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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 14 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 14/ मन्त्र 1
    ऋषिः - चातनः देवता - शालाग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - दस्युनाशन सूक्त
    143

    निः॑सा॒लां धृ॒ष्णुं धि॒षण॑मेकवा॒द्यां जि॑घ॒त्स्व॑म्। सर्वा॒श्चण्ड॑स्य न॒प्त्यो॑ ना॒शया॑मः स॒दान्वाः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नि॒:ऽसा॒लाम् । धृ॒ष्णुम्। धि॒षण॑म् । ए॒क॒ऽवा॒द्याम् । जि॒घ॒त्ऽस्व᳡म् । सर्वा॑: । चण्ड॑स्य । न॒प्त्य᳡: । ना॒शया॑म: । स॒दान्वा॑: ॥१४.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    निःसालां धृष्णुं धिषणमेकवाद्यां जिघत्स्वम्। सर्वाश्चण्डस्य नप्त्यो नाशयामः सदान्वाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नि:ऽसालाम् । धृष्णुम्। धिषणम् । एकऽवाद्याम् । जिघत्ऽस्वम् । सर्वा: । चण्डस्य । नप्त्य: । नाशयाम: । सदान्वा: ॥१४.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    निर्धनता मनुष्यों को प्रयत्न से नष्ट करनी चाहिये।

    पदार्थ

    (निः सालाम्) विना साला वा घरवाली, (धृष्णुम्) भयानक रूपवाली, (एकवाद्याम्) [दीनता का] एक वचन बोलनेवाली, (धिषणम्) बोध वा उत्तम वाणी को (जिघत्स्वम्) खा लेनेवाली, (चण्डस्य) क्रोध की (सर्वाः) इन सब (नप्त्यः= नप्त्रीः) सन्तानों, (सदान्वाः) सदा चिल्लानेवाली यद्वा, दानवों, दुष्कर्मियों के साथ रहनेवाली [निर्धनता की पीड़ाओं] को (नाशयामः) हम मिटा देवें ॥१॥

    भावार्थ

    निर्धनता के कारण मनुष्य घर से निकल जाता, कुरूप हो जाता, दीन वचन बोलता और मतिभ्रष्ट हो जाता है और निर्धनता की पीड़ाएँ क्रोध अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दुष्टताओं से उत्पन्न होती हैं। मनुष्य को चाहिये कि दूरदर्शी होकर पुरुषार्थ से धन प्राप्त करके निर्धनता को न आने दे और सदा सुखी रहे ॥१॥ ऋग्वेद म० १०। सू० १५५। म० १। में ऐसा वर्णन है। अरा॑यि॒ काणे॒ विक॑टे गि॒रिं ग॑च्छ सदान्वे। शि॒रिम्बि॑ठस्य॒ सत्त्व॑भि॒स्तेभि॑ष्ट्वा चातयामसि ॥१॥ (अरायि) हे अदानशील [कंजूसिनि] ! (काणे) हे कानी ! (विकटे) हे लंगड़ी ! (सदान्वे=सदानोनुवे शब्दकारिके) सदा चिल्लानेवाली ! (गिरिम्) पहाड़ को (गच्छ) चली जा ! (शिरिम्बिठस्य) मेघ के (तेभिः) उन (सत्त्वभिः) जलों से (त्वा) तुझे (चातयामसि) हम मिटाये देते हैं ॥ इस ऋग्वेदमन्त्र की व्याख्या निरु० ६।३०। में है। उसके और निरुक्तटीकाकार देवराज यज्वा के आधार पर यहाँ अर्थ किया है ॥

