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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 1 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 2/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वेनः देवता - ब्रह्मात्मा छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - परमधाम सूक्त
    173

    वे॒नस्तत्प॑श्यत्पर॒मं गुहा॒ यद्यत्र॒ विश्वं॒ भव॒त्येक॑रूपम्। इ॒दं पृश्नि॑रदुह॒ज्जाय॑मानाः स्व॒र्विदो॑ अ॒भ्य॑नूषत॒ व्राः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वे॒न: । तत् । प॒श्य॒त् । प॒र॒मम् । गुहा॑ । यत् । यत्र॑ । विश्व॑म् । भव॑ति । एक॑ऽरूपम् । इ॒दम् । पृश्नि॑: । अ॒दु॒ह॒त् । जाय॑माना: । स्व॒:ऽविद॑: । अ॒भि । अ॒नू॒ष॒त॒ । व्रा: ॥ १.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वेनस्तत्पश्यत्परमं गुहा यद्यत्र विश्वं भवत्येकरूपम्। इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वेन: । तत् । पश्यत् । परमम् । गुहा । यत् । यत्र । विश्वम् । भवति । एकऽरूपम् । इदम् । पृश्नि: । अदुहत् । जायमाना: । स्व:ऽविद: । अभि । अनूषत । व्रा: ॥ १.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (वेनः) बुद्धिमान् पुरुष (तत्) उस (परमम्) अति श्रेष्ठ परब्रह्म को (पश्यत्=०–ति) देखता है, (यत्) जो ब्रह्म (गुहा=गुहायाम्) गुफा के भीतर [वर्त्तमान है] और (यत्र) जिसमें (विश्वम्) सब जगत् (एकरूपम्) एकरूप [निरन्तर व्याप्त] (भवति) वर्त्तमान है। (इदम्) इस परम ऐश्वर्य के कारण [ब्रह्मज्ञान] को (पृश्निः) [ईश्वर से] स्पर्श रखनेवाले मनुष्य ने (जायमानाः) उत्पन्न होती हुयी अनेक रचनाओं से (अदुहत्) दुहा है और (स्वर्विदः) सुखस्वरूप वा आदित्यवर्ण ब्रह्म के जाननेवाले (व्राः) वरणीय विद्वानों ने [उस ब्रह्म की] (अभि) विविध प्रकार से (अनूषत) स्तुति की है ॥१॥

    भावार्थ - वह परम ब्रह्म सूक्ष्म तो ऐसा है कि वह (गुहा) हृदय आदि प्रत्येक सूक्ष्म स्थान का अन्तर्यामी है और स्थूल भी ऐसा है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसके भीतर समा रहा है। धीर ध्यानी महात्मा उस जगदीश्वर की अनन्त रचनाओं से विज्ञान और उपकार प्राप्त करके मुक्त कण्ठ से आत्मसमर्पण करते हुए उसकी स्तुति करते और ब्रह्मानन्द में मग्न रहते हैं ॥१॥ देखिये–यजुर्वेद अध्याय ३२ मन्त्र ८। वे॒नस्तत् प॑श्यन्निहि॑तं गुहा सद् यत्र॒ विश्वं॒ भव॒त्येक॑नीडम्। तस्मि॑न्नि॒द सं च॒ वि चै॑ति॒ सर्व॒ स ओतः प्रोत॑श्च वि॒भूः प्र॒जासु॑ ॥१॥ (वेनः) पण्डितजन (तत्) उस (गुहा) बुद्धि वा गुप्त कारण में (निहितम्) वर्त्तमान (सत्) नित्यस्वरूप ब्रह्म को (पश्यत्=०–ति) देखता है, (यत्र) जिस ब्रह्म में (विश्वम्) सब जगत् (एकनीडम्) एक आश्रयवाला (भवति) होता है। (च) और (तस्मिन्) उसमें (इदम्) यह (सर्वम्) सब जगत् (सम्) मिलकर (च) और (वि) अलग-अलग होकर (एति) चेष्टा करता है, (सः) वह (विभूः) सर्वव्यापक परमात्मा (प्रजासु) प्रजाओं में [वस्त्र में सूत के समान] (ओतः) ताना किये हुए (च) और (प्रोतः) बाना किये हुए है ॥


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    Meaning -
    The wise visionary realises, directly sees with the inward eye, that supreme mystery which is the centre wherein this entire universe of diversity becomes one reality of indistinguishable homageneous form as Prakrti. This world of wondrous variety, variable Prakrti receives from that centrality as the forms arise through evolution. The sages who know the supreme blissful reality dedicate themselves to It as they arise in awareness and celebrate It in words of exaltation. That’s their highest act of choice.


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