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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषिः - सोम देवता - अनुष्टुप् छन्दः - सवित्री, सूर्या सूक्तम् - विवाह प्रकरण सूक्त
    807

    स॒त्येनोत्त॑भिता॒ भूमिः॒ सूर्ये॒णोत्त॑भिता॒ द्यौः।ऋ॒तेना॑दि॒त्यास्ति॑ष्ठन्ति दि॒वि सोमो॒ अधि॑ श्रि॒तः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒त्येन॑ । उत्त॑भिता । भूमि॑: । सूर्ये॑ण । उत्त॑भिता । द्यौ: । ऋ॒तेन॑ । आ॒दि॒त्या: । ति॒ष्ठ॒न्ति॒ । दि॒वि॒ । सोम॑: । अधि॑ । श्रि॒त: ॥१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः।ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सत्येन । उत्तभिता । भूमि: । सूर्येण । उत्तभिता । द्यौ: । ऋतेन । आदित्या: । तिष्ठन्ति । दिवि । सोम: । अधि । श्रित: ॥१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 14; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    मन्त्र १-५, प्रकाश करने योग्य और प्रकाशक के विषय काउपदेश।

    पदार्थ

    (सत्येन) सत्यस्वरूपपरमेश्वर करके (भूमिः) भूमि (उत्तभिता) [आकाश में] उत्तमता से थाँभी गयी है, और (सूर्येण) सूर्यलोक करके (द्यौः) प्रकाश (उत्तभिता) उत्तम रीति से थाँभा गयाहै। (ऋतेन) सत्य नियम द्वारा (आदित्याः) प्रकाशमान किरणें [वा अखण्ड सूक्ष्मपरमाणु] (तिष्ठन्ति) ठहरते हैं, और (दिवि) [सूर्य के] प्रकाश में (सोमः)चन्द्रमा (अधि) यथावत् (श्रितः) ठहरा हुआ है ॥१॥

    भावार्थ

    लोक दो प्रकार के हैं−एक प्रकाश करनेवाले जैसे सूर्य आदि और दूसरे अप्रकाशमान जैसे पृथिवी चन्द्र आदि।परमेश्वर के नियम से प्रकाशक सूर्य आदि लोक प्रकाश्य पृथिवी चन्द्र आदि लोकों कोअपने प्रकाश से प्रकाशित करते हैं ॥१॥१−मन्त्र १ तथा २ महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, प्रकाश्यप्रकाशकविषय पृ० १४३, १४४ में व्याख्यात हैं।२−मन्त्र १-३ ऋग्वेद मेंहैं−१०।८५।१-३। मन्त्र ३ भेद से हैं ॥

    टिप्पणी

    १−(सत्येन) नित्यस्वरूपेणब्रह्मणा (उत्तभिता) उत्तमतया धारिता (भूमिः) (सूर्येण) आदित्यमण्डलेन (उत्तभिता) (द्यौः)प्रकाशः (ऋतेन) सत्यनियमेन (आदित्याः) आदीप्यमानाः किरणाः। अखण्डाः सूक्ष्माःपरमाणवः (तिष्ठन्ति) वर्तन्ते (दिवि) सूर्यप्रकाशे (सोमः) चन्द्रमाः (अधि)यथाविधि (श्रितः) स्थितः ॥

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    विषय

    'सत्य, सूर्य, ऋत, सोम'

