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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 1 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वेनः देवता - ब्रह्मात्मा छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - परमधाम सूक्त
    460

    वे॒नस्तत्प॑श्यत्पर॒मं गुहा॒ यद्यत्र॒ विश्वं॒ भव॒त्येक॑रूपम्। इ॒दं पृश्नि॑रदुह॒ज्जाय॑मानाः स्व॒र्विदो॑ अ॒भ्य॑नूषत॒ व्राः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वे॒न: । तत् । प॒श्य॒त् । प॒र॒मम् । गुहा॑ । यत् । यत्र॑ । विश्व॑म् । भव॑ति । एक॑ऽरूपम् । इ॒दम् । पृश्नि॑: । अ॒दु॒ह॒त् । जाय॑माना: । स्व॒:ऽविद॑: । अ॒भि । अ॒नू॒ष॒त॒ । व्रा: ॥ १.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वेनस्तत्पश्यत्परमं गुहा यद्यत्र विश्वं भवत्येकरूपम्। इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वेन: । तत् । पश्यत् । परमम् । गुहा । यत् । यत्र । विश्वम् । भवति । एकऽरूपम् । इदम् । पृश्नि: । अदुहत् । जायमाना: । स्व:ऽविद: । अभि । अनूषत । व्रा: ॥ १.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्म के मिलने का उपदेश।

    पदार्थ

    (वेनः) बुद्धिमान् पुरुष (तत्) उस (परमम्) अति श्रेष्ठ परब्रह्म को (पश्यत्=०–ति) देखता है, (यत्) जो ब्रह्म (गुहा=गुहायाम्) गुफा के भीतर [वर्त्तमान है] और (यत्र) जिसमें (विश्वम्) सब जगत् (एकरूपम्) एकरूप [निरन्तर व्याप्त] (भवति) वर्त्तमान है। (इदम्) इस परम ऐश्वर्य के कारण [ब्रह्मज्ञान] को (पृश्निः) [ईश्वर से] स्पर्श रखनेवाले मनुष्य ने (जायमानाः) उत्पन्न होती हुयी अनेक रचनाओं से (अदुहत्) दुहा है और (स्वर्विदः) सुखस्वरूप वा आदित्यवर्ण ब्रह्म के जाननेवाले (व्राः) वरणीय विद्वानों ने [उस ब्रह्म की] (अभि) विविध प्रकार से (अनूषत) स्तुति की है ॥१॥

    भावार्थ

    वह परम ब्रह्म सूक्ष्म तो ऐसा है कि वह (गुहा) हृदय आदि प्रत्येक सूक्ष्म स्थान का अन्तर्यामी है और स्थूल भी ऐसा है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसके भीतर समा रहा है। धीर ध्यानी महात्मा उस जगदीश्वर की अनन्त रचनाओं से विज्ञान और उपकार प्राप्त करके मुक्त कण्ठ से आत्मसमर्पण करते हुए उसकी स्तुति करते और ब्रह्मानन्द में मग्न रहते हैं ॥१॥ देखिये–यजुर्वेद अध्याय ३२ मन्त्र ८। वे॒नस्तत् प॑श्यन्निहि॑तं गुहा सद् यत्र॒ विश्वं॒ भव॒त्येक॑नीडम्। तस्मि॑न्नि॒द सं च॒ वि चै॑ति॒ सर्व॒ स ओतः प्रोत॑श्च वि॒भूः प्र॒जासु॑ ॥१॥ (वेनः) पण्डितजन (तत्) उस (गुहा) बुद्धि वा गुप्त कारण में (निहितम्) वर्त्तमान (सत्) नित्यस्वरूप ब्रह्म को (पश्यत्=०–ति) देखता है, (यत्र) जिस ब्रह्म में (विश्वम्) सब जगत् (एकनीडम्) एक आश्रयवाला (भवति) होता है। (च) और (तस्मिन्) उसमें (इदम्) यह (सर्वम्) सब जगत् (सम्) मिलकर (च) और (वि) अलग-अलग होकर (एति) चेष्टा करता है, (सः) वह (विभूः) सर्वव्यापक परमात्मा (प्रजासु) प्रजाओं में [वस्त्र में सूत के समान] (ओतः) ताना किये हुए (च) और (प्रोतः) बाना किये हुए है ॥

