अथर्ववेद के काण्ड - 12 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 12/ सूक्त 2/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - भृगुः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    [हे दुष्ट !] (नडम्) बन्धन [वा नरकट समान तीक्ष्ण शस्त्र] पर (आ रोह) चढ़ जा, (ते) तेरे लिये (अत्र) यहाँ (लोकः) स्थान (न) नहीं है, (इदम्) यह (सीसम्) [हमारा] बन्धननाशक विधान (ते) तेरा (भागधेयम्) सेवनीय कर्म है, (आ इहि) तू आ। (यः) जो (गोषु) गौओं में (यक्ष्मः) राजरोग और (पुरुषेषु) पुरुषों में (यक्ष्मः) राजरोग है, (तेन साकम्) उस के साथ (त्वम्) तू (अधराङ्) नीचे की ओर (परा इहि) चला जा ॥१॥

    भावार्थ -

    राजा को उचित है कि दुराचारी दुष्टों को तीक्ष्ण शस्त्रों से कठिन दण्ड देकर नाश करे और नीचा दिखावे, जिस से प्रजा के पशुओं और पुरुषों में कोई क्लेश न होवे ॥१॥

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