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अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 4 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 1
    ऋषिः - भार्गवो वैदर्भिः देवता - प्राणः छन्दः - शङ्कुमत्यनुष्टुप् सूक्तम् - प्राण सूक्त
    414

    प्रा॒णाय॒ नमो॒ यस्य॒ सर्व॑मि॒दं वशे॑। यो भू॒तः सर्व॑स्येश्व॒रो यस्मि॒न्त्सर्वं॒ प्रति॑ष्ठितम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रा॒णाय॑ । नम॑: । यस्य॑ । सर्व॑म् । इ॒दम् । वशे॑ । य: । भू॒त: । सर्व॑स्य । ई॒श्व॒र: । यस्मि॑न् । सर्व॑म् । प्रति॑ऽस्थितम् ॥६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे। यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्राणाय । नम: । यस्य । सर्वम् । इदम् । वशे । य: । भूत: । सर्वस्य । ईश्वर: । यस्मिन् । सर्वम् । प्रतिऽस्थितम् ॥६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (4)

    विषय

    प्राण की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    (प्राणाय) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] को (नमः) नमस्कार है, (यस्य) जिसके (वशे) वश में (सर्वम्) सब (इदम्) यह [जगत्] है। (भूतः) सदा वर्तमान (यः) जो (सर्वस्य) सबका (ईश्वरः) ईश्वर है और (यस्मिन्) जिसके भीतर (सर्वम्) सब (प्रतिष्ठितम्) अटल ठहरा है ॥१॥

    भावार्थ

    सर्वपोषक, सर्वशक्तिमान् प्राणनाम जगदीश्वर की उपासना करके मनुष्य अपने प्राणों के बल को सदा बढ़ाते रहें ॥१॥परमेश्वर का प्राण नाम है, देखो प्रश्नोपनिषद् खण्ड २ श्लोक ६ ॥ अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्। ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥१॥अरों के समान रथ की नाभि में, प्राण के बीच सब जड़ा हुआ है−ऋचाएँ [स्तुतिविद्याएँ] यजुर्मन्त्र [ईश्वरपूजा के मन्त्र] और साममन्त्र [मोक्षविद्याएँ-अर्थात् कर्म, उपासना और ज्ञान], यज्ञ [श्रेष्ठ व्यवहार] राज्य और धन ॥और देखो मनु अध्याय १२ श्लोक १२३। एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रमेकेऽपरे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥१॥इस [परमेश्वर] को कोई अग्नि, कोई मनु और प्रजापति, कोई इन्द्र, कोई प्राण और कोई नित्य ब्रह्म कहते हैं ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(प्राणाय) प्र+अन प्राणने-घञ्। प्राणित्यनेनेति प्राणस्तस्मै जीवनदात्रे परमेश्वराय (नमः) सत्कारः (यस्य) (सर्वम्) समस्तम् (इदम्) दृश्यमानं जगत् (वशे) प्रभुत्वे (यः) (भूतः) सर्वदा लब्धसत्ताकः (सर्वस्य) (ईश्वरः) अश्नोतेराशुकर्मणि वरट् च। उ० ५।५७। अशू व्याप्तौ-वरट्, उपधाया ईत्वम्। शीघ्रकारी। यद्वा, स्थेशभासपिसकसो वरच्। पा० ३।२।१७५। ईश ऐश्वर्ये-वरच्। ईशिता स्वामी (यस्मिन्) (सर्वम्) (प्रतिष्ठितम्) दृढं स्थितम् ॥

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    पदार्थ

    शब्दार्थ =  ( प्राणाय नमः ) = चेतनस्वरूप प्राणतुल्य सर्वप्रिय और सबको प्राण देनेवाले परमेश्वर को हमारा नमस्कार है, ( यस्य सर्वमिदं वशे ) = जिस प्रभु के वश  में यह सब जगत् वर्त्तमान है, ( यः भूत: ) = जो सत्य एक रस परमार्थ स्वरूप और  ( सर्वस्य ईश्वर: ) = सबका स्वामी है  ( यस्मिन् ) = जिस आधार स्वरूप प्रभु में  ( सर्वं प्रतिष्ठितम् ) = यह सब चराचर जगत् स्थिर हो रहा है।

    भावार्थ

    भावार्थ = हे परम पूजनीय चैतन्यमय परमप्रिय परमात्मन्! आपको हमारा नमस्कार है। अनेक ब्रह्माण्ड रूप जगत् के स्वामी आप ही हैं, आपके ही अधीन यह सब-कुछ है और आप ही इसके अधिष्ठान हैं, क्षण - भर भी आपके बिना यह जगत् नहीं ठहर सकता । 

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    विषय

    प्राणात्मा प्रभु को प्रणाम

    पदार्थ

    १. उस (प्राणाय) = ['सर्वप्नाणिशरीरं व्याप्य चेष्टते-हिरण्यगर्भ:'-सा०] सबके प्राणभूत प्रभु के लिए (नमः) = नमस्कार हो, (यस्य) = जिस प्राणप्रभु के (इदं सर्व वशे) = यह सम्पूर्ण चराचरात्मक जगत् वश में है, (य:) = जो प्राणों का प्राण प्रभु (भूत:) = [सर्वदा लब्धसत्ताकः, भूतकालावच्छिनः, न तु भविष्यन] सदा से हैं-'वे कभी होंगे' ऐसा उनके लिए नहीं कहा जाता। (सर्वस्य ईश्वरः) = सब प्राणिजात के ईश हैं-कर्मानुसार विविध योनियों में प्राप्त करानेवाले हैं। (यस्मिन्) = जिस प्राणात्मा प्रभु में (सर्व प्रतिष्ठितम्) = सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है-"जो सर्वाधार हैं' उन प्रभु के लिए हम प्रणाम करते हैं।