    टिप्पणी

    १–शब्दार्थव्याकरणादिप्रक्रिया–वेनः। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। इति अज गतिक्षेपणयोः–न प्रत्ययः, वीभावः। यद्वा, वेनति कान्तिकर्मा, निघ० २।६। ततः। पुंसि सञ्ज्ञायां घः प्रायेण। पा० ३।३।११८। इति घ प्रत्ययः। वेनो वेनतेः कान्तिकर्मणः–इति यास्कः, निरु० १०।३८। गतिमान्। दीप्यमानः। मेधावी–निघ० २।१५। पश्यत्। इकारलोपः। पश्यति, साक्षात्करोति। परमम्। अ० १।१३।३। पर+मा माने–क। उत्कृष्टम्। गुहा। अ० १।८।४। गुहायाम्। गुप्तस्थाने। यत्र। यस्मिन् सर्वाधिष्ठाने ब्रह्मणि। विश्वम्। अ० १।१।१। सर्वं जगत्। एकरूपम्। इण्भीकापाशल्यतिमर्चिभ्यः कन्। उ० ३।४३। इति इण् गतौ–कन् एति प्राप्नोतीत्येकम्। रूयते कीर्त्यते तद्रूपम्। अ० १।१।१। सर्वथा, निरन्तरं व्याप्तम्। इदम्। इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इति इदि परमैश्वर्ये–कमिन्। नकारलोपः। इन्दति परमैश्वर्यहेतुर्भवतीति इदम्। प्रत्यक्षज्ञानम्। पृश्निः। घृणिपृश्निपार्ष्णि०। उ० ४।५२। इति स्पृश स्पर्शे–नि प्रत्ययः, सलोपः। स्पृशति, योगेन ब्रह्म प्राप्नोतीति पृश्निः। समाधिस्थयोगी पुरुषः। पृश्निरादित्यो भवति प्राश्नुत एनं वर्ण इति नैरुक्ताः संस्प्रष्टा रसान् संस्प्रष्टा भासं ज्योतिषां संस्पृष्टो भासेति वा–निरु० २।१४। इति यास्कवचनाद् योगैश्वर्येण सूर्यवत् प्रकाशमानः पुरुषः। अदुहत्। दुह प्रपूरणे–लुङ्, छान्दसो अङ्। आकृष्टवान्, प्राप्तवान्। द्विकर्मकत्वात् (इदम्) इति (जायमानाः) इति शब्दस्य च कर्मकत्वम्। जायमानाः। जनी जनने, प्रादुर्भावे–शानच्। उत्पद्यमानाः प्रजाः। स्वर्विदः। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति स्वृ शब्दोपतापयोः–विच्। यद्वा सु+ऋ गतौ, ईर गतौ वा–विच्। स्वरादित्यो भवति। सु अरणः सु ईरणः स्वृतो रसान् स्वृतो भासं ज्योतिषां स्वृतो भासेति वा–निरु० २।१४। ततो विद ज्ञाने–क्विप्। स्वःशब्दाभिधेयं सुखस्वरूपम् आदित्यवर्णं वा परब्रह्म विदन्ति जानन्तीति स्वर्विदः परब्रह्मज्ञातारः। अभि। आभिमुख्येन, सर्वतः। अनूषत। णू स्तवने–लुङ्, छान्दसम् आत्मनेपदम्। स्तुतवन्तः। व्राः। गेहे कः। पा० ३।१।१४४। इति वृञ् वरणे–बाहुलकात् कः, यणादेशः, जस्। स्वशोभनगुणैर्व्रियमाणाः संभज्यमानाः स्वीक्रियमाणाः पुरुषाः। यद्वा। ब्रह्मणो वरितारो अन्वेष्टारः ॥