    टिप्पणी

    १–निः सालाम्। सल गतौ–घञ्। सालः प्राकारोऽस्त्यस्याः सा साला गृहम्। अर्शआदिभ्योऽच्। पा० ५।२।१२७। इति अच्। टाप्। निर्गता सालायास्ताम्। निर्गृहाम्। धृष्णुम्। स्त्री०। त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः। पा० ३।२।१४०। इति धृषि क्रोधे हिंसे, शक्तिबन्धे–क्नु। धर्षणशीलां भयस्य जनयित्रीम्। धिषणम्। धृषेर्धिष च सञ्ज्ञायाम्। उ० २।८२। इति ञिधृषा प्रागल्भ्ये–क्यु, धिषादेशश्च। यद्वा, धिष शब्दे–क्यु, धिषणा वाङ्नाम–निघ० १।११। बुद्धिः, कोषे च। बोधं वाचं वा। (जिघत्स्वम्) इत्यस्य कर्म। एकवाद्याम्। ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। इति वद वाचि ण्यत्। एकम् एकप्रकारमेव वाद्यं दीनतारूपं वचनं यस्याः सा। ताम् अलक्ष्मीम्। जिघत्स्वम्। लुङ्सनोर्घस्लृ। पा० २।४।३७। इति अद भक्षणे+सन्–घस्लादेशः। ततः। सनाशंसभिक्ष उः। पा० ३।२।१६८। इति उः, स्त्रियाम् ऊङ् वा। अत्तुमिच्छुम्। सर्वाः। निखिलाः। चण्डस्य। नपुंसकलिङ्गम्। चडि कोपे–पचाद्यच्। यद्वा। ञमन्ताड् डः। उ० १।१११४। इति चण हिंसे–डः। डस्य न इत्वम्। कोपस्य। क्रोधस्य। नप्त्यः। न पतन्ति पितरो येनेति नप्ता। नप्तृनेष्टृत्वष्टृ०। उ० २।९५। इति न+पत अधोगतौ–तृन्। ऋन्नेभ्यो ङीप् पा० ४।१।५। इति ङीप्। छन्दसि र लोपो जश्त्वं च। नप्त्रीः। अपत्यभूताः। नाशयामः। हन्मः। सदान्वाः। नौतेः शब्दकर्मणो यङ्लुगन्तात्। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति पचाद्यच्। न धातुलोप आर्धधातुके। पा० १।१।४। इति गुणप्रतिषेधे उवङ्स्थाने छान्दसो यण् आदेशः, टाप् च। सदान्वे सदानोनुवे शब्दकारिके–निरु० ६।३०। दुर्भिक्षाधिदेवतोच्यते, कालकर्णा वा अलक्ष्मीः–इति तत्र टीकायां देवराजयज्वा। सदानोनुवाः। सर्वदा नोनूयमानाः। शब्दायमानाः सर्वप्रकारा दरिद्रतादिविपत्तीः यद्वा। स+दानवाः। केशाद् वोऽन्यतरस्याम्। पा० ५।२।१०९। अत्र वार्त्तिकम्। अन्येभ्योऽपि दृश्यते। इति व प्रत्ययो मत्वर्थे। अकारलोपः। दानवैश्छेदनशीलैः सह वर्तमानाः ॥

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    विषय

    पत्नी पर घर का निर्भर

    पदार्थ

    १. घर का बनना बहुत कुछ पत्नी पर निर्भर करता है। 'गृहिणी गृहमुच्यते' वस्तुत: गृहिणी ही घर है, अत: गृहिणी में जो-जो दोष सम्भव हैं उन सबका संकेत करते हुए कहते हैं कि निम्न दोषों से युक्त पत्नी तो पत्नी नहीं है, वह तो पिशाची है, उसे हम घर से (नाशयामः) = [णश अदर्शने] दूर करते हैं। [क] (नि:सालाम्) = [नि:सालयति निर्गमयति अपसारयति-सा०] जो लड़-झगड़कर बन्धुओं को घर से दूर करती है। पति के भाई आदि के साथ विरोध करके उनकी फूट का कारण बनती है अथवा 'सालात् निर्गता' सालवृक्ष से भी उन्नत शरीरवाली, अर्थात् बहुत बड़े आकारवाली है। [ख] (धृष्णम्) = धर्षणशील है, भय उत्पन्न करनेवाली है, [ग]