    भावार्थ

    हम प्राणात्मा प्रभु को प्रणाम करते हैं। उन्हीं के वश में यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। वे प्रभु सदा से हैं, सबके ईश्वर हैं, सबको प्रतिष्ठा [आधार] हैं।

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    भाषार्थ

    (प्राणाय नमः) प्राण को नमस्कार हो, (यस्य) जिस के (वशे) वश में (इदं सर्वम्) यह सब जगत् है। (भूतः) अनादिकाल से वर्तमान सत्स्वरूप (यः) जो प्राण (सर्वस्य) समग्र जगत् का (ईश्वरः) अधीश्वर है, (यस्मिन्) और जिस में (सर्वम्) समग्र जगत् (प्रतिष्ठितम्) स्थित है।

    टिप्पणी

    [समग्र जगत् का मुख्य प्राण परमेश्वर है। जड़-चेतन जगत के प्रत्येक पदार्थ में अपना अपना प्राण है, जिस के कारण उस-उस पदार्थ की सत्ता बनी रहती है। यह प्रातिस्विक प्राण परमेश्वररूपी प्राण द्वारा पदार्थमात्र को प्राप्त है, क्योंकि प्रत्येक की स्थिति परमेश्वराश्रित है। परमेश्वर के नियमानुसार, जब परमेश्वर, इन पदार्थों में प्राणशक्ति अर्थात् इन की स्थिति को कायम रखने की शक्ति को हर लेता है तो उस महाप्रलय में सब पदार्थ प्रकृतिरूपी उपादान कारण में विलीन हो जाते हैं, और प्राणशक्ति को पुनः प्राप्त कर सृष्टिकाल में पुनः सत्तावान् हो जाते हैं]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prana Sukta

    Meaning

    Prana is the basic energy of life from the root to the top. Body and senses receive their sustenance from Prana (Chhandogya Upanishad 5,1,1-15). Prana receives its life energy from the atman (Prashna Upanishad, 3), and the ultimate prana of the universal life is Para- matman (Manusmrti, 12, 123, and Yajurveda, 23, 3). Homage to prana within whose power and control this entire world of existence breathes and vibrates. Prana is eternal, ruling lord over all, in which this entire universe is established and sustained.

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    Subject

    Extolling the breath (prana)

    Translation

    Homage to breath (prana) in whose control is this All, who hath been lord of all, in whom all stands firm.

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    Translation

    I describe the glory of Prana, the Cosmo-physical vitality which has under its jurisdiction of control the whole universe. It is the controller of all. It is that on which the whole depends.

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    Translation

    Homage to God, Him Who hath dominion over the universe, Who Self-Existent is the Sovereign Lord of all, on Whom the whole world depends!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(प्राणाय) प्र+अन प्राणने-घञ्। प्राणित्यनेनेति प्राणस्तस्मै जीवनदात्रे परमेश्वराय (नमः) सत्कारः (यस्य) (सर्वम्) समस्तम् (इदम्) दृश्यमानं जगत् (वशे) प्रभुत्वे (यः) (भूतः) सर्वदा लब्धसत्ताकः (सर्वस्य) (ईश्वरः) अश्नोतेराशुकर्मणि वरट् च। उ० ५।५७। अशू व्याप्तौ-वरट्, उपधाया ईत्वम्। शीघ्रकारी। यद्वा, स्थेशभासपिसकसो वरच्। पा० ३।२।१७५। ईश ऐश्वर्ये-वरच्। ईशिता स्वामी (यस्मिन्) (सर्वम्) (प्रतिष्ठितम्) दृढं स्थितम् ॥

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    প্রাণায় নমো য়স্য সর্বমিদং বশে।

    য়ো ভূতঃ সর্বস্যেশ্বরো য়স্মিন্ত্সর্বং প্রতিষ্ঠিতম্ 

    (অথর্ব ১১।৪।১)

    পদার্থঃ (প্রাণায় নমঃ) চেতনস্বরূপ প্রাণতুল্য সর্বপ্রিয় আর সকলকে প্রাণ দানকারী পরমেশ্বরকে আমাদের নমস্কার। (যস্য সর্বমিদং বশে) যাঁর বশে এই সকল জগৎ বর্তমান আছে, (য়ঃ ভূতঃ) যিনি সত্য এক রস পরমার্থস্বরূপ, (সর্বস্য ঈশ্বরঃ) সকলের ঈশ্বর (য়স্মিন্) যে প্রাণাত্মা ভগবানে ( ইৎ সর্বং প্রতিষ্ঠিতম্) এই সব চরাচর জগৎ স্থিত আছে, তাঁকে নমস্কার।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ হে পরম পূজনীয় চৈতন্যময় পরমপ্রিয় পরমাত্মা! তোমার প্রতি আমাদের নমস্কার। এই ব্রহ্মাণ্ডস্বরূপ জগতের স্বামী তুমি, তোমারই অধীনে এই সকল কিছু। তুমিই এর অধিষ্ঠান, তোমাকে ছাড়া মুহূর্তমাত্রও এই জগৎ থাকতে পারে না। তোমাকেই আমাদের প্রণাম ।।৮।

     

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