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अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 2 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 2/ मन्त्र 30
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - पञ्चपदोष्णिग्बृहतीगर्भातिजगती सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    73

    रोच॑से दि॒वि रोच॑से अ॒न्तरि॑क्षे॒ पत॑ङ्ग पृथि॒व्यां रो॑चसे॒ रोच॑से अ॒प्स्वन्तः। उ॒भा स॑मु॒द्रौ रुच्या॒ व्यापिथ दे॒वो दे॑वासि महि॒षः स्व॒र्जित् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    रोच॑से । दि॒वि । रोच॑से । अ॒न्तरि॑क्षे । पत॑ङ् । पृ॒थि॒व्याम् । रोच॑से । रोच॑से । अ॒प्ऽसु । अ॒न्त: । उ॒भा । स॒मु॒द्रौ । रुच्या॑ । वि । आ॒पि॒थ॒ । दे॒व: । दे॒व । अ॒सि॒ । म॒हि॒ष: । स्व॒:ऽजित् ॥२.३०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    रोचसे दिवि रोचसे अन्तरिक्षे पतङ्ग पृथिव्यां रोचसे रोचसे अप्स्वन्तः। उभा समुद्रौ रुच्या व्यापिथ देवो देवासि महिषः स्वर्जित् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    रोचसे । दिवि । रोचसे । अन्तरिक्षे । पतङ् । पृथिव्याम् । रोचसे । रोचसे । अप्ऽसु । अन्त: । उभा । समुद्रौ । रुच्या । वि । आपिथ । देव: । देव । असि । महिष: । स्व:ऽजित् ॥२.३०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 2; मन्त्र » 30
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    (पतङ्ग) हे ऐश्वर्यवान् [जगदीश्वर !] तू (दिवि) प्रकाशमान [सूर्य आदि] लोक में (रोचसे) चमकता है, तू (अन्तरिक्षे) मध्य लोक में (रोचसे) चमकता है, तू (पृथिव्याम्) पृथिवी [अप्रकाशमान] लोक में (रोचसे) चमकता है, तू (पृथिव्याम्) पृथिवी [अप्रकाशमान] लोक में (रोचसे) चमकता है, तू (अप्सु अन्तः) प्रजाओं [प्राणियों] के भीतर (रोचसे) चमकता है। (उभा) दोनों (समुद्रौ) समुद्रों [जड़-चेतन समूहों] में (रुच्या) अपनी रुचि [प्रीति] से (वि आपिथ) तू व्यापा है, (देव) हे प्रकाशस्वरूप ! (देवः) तू व्यवहार जाननेवाला, (महिषः) महान् और (स्वर्जित्) सुख का जितानेवाला (असि) है ॥३०॥

    भावार्थ

    जैसे परमात्मा अपने ऐश्वर्य से प्रत्येक लोक और पदार्थ में प्रकाशमान होकर सबका धारण-पोषण करता है, वैसे ही हे मनुष्यो ! तुम अपने विद्याबल से व्यवहारकुशल होकर सबको सुख पहुँचाओ ॥३०॥

    टिप्पणी

    ३०−(रोचसे) दीप्यसे (दिवि) प्रकाशमाने सूर्यादिलोके (रोचसे) (अन्तरिक्षे) मध्यलोके (पतङ्ग) अ० ६।३१।३। पत गतौ ऐश्वर्ये च-अङ्गच्। हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् (पृथिव्याम्) अप्रकाशमाने पृथिव्यादिलोके (रोचसे) (रोचसे) (अप्सु) प्रजासु। प्राणिषु (अन्तः) मध्ये (उभा) द्वौ (समुद्रौ) जडचेतनरूपसमूहौ (रुच्या) प्रीत्या (व्यापिथ) व्याप्तवानसि (देवः) व्यवहारकुशलः (देव) हे प्रकाशमान (असि) (महिषः) महान् (स्वर्जित्) स्वः सुखं जयति जापयति यः स परमेश्वरः ॥

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    विषय

    देवः, महिषः, स्वर्जित्

    पदार्थ

    १. हे (पतङ्ग) = [पत गतौ, ऐश्वर्य च] ऐश्वर्य के साथ गतिवाले प्रभो! आप (दिवि रोचसे) = द्युलोक में दीप्त होते हो-द्युलोक में सूर्य के रूप में आपकी महिमा का प्रकाश होता है। अन्तरिक्षे रोचसे-अन्तरिक्ष में आप दीप्त होते हैं-'चन्द्र, विद्युत, वायु' आदि देवों में आपकी महिमा का प्रकाश है। (पृथिव्यां रोचसे) = पृथिवीस्थ अग्नि आदि देवों में भी आपकी ही दीप्ति दीप्त हो रही है। [तेजसवास्मि विभावसौ]। (अप्सु अन्त: रोचसे) = जलों के अन्दर भी आप ही दीस हो रहे हैं। 'अप्स' का अर्थ 'प्रजाओं में यह भी है-सब प्रजाओं में प्रभु का ही प्रकाश दिखता है। २. (उभा समुद्रौ) = पृथिवीस्थ समुद्रों को तथा अन्तरिक्षस्थ मेघरूप' समद्रों को (रुच्या व्यापिथ) = दीप्त से आप व्यास कर रहे हो। हे देव-प्रकाशमय प्रभो! (देवः असि) = आप सचमुच देव हैं। (महिष:) = पूजनीय हैं-पूजा के योग्य हैं। (स्वर्जित) = हमारे लिए प्रकाश व सुख का विजय करनेवाले हैं।