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    विषय

    वेन का प्रभु-दर्शन

    पदार्थ

    १. (वेन:) = प्रभु की महिमा को देखनेवाला और उसकी उपासना करनेवाला ही (तत्) = उस परमात्मा को (पश्यत्) = देखता है, जो (परमम्) = सर्वोत्कृष्ट है और (यत्) = जो गुहा-हृदयरूप गुहा में आसीन है, (यत्र) = जिस परमात्मा में (विश्वम्) = यह सारा संसार (एकरूपं भवति) = एकरूप हो जाता है। जैसे भिन्न-भिन्न आकृतिवाली शहद से भरी शीशियाँ, शहद का ज्ञान होने पर इसी रूप में कही जाती हैं कि सब शहद है, इसीप्रकार परमात्मदर्शन होने पर सब समरूप से परमात्मामय ही हो जाता है-(विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिनः ॥) प्रभु-दर्शन होने पर भेदभाव समाप्त हो जाता है और सर्वत्र प्रभु-ही-प्रभु दीखते हैं। २. (जायमान:) उस प्रभुरूप अध्यक्ष से इस चराचर को जन्म देती हुई (पृश्नि:) = यह 'लोहित शुक्ल-कृष्णा' [diversified, विभिन्नरूपा] प्रकृति (इदम्) = इस जगत् को (अदुहत्) = अपने में से दूहती है-('मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्')। इस जगत् का प्रत्येक पदार्थ उस रचयिता प्रभु की रचनाचातुरी को व्यक्त कर रहा है। ये (स्वर्विदः) = आकाश में विद्यमान अथवा प्रकाश को प्राप्त करनेवाले [विद् लाभे] (ब्रा:) = [वृ आच्छादने] आकाश को आच्छादित करनेवाले तारे (अभ्यनूषत) = उस प्रभु का स्तवन कर रहे हैं। द्रष्टा को इनमें प्रभु की महिमा दीखती है। यह नक्षत्रविद्यावित् इन नक्षत्रों में वर्तमान क्रम को देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है। यह सचमुच 'वेन' बनता है [वेन्-to see]-प्रभु की महिमा का द्रष्टा।

    भावार्थ

    'वेन' विश्व के कण-कण में प्रभु की महिमा का दर्शन करता है।

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    भाषार्थ

    (वेनः) कामनावाला उपासक (तत्) उस ब्रह्म को ( पश्यत् ) देखता है, साक्षात् करता है, (परमम् ) जो ब्रह्म कि परश्रीरूप है, (यत् गुहा ) जो हृदय-गुहा में विद्यमान है, (यत्र) जिसमें (विश्वम्) समग्र ब्रह्माण्ड (एकरूपम् भवति) एकरूप हो जाता है [प्रलय में ] । (इदम् ) इस ब्रह्म को ( पृश्नि ) व्याप्तवर्णवाले द्युलोक ने (अदुहत्) दोहा है, (जायमानाः) पैदा हुए, (स्वर्विदः) उपतप्त द्युलोक में विद्यमान (व्राः) द्युलोक का आवरण किये हुए नक्षत्र-तारा-मण्डल (अभि) इसके अभिमुख होकर (अनूषत) मानो इसकी स्तुतियाँ कर रहे हैं ।

    टिप्पणी

    [परमम्=पर+ मा, लक्ष्मी या श्री। यथा "श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ" (यजु० ३१।२२)। पृश्निः= अथ द्योः संस्पृष्टा ज्योतिभिः (निरुक्त० २।४।१४)। अदुहत्= मानो द्युलोक ने "इदं ब्रह्म" का दोहन कर दुग्धवत् शुभ्र नक्षत्र-तारामण्डलों को प्राप्त किया है।]

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    विषय

    परमात्मदर्शन ।

    भावार्थ

    (यत्) जो ब्रह्म ( गुहा) गुहा में, हृदय में और समस्त ब्रह्माण्ड रूप गुहा में व्यापक या अज्ञायमान स्वरूप है (परमं) तथा सर्वोत्कृष्ट है (तत्) उसको ( वेनः ) ज्ञान ज्योतिर्मय विद्वान् योगी (पश्यत्) साक्षात् करता है (यत्र) जिस ब्रह्म में (विश्वं) समस्त संसार (एकरूपम्) एकरूप, प्रलयकाल में एकाकार (भवति) हो जाता है, (पृश्निः) नाना वर्णों से स्पष्ट प्रकृति ने (इदं) इस ब्रह्म का (अदुहत्) दोहन किया है। अर्थात् ब्रह्म के ज्ञान के दो प्रकार हैं। एक तो अन्तर्ध्यान और दूसरा प्रकृति के रहस्यों का खोजना। प्रकृति के नाना रूपों में छिपे हुए ब्रह्म के ज्ञान का यहां वर्णन है । प्रकृति मानो अपने नाना रूपों तथा विषयों द्वारा ब्रह्मसम्बन्धी ज्ञानदुग्ध अन्वेषकों को पिला रही है । (जायमानाः) उत्पन्न होते हुए सिद्ध (व्राः) जिन्होंने कि उस ब्रह्म को ध्येय रूप से वरण किया है इस प्रकार प्रकृति के रहस्यों द्वारा ब्रह्म को जान कर (स्वर्विदः) और जो प्रकाशस्वरूप उस मोक्षसुख को जाने हुए या प्राप्त किये हुए हैं वे ब्रह्म की (अभि अनूषत्) साक्षात् स्तुति करते हैं ।