    पदार्थ

    १. इस सारे काण्ड का ऋषि व देवता सूर्या सावित्री ही है। यह गृहपत्नी का नाम रक्खा गया है। स्पष्ट है कि पति को सूर्यसम ज्ञानदीस होना चाहिए तथा पत्नी सावित्री हो-बच्चों को व घरवालों को सदा उत्तम प्रेरणा देनेवाली। सूर्या सावित्री कहती है कि (सत्येन भूमिः उत्तभिता) = सत्य से पृथिवी थामी गई है। पृथिवी सत्य पर ही आश्रित है। विशेषत: घर में पति पत्नी का सत्य-व्यवहार ही उसके गृहस्थ-जीवन को सुखी बना सकता है। असत्य से वे परस्पर आशंकित मनोवृत्तिवाले होंगे और गृहस्थ के मूलतत्त्व 'प्रेम' को खो बैठेंगे। २. (सूर्येण द्यौ: उत्तभिता) = सूर्य से धुलोक थामा गया है। द्युलोकत्व इस सूर्य के कारण ही है। सूर्य ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान के बिना घर प्रकाशमय नहीं लगता। ज्ञान से ही मापक ऊँचा उठता है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य 'मनुष्य' ही नहीं रहता। ज्ञानशून्य घर का जीवन पशतल्य हो जाता है। ३. (आदित्या:-अदिति) = अदीना देवमाता के पुत्र, अर्थात् देव (ऋतेन) = ऋत से-नियमितता व यज्ञ से (तिष्ठन्ति) = स्थित होते हैं। जहाँ ऋत होता है वहाँ घर के व्यक्ति 'देव' बनते हैं। घर का तीसरा सूत्र'ऋत' है। सब कार्यों को व्यवस्था से करना आवश्यक ही है। घर में यज्ञों का होना उतना ही आवश्यक है। ये यज्ञ ही घर को स्वर्ग बनाते हैं। (सोमः) = वीर्य (दिवि अधिश्रितः) = ज्ञान में आश्रित है। सोम के रक्षण के लिए स्वाध्याय की वृत्ति आवश्यक है। यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है। साथ ही इस सोम का रक्षण करनेवाले पति-पत्नी उत्तम सन्तानों को जन्म देते हैं।

    भावार्थ

    उत्तम घर वह है, [क] जहाँ सत्य है, [ख] ज्ञान प्रवणवत्ता है, [ग] ऋत का पालन होता है-यज्ञमय जीवन होता है और [घ] सोम का रक्षण होता है।

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    भाषार्थ

    (सत्येन) सत्य द्वारा (भूमिः) सन्तानोत्पादक भूमि अर्थात् मातृशक्ति (उत्तभिता) थामी हुई है, (सूर्येण) दृष्टि१ शक्ति तथा मस्तिस्क शक्ति द्वारा (द्यौः) पितृशक्ति (उत्तभिता) थामी हुई है। (ऋतेन) नियमों द्वारा (आदित्याः) आदित्य ब्रह्मचारी (तिष्ठन्ति) अपने व्रतों में स्थित रहते हैं, जिन के कि (दिवि) सिर या मस्तिष्क में (सोमः) वीर्य (अधिश्रितः) आश्रित होता है।