    (धिषणम्) = [धृष्णोति धृषेर्धिष च संज्ञायाम् ] बड़ों का निरादर करनेवाली है। 'बड़ों का निरादर करना' घर के अमङ्गल का हेतु होता है, [घ] (एकवाद्याम्) = [एकप्रकार परषरूपं वाद्यं वचनं यस्याः] कठोर बोलनेवाली व एक ही बात की रट लगानेवाली-जिद्दी स्वभाव की है,[ङ] (जियत्स्वम्) = सर्वदा भक्षणशीला है, [च] और जो (सर्वा:) = सब (चण्डस्य नप्त्य:) = क्रोध की सन्तान है, अर्थात् क्रोध से भरी हुई है,[छ] (सदान्वा:) = [सदा नोनूयामानाः, आक्रोशकारिणी:] सदा बोलती ही रहती है। २. वस्तुत: पत्नी का आदर्श यही है कि [क] वह घर में सबके साथ मधुर व्यवहार करनेवाली हो तथा बहुत लम्बे कद की न हो [ख]अपने व्यवहार और शब्दों से भय पैदा न करे, प्रेम का वातावरण रक्खे, [ग] बड़ों का निरादर न करे [घ] कठोर न बोले, न जिद्दी हो, [ङ] सबको खिलाकर खाये, उसमें चटोरापन न हो, [च] क्रोधी स्वभाव की न होकर प्रसन्न स्वभाववाली हो, [छ] बहुत न बोलती हो, सदा नपे-तुले शब्दों का ही प्रयोग करती हो, ऐसी ही पत्नी घर का सुन्दर निर्माण कर पाती है। इसके विपरीत तो घर के विनाश का ही कारण बनती है। वह गृहिणी नहीं, पिशाचनी होती है । वह पति के भी अल्पायुष्य का कारण बनती है।

    भावार्थ

    पत्नी उत्तम है तो घर बनता है। पत्नी के दोष से घर का विनाश होता है।

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    भाषार्थ

    (निःसालाम्) शाला से निकाल दी गई, (धृष्णुम्) धर्षक अर्थात् पराभूत करनेवाली, (धिषणम्) धर्षणशीला अर्थात् भयोत्पादिका, (एक वाद्याम्) एक ही वाद्य१ द्वारा गीत गानेवाली, (जिघत्स्वम्) खा जानेवाली (चण्डस्य) तथा प्रचण्ड रोग को (सर्वा नप्त्यः) इन सब अपत्यरूपा, (सदान्वाः) तथा सदा कष्टसूचक शब्दों का उच्चारण करानेवाली, स्त्रीजातिक रोग कीटाणुओं का (नाशयामः) हम नाश करते है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र १ में बहुविध रोग-कीटाणुओं का वर्णन हुआ है। ये कीटाणु स्त्री जाति के हैं। समग्र सूक्त में इन्हें स्त्रीलिङ्गी पदों द्वारा सूचित किया है।] [१. जैसेकि "दत्तावधानां मधुलेहगीतौ" (भट्टिकाव्य) में भ्रमर की गूंज को गीति कहकर उसके वाद्य की भी कल्पना की गई है, उसकी गीति सदा एक प्रकार की होती है, अतः उसका वाद्य भी एक ही कहा है। इसी प्रकार मच्छर की घूं-घूं को वाद्य कहा जा सकता है।]

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    विषय

    बुरी आदतों और कुस्वभाव के पुरुषों का त्याग ।

    भावार्थ

    (निः सालां) अवारागर्दी, (घृष्णुं) ढीठपन, (घिषणं) हठ (एकवाद्याम्) एक ही बात दोहराते जाना, (जिघत्स्वम्) और खाऊ होना आदि (सर्वाः) ये सब (चण्डस्य) अति प्रचण्ड क्रोधी और लोभी के (नप्तयः) साथ सम्बन्ध रखने वाली आदतें हैं, ( सदान्वाः ) इन रुलाने या कलह कराने वाली आदतों को (नाशयामः) हम विनाश करें। अथवा—(निः नाशयामः) समूल नाश करें।

    टिप्पणी

    ‘चण्डस्य नप्तियः’। इति पेप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः । शालाग्निमन्त्रोक्ताश्च देवताः । अग्निभूतपनीन्द्रादिस्तुतिः । १, ३, ५, ६ अनुष्टुभः। २ भुरिक्। ४ उपरिष्टाद बृहती। षडृर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    We Counter Negativities

    Meaning

    The vagabond, the bully, the obstinate, the incorrigible, the ogre, entire demonic progeny of wrath, violence and terror, all these we face and make them disappear from society.