    टिप्पणी

    वेनस्तत्पश्यन् निहितं गुहा सद् यत्र वश्वं भवत्येकनीऽम्। तस्मिन्निन्द्रं संच विचैति सर्वे स ओतः प्रोतश्च विभूः प्रजासु इति यजु०। तत्र स्वयंभु ब्रह्मऋषिः । परमात्मा देवता। (प्र०) ‘वेनस्तत् पश्यन् परंपदम्’ (द्वि०) ‘भवत्येक नडम्’ (तृ०) ‘इदं धेनुरदुहद्’ (च०) स्वर्विदोऽभ्यनुक्तिर्विराट् इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वेन ऋषिः । ब्रह्मात्मा देवता । १, २, ४ त्रिष्टुभः | ३ जगती । चतुर्ऋचं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Supreme Abode

    Meaning

    The wise visionary realises, directly sees with the inward eye, that supreme mystery which is the centre wherein this entire universe of diversity becomes one reality of indistinguishable homageneous form as Prakrti. This world of wondrous variety, variable Prakrti receives from that centrality as the forms arise through evolution. The sages who know the supreme blissful reality dedicate themselves to It as they arise in awareness and celebrate It in words of exaltation. That’s their highest act of choice.

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    Subject

    Brahman or Arman

    Translation

    The Vena, the dexterous seeker, beholds the supreme that lies in the cavity and wherein all this assumes one form. The varigated one (the matter, the Sun, the ākāša,) has produced this all. The blessed ones, being born, having attained the light, extol Him with praises.

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    Translation

    The Sage perceives that excellent Being who exists in the Secret recess of his heart and wherein all the universe assumes one causal form, the homogeneous state of matter. The material cause of the universe obtains its various forms of created objects from Him. The enlightened persons who know the exact nature of blessedness worship Him.

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    Translation

    A devotee alone beholds that Highest God, Who lies hidden in the in-most recesses of the heart, in whom this whole universe remains in one form and fashion. From Him hath Matter milked life and brought into existence many objects. The learned who know God, extol Him in a nice way. [1]

    Footnote

    [1] In one form and fashion; when the universe is dissolved by God, all material objects lose their separate existence, and are resolved to a uniform atomic state, without distinction. See Yajur, 32- 8.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १–शब्दार्थव्याकरणादिप्रक्रिया–वेनः। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। इति अज गतिक्षेपणयोः–न प्रत्ययः, वीभावः। यद्वा, वेनति कान्तिकर्मा, निघ० २।६। ततः। पुंसि सञ्ज्ञायां घः प्रायेण। पा० ३।३।११८। इति घ प्रत्ययः। वेनो वेनतेः कान्तिकर्मणः–इति यास्कः, निरु० १०।३८। गतिमान्। दीप्यमानः। मेधावी–निघ० २।१५। पश्यत्। इकारलोपः। पश्यति, साक्षात्करोति। परमम्। अ० १।१३।३। पर+मा माने–क। उत्कृष्टम्। गुहा। अ० १।८।४। गुहायाम्। गुप्तस्थाने। यत्र। यस्मिन् सर्वाधिष्ठाने ब्रह्मणि। विश्वम्। अ० १।१।१। सर्वं जगत्। एकरूपम्। इण्भीकापाशल्यतिमर्चिभ्यः कन्। उ० ३।४३। इति इण् गतौ–कन् एति प्राप्नोतीत्येकम्। रूयते कीर्त्यते तद्रूपम्। अ० १।१।१। सर्वथा, निरन्तरं व्याप्तम्। इदम्। इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इति इदि परमैश्वर्ये–कमिन्। नकारलोपः। इन्दति परमैश्वर्यहेतुर्भवतीति इदम्। प्रत्यक्षज्ञानम्। पृश्निः। घृणिपृश्निपार्ष्णि०। उ० ४।५२। इति स्पृश स्पर्शे–नि प्रत्ययः, सलोपः। स्पृशति, योगेन ब्रह्म प्राप्नोतीति पृश्निः। समाधिस्थयोगी पुरुषः। पृश्निरादित्यो भवति प्राश्नुत एनं वर्ण इति नैरुक्ताः संस्प्रष्टा रसान् संस्प्रष्टा भासं ज्योतिषां संस्पृष्टो भासेति वा–निरु० २।१४। इति यास्कवचनाद् योगैश्वर्येण सूर्यवत् प्रकाशमानः पुरुषः। अदुहत्। दुह प्रपूरणे–लुङ्, छान्दसो अङ्। आकृष्टवान्, प्राप्तवान्। द्विकर्मकत्वात् (इदम्) इति (जायमानाः) इति शब्दस्य च कर्मकत्वम्। जायमानाः। जनी जनने, प्रादुर्भावे–शानच्। उत्पद्यमानाः प्रजाः। स्वर्विदः। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति स्वृ शब्दोपतापयोः–विच्। यद्वा सु+ऋ गतौ, ईर गतौ वा–विच्। स्वरादित्यो भवति। सु अरणः सु ईरणः स्वृतो रसान् स्वृतो भासं ज्योतिषां स्वृतो भासेति वा–निरु० २।१४। ततो विद ज्ञाने–क्विप्। स्वःशब्दाभिधेयं सुखस्वरूपम् आदित्यवर्णं वा परब्रह्म विदन्ति जानन्तीति स्वर्विदः परब्रह्मज्ञातारः। अभि। आभिमुख्येन, सर्वतः। अनूषत। णू स्तवने–लुङ्, छान्दसम् आत्मनेपदम्। स्तुतवन्तः। व्राः। गेहे कः। पा० ३।१।१४४। इति वृञ् वरणे–बाहुलकात् कः, यणादेशः, जस्। स्वशोभनगुणैर्व्रियमाणाः संभज्यमानाः स्वीक्रियमाणाः पुरुषाः। यद्वा। ब्रह्मणो वरितारो अन्वेष्टारः ॥