    टिप्पणी

    [भूमिः = मातृशक्ति "द्यौरहं पृथिवी त्वम्" (अथर्व० १४।२।७१)। विवाह संस्कार में वर कहता है कि वधू ! मैं तो द्यौ हूं और तू पृथिवी है। भूमिः- भवन्ति, उत्पद्यन्ते, अपत्यानि यस्याम्। सूर्येण =चक्षुषा “चक्षोः सूर्यो अजायत" (यजु० ३१।१२) तथा "यस्य सूर्यः चक्षु" (अथर्व० १०।७।३३)। द्यौः = पितृशक्ति (अथर्व० १४।२।७१)। दिवि - सिर में, "दिवं यश्चक्रे मूर्धानम्" (अथर्व० १०।७।३२); तथा "शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत" (यजु० ३१।१३)। सोमः- वीर्य; "रेतः सोमः" (कौ० ब्रा० १३।७; श० ब्रा० ३।३।२।१; ३।३।४।२८; ३।४।३।११; १।९।२।९; २।५।१।९; ३।८।५।२; तै० ब्रा० २।७।४।१] व्याख्या-- सत्याचार तथा सत्यानुष्ठान का सम्बन्ध मातृशक्ति के साथ दर्शाया है। माताओं में धर्मभावना अधिक जागरूक रहती है। मातृशक्ति में यदि सत्याचार और सत्यानुष्ठान का अभाव हो तो सन्तति पर इसका बुरा प्रभाव अधिक मात्रा में पड़ता है, और नैतिक दृष्टि से समाज संगठन भी अधिक ढीला पड़ जाता है। इसलिये मातृशक्ति में सत्याचार तथा सत्यानुष्ठान की अत्यन्त आवश्यकता है। सूर्य द्वारा द्युलोक थमा हुआ है,-ऐसा अर्थ युक्ति विरुद्ध है। सूर्य भी एक नक्षत्र या तारा है। यथा “अग्ने नक्षत्रमजरमा सूर्य रोहयो दिवि" (ऋ० १०।१५६।४)। हे अग्नि! तूने अजर-नक्षत्र सूर्य को द्युलोक में आरूढ किया है। द्युलोक में अन्य नक्षत्र तथा तारे इस सूर्य से भी बड़े हैं, अतः यह सूर्य द्युलोक को थामे हुए है, -यह कथन उपपन्न नहीं हो सकता। साथ ही यह भी जानना चाहिये कि काण्ड १४ के सूक्त १ और २ विवाहपरक हैं। विवाह के प्रकरण में "सूर्य द्युलोक को थामे हुए है"- ऐसा वर्णन निष्प्रयोजन है। ऐसे ही मन्त्र के शेष भाग की भी प्रसिद्ध व्याख्या युक्तिरहित है। पितृशक्ति में सत्याचार तथा सत्यानुष्ठान के साथ साथ दृष्टिशक्ति और दिमागी शक्ति का प्राधान्य होना चाहिये। पितृशक्ति में ये दो गुण.. प्रायः प्रधान होते हैं। दृष्टिशक्ति का अभिप्राय है देखने-परखने की शक्ति, तथा दिमागी शक्ति का अभिप्राय है विचार, निर्णय आादि शक्तियां। मातृशक्ति में हृदय का प्राधान्य होना चाहिए और पितृशक्ति में दिमाग का। इसीलिये मन्त्र में मातृशक्ति के साथ सत्य का सम्बन्ध दर्शाया है और पितृशक्ति के साथ सूर्य का अर्थात् ज्ञान प्रकाश का। मातृशक्ति की स्थिति सत्यनिष्ठा पर निर्भर है और पितृशक्ति की दिमाग पर। ऋत२ का अर्थ है नियम तथा पवित्रकर्म आदि। ब्रह्मचर्याश्रम में ऋत अर्थात् नियमों तथा पवित्र कर्मों की बड़ी आवश्यकता होती है। विना नियमों और पवित्रकर्मों के वसु= ब्रह्मचारी [२४ वर्षों का ब्रह्मचारी] बनना भी दुष्कर हो जाता है, आदित्य= ब्रह्मचारी अर्थात् ४८ वर्षों का ब्रह्मचर्य पालन करना तो सुतरां अति कठिन है। मन्त्र में यह दर्शाया है कि आदित्य ब्रह्मचारी बनने के लिए यह आवश्यक है कि ब्रह्मचारी ऋत-मार्ग का अवलम्ब ले, अनृत-मार्ग का नहीं। मंत्र में सोम शब्द का अर्थ वीर्य हैं। इस सम्बन्ध में अन्य प्रमाण:- (अ) सोम शब्द "सु" धातु से बना है जिस का अर्थ प्रसव भी है। वीर्य, प्रसव का कारण है। Seed, Semen शब्दों में भी "सु" धातु ही प्रतीत होती है। सोम शब्द में "सु" धातु और "मन्" प्रत्यय है (उणा० १।१४०)। अतः सोम का मौलिकरूप "सुमन्" है, जो कि Semen का अनुरूप है। Semen का अर्थ अंग्रेजी भाषा में वीर्य है। (आ) यजुर्वेद १९ तथा २० अध्यायों में सोम को शुक्र, रेतः, और इन्द्रिय कहा है (१९।७२, ७६, ७९, २०।५५)। शुक्र का अर्थ वीर्य भी होता है। तथा इन्द्रिय का अर्थ बल३ और सामर्थ्य भी। वीर्य द्वारा बल और सामर्थ्य प्राप्त होता है। (इ) आयुर्वेद में अग्नि और सोम शब्द का प्रयोग रजस् तथा वीर्य के लिए हुआ है। यथा "सौम्यं शुक्रमार्तवमाग्नेयम्", अर्थात् शुक्र सोम है, तथा ऋतुधर्म अग्नि है। तथा "शुक्रं च्युतं योनिमभिप्रपद्यते संसृज्यते चार्त्तवेन। ततोऽग्निसोमसंयोगात् संसृज्यमानो, गर्भाशयमनु प्रतिपद्यते क्षेत्रज्ञः" (सुश्रुत, शरीर स्थान, अ० ३, सूत्र ४)। अर्थात् शुक्र (वीर्य) पुरुष से च्युत होकर योनि में आता है, और ऋतुधर्म (रजस्) के साथ मिलता है। तब अग्नि और सोम के संयोग के साथ मिलकर जीवात्मा गर्भाशय को प्राप्त होता है। वैदिक साहित्य के अनुसार संसार तीन लोकों में बंटा हुआ है। पृथिवी-लोक, अन्तरिक्ष लोक, तथा द्युलोक में। आधिदैविक दृष्टि में ये तीन लोक प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे हैं। आध्यात्मिक दृष्टि में पैर से कटिभाग तक पृथिवीलोक, मध्यभाग अन्तरिक्षलोक, तथा ज्ञानेन्द्रियों समेत सिर द्युलोक है। वेद में द्युलोक तथा मूर्धा अर्थात् सिर में उपमानोपमेयभाव दर्शाया है। यथा- "दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः" (अथर्व० १०।७।३३)। इसलिये प्रकरणानुसार मन्त्र में "दिवि" का अर्थ है सिर या मस्तिष्क में। मन्त्र के उत्तरार्ध में यह दर्शाया है कि नियमों तथा कर्तव्यों के पालन करने पर मनुष्य आदित्य-ब्रह्मचारी बनता है, और इन आदित्य-ब्रह्मचारियों के दिव् अर्थात् मस्तिष्क या सिर में सोम अर्थात् वीर्य आश्रित रहता है, अर्थात् वीर्य इन के मस्तिष्क तथा विचारशक्ति का निर्माण और परिपोषण करता है। ऐसे ब्रह्मचारी को "ऊर्ध्वरेता" कहते हैं। इस प्रकार मंत्र में मातृशक्ति और पितृशक्ति में भेद दर्शा कर, अन्त में उच्चकोटि के ब्रह्मचर्य का वर्णन किया है, और साथ ही ब्रह्मचर्य के साधनों का भी वर्णन हुआ है। मंत्र का सार यह है कि उच्चकोटि के आदित्य ब्रह्मचारी का, तथा सत्य आदि धार्मिक भावनाओं वाली और भूमि के सदृश उत्पादनशक्ति वाली "सूर्या" नामक ब्रह्मचारिणी का परस्पर विवाह आदर्श विवाह है।] [१."चक्षोः सूर्योऽअजायत" (यजु० ३१।१२) में, सूर्य और चक्षुः अर्थात् दृष्टि का परस्पर सम्बन्ध दर्शाया है। २. ऋत= Thoper, Right, Fixed or settled rule, law, Gious action, Divine truth (आप्टे)। ३. इन्द्रिय = Power, force (आप्टे)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Surya’s Wedding