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    Subject

    Agni-Bhutapah-Indra

    Translation

    The expeller (from house),the frightener, the overwhelmer, the harsh-voiced and the devourer, all these ever-bewailers, the grand daughters of wrathful one (candal), we hereby destroy.

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    Translation

    Let us exterminate all offshoots of poverty which is homeless of assailing nature, obstinate, devouring, single-voiced, accompanied with other calamities and formidableills.

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    Translation

    We exterminate aimless wandering, obstinacy, violence, poverty and gluttony habits which are the progeny of indignation and avarice, and conduce to mutual quarrel.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १–निः सालाम्। सल गतौ–घञ्। सालः प्राकारोऽस्त्यस्याः सा साला गृहम्। अर्शआदिभ्योऽच्। पा० ५।२।१२७। इति अच्। टाप्। निर्गता सालायास्ताम्। निर्गृहाम्। धृष्णुम्। स्त्री०। त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः। पा० ३।२।१४०। इति धृषि क्रोधे हिंसे, शक्तिबन्धे–क्नु। धर्षणशीलां भयस्य जनयित्रीम्। धिषणम्। धृषेर्धिष च सञ्ज्ञायाम्। उ० २।८२। इति ञिधृषा प्रागल्भ्ये–क्यु, धिषादेशश्च। यद्वा, धिष शब्दे–क्यु, धिषणा वाङ्नाम–निघ० १।११। बुद्धिः, कोषे च। बोधं वाचं वा। (जिघत्स्वम्) इत्यस्य कर्म। एकवाद्याम्। ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। इति वद वाचि ण्यत्। एकम् एकप्रकारमेव वाद्यं दीनतारूपं वचनं यस्याः सा। ताम् अलक्ष्मीम्। जिघत्स्वम्। लुङ्सनोर्घस्लृ। पा० २।४।३७। इति अद भक्षणे+सन्–घस्लादेशः। ततः। सनाशंसभिक्ष उः। पा० ३।२।१६८। इति उः, स्त्रियाम् ऊङ् वा। अत्तुमिच्छुम्। सर्वाः। निखिलाः। चण्डस्य। नपुंसकलिङ्गम्। चडि कोपे–पचाद्यच्। यद्वा। ञमन्ताड् डः। उ० १।१११४। इति चण हिंसे–डः। डस्य न इत्वम्। कोपस्य। क्रोधस्य। नप्त्यः। न पतन्ति पितरो येनेति नप्ता। नप्तृनेष्टृत्वष्टृ०। उ० २।९५। इति न+पत अधोगतौ–तृन्। ऋन्नेभ्यो ङीप् पा० ४।१।५। इति ङीप्। छन्दसि र लोपो जश्त्वं च। नप्त्रीः। अपत्यभूताः। नाशयामः। हन्मः। सदान्वाः। नौतेः शब्दकर्मणो यङ्लुगन्तात्। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति पचाद्यच्। न धातुलोप आर्धधातुके। पा० १।१।४। इति गुणप्रतिषेधे उवङ्स्थाने छान्दसो यण् आदेशः, टाप् च। सदान्वे सदानोनुवे शब्दकारिके–निरु० ६।३०। दुर्भिक्षाधिदेवतोच्यते, कालकर्णा वा अलक्ष्मीः–इति तत्र टीकायां देवराजयज्वा। सदानोनुवाः। सर्वदा नोनूयमानाः। शब्दायमानाः सर्वप्रकारा दरिद्रतादिविपत्तीः यद्वा। स+दानवाः। केशाद् वोऽन्यतरस्याम्। पा० ५।२।१०९। अत्र वार्त्तिकम्। अन्येभ्योऽपि दृश्यते। इति व प्रत्ययो मत्वर्थे। अकारलोपः। दानवैश्छेदनशीलैः सह वर्तमानाः ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (নিঃসালাম্) শালা/গৃহ থেকে বহিষ্কৃত/নির্বাসিত, (ধৃষ্ণুম্) ধর্ষক অর্থাৎ পরাভূতকারী, (ধিষণম্) ধর্ষণশীলা অর্থাৎ ভয়োৎপাদিকা, (একবাদ্যাম্) একই বাদ্য১ দ্বারা গীত গায়নকারী, (জিঘৎস্বম্) ভক্ষণকারী (চণ্ডস্য) এবং প্রচণ্ড রোগের (সর্বা নপ্ত্যঃ) এই সকল অপত্যরূপা, (সদান্বাঃ) এবং সর্বদা দুঃখদায়ক শব্দের উচ্চারণে প্রবৃত্তকারী, স্ত্রীজাতিক রোগ জীবাণুর (নাশয়ামঃ) আমরা নাশ করি।