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    बंगाली (3)

    पदार्थ

    (বেনঃ) বুদ্ধিমান পুরুষ (তৎ) সেই (পরমাং) পরব্রহ্মকে (পশ্যৎ) দর্শন করেন, (য়) যে ব্রহ্ম (গুহা) হৃদয় কন্দরে বর্তমান আছেন, (য়ত্র) যাহাতে (বিশ্বং) সব জগৎ (একরূপং) নিরন্তর ব্যাপ্ত (ভবতি) আছে। (ইদং) এই ব্রহ্ম জ্ঞানকে (পৃশ্নিঃ) মনুষ্য (জায়মানাঃ) উৎপন্ন সৃষ্টি রচনা হইতে (অদুহৎ) দোহন করে এবং (স্ববিদঃ) সুখ স্বরূপ পরব্রহ্মের বেত্তা (ব্রাঃ) বরণীয় বিদ্বানেরা (অভি) বিবিধভাবে (অনূষত) সেই পরব্রহ্মের স্তুতি করিয়াছেন।।

    भावार्थ

    বুদ্ধিমান পুরুষ সেই পরব্রহ্মকে প্রত্যক্ষ দর্শন করেন। যিনি হৃদয় কন্দরেও বর্তমান আছেন, যাহাতে সব জগৎ নিরন্তর ব্যাপ্ত আছে সেই ব্রহ্মকে মনুষ্য সৃষ্টি রচনা হইতে দোহন করে এবং সুখ স্বরূপ পরব্রহ্মের তত্তজ্ঞ বরণীয় বিদ্বানেরা বিবিধ ভাবে তাহার স্তুতি করেন।

    मन्त्र (बांग्ला)

    বেনস্তৎপশ্যপরমং গুহা য়দ্যত্র বিম্বং ভবত্যেকরূপম্ । ইদং পৃশিরদুহজ্জায়মানাঃ স্বৰ্বিদো অভ্যনুষত ব্ৰাঃ।।

    ऋषि | देवता | छन्द

    বেনঃ। ব্রহ্ম, আত্মা। ত্রিষ্টুপ্

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    भाषार्थ

    (বেনঃ) কামনাযুক্ত উপাসক (তৎ) সেই ব্রহ্মকে (পশ্যেৎ) দেখে, সাক্ষাৎ/উপলব্ধি করে, (পরমম্) যে ব্রহ্ম পরশ্রীরূপ, (যৎ গুহা) যিনি হৃদয়-গুহায় বিদ্যমান, (যত্র) যার মধ্যে (বিশ্বম্) সমগ্র ব্রহ্মাণ্ড (একরূপম্ ভবতি) একরূপ হয়ে যায় [প্রলয়ে]। (ইদম্) এই ব্রহ্মকে (পৃশ্নিঃ) ব্যাপ্তবর্ণের দ্যুলোক (অদুহৎ) দোহন করেছে, (জায়মানঃ) উৎপন্ন, (স্বর্বিদঃ) উপতপ্ত/জাজ্বল্যমান দ্যুলোকে বিদ্যমান (ব্রাঃ) দ্যুলোকের আবরক নক্ষত্র-তারা-মণ্ডল (অভি) [এই পরমেশ্বরের] অভিমুখ হয়ে (অনূষত) যেন স্তুতি করছে।

