्नलोपश्च उ० २।७६। उन्दी क्लेदने-युच्। ओदनो मेघः-निघ० १।१०। ओदनमुदकदानं मेघम्-निरु० ६।३४। ब्रह्मणो वेदज्ञानस्यान्नस्य धनस्य वा सेचकं वर्षकं परमात्मानम् (पचति) पक्वं मनसि दृढं करोति (पुत्रकामा) शीलिकामिभक्ष्याचरिभ्यो णः। वा० पा–० ३।२।१। कामेर्णप्रत्ययः। पुत्रादीन् कामयमाना (सप्तऋषयः) अ० ४।११।९। ऋष गतौ दर्शने च-इन्। ऋत्यकः। पा० ६।१।१२८। इति प्रकृतिभावः। सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे-यजु० ३४।५५। सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी-निरु० १२।३७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धयः (भूतकृतः) अ० ६।१०८।४। भूतमुचितं कर्म कुर्वन्ति ते (ते) प्रसिद्धाः (त्वा) त्वां विद्वांसम् (मन्थन्तु) विलोडयन्तु। प्रवर्तयन्तु (प्रजया) प्रजागणेन (सह) साकम् (इह) अस्मिन् गृहाश्रमे ॥

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