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अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 13/ सूक्त 2/ मन्त्र 13
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    27

    उ॒भावन्तौ॒ सम॑र्षसि व॒त्सः सं॑मा॒तरा॑विव। न॒न्वे॒तदि॒तः पु॒रा ब्रह्म॑ दे॒वा अ॒मी वि॑दुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒भौ । अन्तौ॑ । सम् । अ॒र्ष॒सि॒ । व॒त्स: । सं॒मा॒तरौ॑ऽइव। न॒नु । ए॒तत्। इ॒त:। पु॒रा । ब्रह्म॑ । दे॒वा: । अ॒मी इति॑ । वि॒दु॒: ॥2.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उभावन्तौ समर्षसि वत्सः संमातराविव। नन्वेतदितः पुरा ब्रह्म देवा अमी विदुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उभौ । अन्तौ । सम् । अर्षसि । वत्स: । संमातरौऽइव। ननु । एतत्। इत:। पुरा । ब्रह्म । देवा: । अमी इति । विदु: ॥2.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 2; मन्त्र » 13
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    पदार्थ -
    [हे सूर्य !] तू (उभौ) दोनों (अन्तौ) अन्तों [पूर्व-पश्चिम अथवा आगे-पीछे दोनों ओर] को (सम्) ठीक-ठीक, (अर्षसि) पहुँचता है, (इव) जैसे (वत्सः) बालक (संमातरौ) दो सामान्य [मिली हुई] माताओं को। (ननु) निश्चय करके (एतत्) इस (ब्रह्म) ईश्वरज्ञान को (इतः पुरा) इस [समय] के पहिले से (अमी) यह (देवाः) विद्वान् लोग (विदुः) जानते हैं ॥१३॥

    भावार्थ - परमेश्वर ने सूर्य को ऐसी उचित रीति से बनाया है कि वह निरन्तर घूमकर सृष्टि का उपकार करे, पूर्वज विद्वान् लोग ईश्वर के ऐसे नियमों को जानकर सुधार करते रहे हैं ॥१३॥


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    Meaning -
    O sun, you reach both the extremities of your orbit, just as a child going to its father and mother both, (you maintain the will of Attri and the law of Nature). And this eternal mystery and law of nature and Divinity, those sages have known who have been long long even before now. (The law is eternal, the cycle of existence is eternal, and the knowledge of the law and cycle of existence too is eternal.)


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