    टिप्पणी

    [পরমম্=পর+মা, লক্ষ্মী বা শ্রী। যথা "শ্রীশ্চ তে লক্ষ্মীশ্চ পত্নৌ" (যজু০ ৩১।২২) পৃশ্নিঃ= অথ দ্যৌঃ সংস্পৃষ্টা জ্যোতিভিঃ (নিরুক্ত ২।৪।১৪)। অদুহৎ = যেন দ্যুলোক "ইদং ব্রহ্ম" এর দোহন করে দুগ্ধবৎ শুভ্র নক্ষত্র-তারামণ্ডলকে প্রাপ্ত করেছে।]

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    मन्त्र विषय

    ব্রহ্মপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ

    भाषार्थ

    (বেনঃ) বুদ্ধিমান্ পুরুষ (তৎ) সেই (পরমম্) অতি শ্রেষ্ঠ পরব্রহ্মকে (পশ্যৎ=০–তি) দেখে, (যৎ) যে ব্রহ্ম (গুহা=গুহায়াম্) গুহার ভেতরে [বর্ত্তমান] এবং (যত্র) যার মধ্যে (বিশ্বম্) সব জগৎ (একরূপম্) একরূপ [নিরন্তর ব্যাপ্ত] (ভবতি) বর্ত্তমান। (ইদম্) এই পরম ঐশ্বর্যের কারণ [ব্রহ্মজ্ঞান]কে (পৃশ্নিঃ) [ঈশ্বরের সাথে] স্পর্শিত/সংসর্গী মনুষ্য (জায়মানাঃ) উৎপাদ্যমান/জায়মান অনেক রচনার থেকে (অদুহৎ) দোহন করেছে এবং (স্বর্বিদঃ) সুখস্বরূপ বা আদিত্যবর্ণ ব্রহ্মের জ্ঞাতা (ব্রাঃ) বরণীয় বিদ্বানগণ [সেই ব্রহ্মের] (অভি) বিবিধ প্রকারে (অনূষত) স্তুতি করেছে ॥১॥

    भावार्थ

    সেই পরম ব্রহ্ম এমন সূক্ষ্ম যে, তিনি (গুহা) হৃদয় আদি প্রত্যেক সূক্ষ্ম স্থানের অন্তর্যামী এবং এতটাই স্থূল যে সম্পূর্ণ ব্রহ্মাণ্ড উনার মধ্যে সমাবিষ্ট রয়েছে। ধীর ধ্যানী মহাত্মা সেই জগদীশ্বরের অনন্ত রচনা থেকে বিজ্ঞান এবং উপকার প্রাপ্ত করে মুক্ত কণ্ঠে আত্মসমর্পণ করে উনার স্তুতি করে এবং ব্রহ্মানন্দে মগ্ন থাকে॥১॥ দেখো–যজুর্বেদ অধ্যায় ৩২ মন্ত্র ৮। বে॒নস্তৎ প॑শ্যন্নিহি॑তং গুহা সদ্ যত্র॒ বিশ্বং॒ ভব॒ত্যেক॑নীডম্। তস্মি॑ন্নি॒দ সং চ॒ বি চৈ॑তি॒ সর্ব॒ স ওতঃ প্রোত॑শ্চ বি॒ভূঃ প্র॒জাসু॑ ॥১॥ (বেনঃ) পণ্ডিতগণ (তৎ) সেই (গুহা) বুদ্ধি বা গুপ্ত কারণে (নিহিতম্) বর্ত্তমান (সৎ) নিত্যস্বরূপ ব্রহ্মকে (পশ্যৎ=০–তি) দর্শন করে, (যত্র) যে ব্রহ্মের মধ্যে (বিশ্বম্) সব জগৎ (একনীডম্) এক আশ্রিত (ভবতি) হয়। (চ) এবং (তস্মিন্) তার মধ্যে (ইদম্) এই (সর্বম্) সব জগৎ (সম্) একসাথে (চ) এবং (বি) আলাদা-আলাদা হয়ে (এতি) চেষ্টা করে, (সঃ) সেই (বিভূঃ) সর্বব্যাপক পরমাত্মা (প্রজাসু) প্রজাদের মধ্যে [বস্ত্রের সূতোর সমান] (ওতঃ প্রোতঃ) ওতপ্রোত।।

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