    टिप्पणी

    [মন্ত্র ১ এ বহুবিধ রোগ-জীবাণুর বর্ণনা হয়েছে। এই জীবাণু স্ত্রী জাতির। সমগ্র সূক্তে ইহাকে স্ত্রীলিঙ্গ পদের দ্বারা সূচিত করা হয়েছে।] [১. যেমন "দত্তাবধানাং মধুলেহগীতৌ" (ভটিকাব্য) তে ভ্রমরের গুঞ্জনকে গীত বলে তার বাদ্যকেও কল্পনা করা হয়েছে, তার গীতি সদা এক প্রকারের হয়, অতঃ তার বাদ্যও একটাই বলা হয়েছে। এইভাবে মশার গুণগুণকে বাদ্য বলা যেতে পারে।]

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    मन्त्र विषय

    অলক্ষ্মীর্মনুষ্যৈঃ প্রয়ত্নেন নাশনীয়া

    भाषार्थ

    (নিঃ সালাম্) গৃহহীন/বিনা শালা বা ঘর-সম্পন্ন, (ধৃষ্ণুম্) ভয়ানক রূপী, (একবাদ্যাম্) [দীনতার] এক বচনকারী, (ধিষণম্) বোধ বা উত্তম বাণীকে (জিঘৎস্বম্) ভক্ষণকারী/গ্ৰাসকারী, (চণ্ডস্য) ক্রোধের (সর্বাঃ) এই সব (নপ্ত্যঃ= নপ্ত্রীঃ) সন্তান, (সদান্বাঃ) সদা উল্লাসকারী যদ্বা, দানব, দুষ্কর্মীদের সাথে বিদ্যমান [নির্ধনতার পীড়া] কে (নাশয়ামঃ) আমরা নাশ করি ॥১॥

    भावार्थ

    নির্ধনতার কারণে মনুষ্য ঘর থেকে বেরিয়ে যায়, কুরূপ হয়ে যায়, দীন/কুবচন বলে এবং মতিভ্রষ্ট হয়ে যায়, নির্ধনতার পীড়া ক্রোধ অর্থাৎ কাম, ক্রোধ, লোভ, মোহ আদি দুষ্টতা থেকে উৎপন্ন হয়। মনুষ্যদের উচিত দূরদর্শী হয়ে পুরুষার্থ দ্বারা ধন প্রাপ্ত করে নির্ধনতা আসতে না দেওয়া এবং সদা সুখী থাকা ॥১॥ ঋগ্বেদ ম০ ১০। সূ০ ১৫৫। ম০ ১। এ এমন বর্ণনা হয়েছে। অরা॑য়ি॒ কাণে॒ বিক॑টে গি॒রিং গ॑চ্ছ সদান্বে। শি॒রিম্বি॑ঠস্য॒ সত্ত্ব॑ভি॒স্তেভি॑ষ্ট্বা চাতয়ামসি ॥১॥ (অরায়ি) হে অদানশীল [কৃপণ] ! (কাণে) হে অন্ধ ! (বিকটে) হে খোঁড়া ! (সদান্বে=সদানোনুবে শব্দকারিকে) সদা উল্লাসকারী ! (গিরিম্) পাহাড়ে (গচ্ছ) চলে যাও ! (শিরিম্বিঠস্য) মেঘের (তেভিঃ) সেই (সত্ত্বভিঃ) জল দ্বারা (ত্বা) তোমাকে (চাতয়ামসি) আমরা নিপাত করি ॥ এই ঋগ্বেদমন্ত্রের ব্যাখ্যা নিরু০ ৬।৩০। এ আছে। নিরুক্তটীকাকার দেবরাজ যজ্বা এর ভিত্তিতে এখানে অর্থ করা হয়েছে ॥

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