    Meaning

    (MARRIAGE AND FAMILY) The earth is sustained by Truth, the solar region is sustained by the sun, the sun across the Zodiacs is sustained by Rtam, laws of nature, and Soma, moon, is sustained in heavenly space. By implication: Bhumi, mother Shakti, is sustained in the home by Truth, Dyau, father power, is sustained by vision and intelligence, Aditya Brahmacharis in the commumity are sustained by the discipline of law and austerity, and Soma, the vitality of virility and fertility, is sustained in the heavenly heights of Brahmacharya discipline.

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    Subject

    Somah

    Translation

    Earth is upheld by truth; heaven is upheld by the sun; the solar regions are supported by eternal laws; the elixir of divine love is supreme in heaven. (Rg. X.85.1)

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    Translation

    The Earth is upheld by Satya, God; the heavenly region is held firm by the sun, Adityas, the twelve months' stand secure by the law eternal and the moon holds its place in space.

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    Translation

    God upholds the Earth. The Sun upholds the heaven. By Law the luminous planets stand secure, and the Moon holds her place in heaven.

    Footnote

    The last part of the verse has been translated by Pt. Jaidev Vidyalankar as: Like the lustrous Sun, semen resides in an energetic person.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(सत्येन) नित्यस्वरूपेणब्रह्मणा (उत्तभिता) उत्तमतया धारिता (भूमिः) (सूर्येण) आदित्यमण्डलेन (उत्तभिता) (द्यौः)प्रकाशः (ऋतेन) सत्यनियमेन (आदित्याः) आदीप्यमानाः किरणाः। अखण्डाः सूक्ष्माःपरमाणवः (तिष्ठन्ति) वर्तन्ते (दिवि) सूर्यप्रकाशे (सोमः) चन्द्रमाः (अधि)यथाविधि (श्रितः) स्थितः ॥

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