    भावार्थ

    प्रभु का प्रकाश व महिमा सर्वत्र दीस है। हमारे हृदयों में भी प्रभुदीस हो रहे हैं। प्रभुस्मरण करते हुए हम 'देव' बनें। दैवीवृत्तिवाले बनकर महनीय जीवनवाले हों। इसप्रकार प्रकाशमय लोक का विजय करें।

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    भाषार्थ

    (पतङ्ग) हे पक्षी के सदृश उड़ने वाले! (दिवि) द्युलोक में (रोचसे) तू प्रदीप्त होता है, (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (रोचसे) प्रदीप्त होता है। (पृथिव्याम्) पृथिवी में (रोचसे) प्रदीप्त होता है, (अप्सु अन्तः) शरीरस्थ रस-रक्त में (रोचसे) प्रदीप्त होता है। (उभा समुद्रौ) दोनों समुद्रों में (रुच्या) प्रदीप्त द्वारा (व्यापिथ) तू व्याप्त हो रहा है। (देव) हे द्योतमान (देव असिः) तु वस्तुतः देव है, (महिषः) महान् है (स्वर्जित्) सर्वविजयी है।

    टिप्पणी

    [उभा समुद्रौ (देखो मन्त्र १०), अथवा पार्थिव समुद्र तथा हृद्यसमुद्र (यजु० १७।९३), तथा हृदय सिन्धु = सिन्धु सृत्याय (अथर्व० १०।२।२१)। अप्सु = रक्त-रस (अथर्व० १०।२।११)। पतङ्गः= पक्षी की तरह उड़ता आता तथा उड़ कर मानो चला जाता। समाधि में परमेश्वर हृदय में मानो उड़ कर आता और व्युत्त्थानावस्था में मानो उड़ कर चला जाता है। "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया" (मुण्डक उपनिषद ३।१।१, श्वेताश्वतर उपनिषद् ४।६, ऋग्वेद १।१६४।२०, अथर्ववेद ९।९।२०) में परमेश्वर को सुपर्णा द्वारा पक्षी कहा भी हैं। स्वः, स्वर्= सर्वम् रकार वकारयो राद्यन्त विपर्यासः (केशी १४ की व्याख्या में निरुक्त १२।३।२६), अथवा स्वः= लोक तथा सुख विशेष। मन्त्र का स्वारस्य परमात्म-विषयक है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Rohita, the Sun

    Meaning

    O divine Sun, cosmic Bird of light on high in space, you shine in heaven, you shine in the firmament, you shine on earth, and you shine in the dynamics of nature and humanity, inspiring them all. You pervade in the seas on earth and in the oceans of space with your light and energy. O divine Refulgence, you are divinity in the mode of light, great, virile and generous, winner and giver of light and heavenly joy.

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    Translation

    You shine in the sky; you shine in the midspace; O flayer, you shine on the earth; you shine within the waters. You pervade both the oceans with light. O enlightened one, you are a mighty bounty of Nature and winner of light (bliss).

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    Translation

    This impalling glorious sun shines in heaven, in void between heaven and earth and shines on earth and shines in the waters. By its splendor it pervades both the oceansone on the earth and one in the atmosphere. This is the mighty over-powering light.

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    Translation

    In heaven, O God, and in mid-air Thou shinest. Thou shinest on the earth and in the waters. Thou hast pervaded with splendor both the animate and inanimate worlds. A God art Thou, O God, the Bestower of joy and Mighty.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३०−(रोचसे) दीप्यसे (दिवि) प्रकाशमाने सूर्यादिलोके (रोचसे) (अन्तरिक्षे) मध्यलोके (पतङ्ग) अ० ६।३१।३। पत गतौ ऐश्वर्ये च-अङ्गच्। हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् (पृथिव्याम्) अप्रकाशमाने पृथिव्यादिलोके (रोचसे) (रोचसे) (अप्सु) प्रजासु। प्राणिषु (अन्तः) मध्ये (उभा) द्वौ (समुद्रौ) जडचेतनरूपसमूहौ (रुच्या) प्रीत्या (व्यापिथ) व्याप्तवानसि (देवः) व्यवहारकुशलः (देव) हे प्रकाशमान (असि) (महिषः) महान् (स्वर्जित्) स्वः सुखं जयति जापयति यः स परमेश्वरः ॥

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