Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 17 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 2
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - प्राणः, अपानः, आयुः छन्दः - एदपदासुरीत्रिष्टुप् सूक्तम् - बल प्राप्ति सूक्त
    71

    सहो॑ ऽसि॒ सहो॑ मे दाः॒ स्वाहा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सह॑: । अ॒सि॒ । सह॑: । मे॒ । दा॒: । स्वाहा॑ ॥१७.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सहो ऽसि सहो मे दाः स्वाहा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सह: । असि । सह: । मे । दा: । स्वाहा ॥१७.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 17; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आयु बढ़ाने के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    [हे परमात्मा !] तू (सहः) पराक्रमस्वरूप (असि) है, (मे) मुझे (सहः) आत्मिक पराक्रम (दाः) दे, (स्वाहा) यह सुन्दर आशीर्वाद हो ॥२॥

    भावार्थ

    अनन्त ब्रह्माण्डों का रचक और धारक परमेश्वर पराक्रमस्वरूप है। ऐसा सोचकर विद्यादि उपायों से मनुष्य अपनी आत्मिक शक्ति बढ़ावें ॥२॥

    टिप्पणी

    २–सहः। षह अभिभवे, क्षमायाम्–असुन्। मानसिकबलम्। पराक्रमः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    सहस्

    पदार्थ

    १.हे प्रभो! आप (सहःअसि) = सहस् शक्ति के पुञ्ज हो। (मे) = मेरे लिए (सहः) = सहनशक्ति (दा:) = दीजिए। (स्वाहा) = मेरे मुख से सदा इन शुभ शब्दों का ही उच्चारण हो। २. ओजस के होने पर मनुष्य सहस्वाला बनता है, इसीलिए ओज के बाद सहस् की प्रार्थना है। ओज की कमी होने पर मनुष्य में सहनशक्ति भी नहीं रहती। इस सहनशक्ति के होने पर ही वास्तविक आनन्द का अनुभव होता है।

    भावार्थ

    प्रभु सहस्' हैं। मैं भी 'सहस्'-वाला बनकर प्रभु का सच्चा भक्त बनें।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (सहः असि) शत्रु का पराभव करनेवाला तेज तू है, (सहः) पराभव करने का तेज (मे दाः) मुझे दे, (स्वाहा) सु आह।

    टिप्पणी

    [मन्त्र १ और मन्त्र २ में यतः विश्वम्भर पद का अन्वय है, अतः शत्रु हैं अस्मदादि के काम, क्रोध, लोभ आदि, जिन्हें कि परमेश्वर परास्त कर देता है, उपासित हुआ।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ओज, सहनशीलता, बल, आयु और इन्द्रियों की प्रार्थना।

    भावार्थ

    हे परमात्मन् ! आप (सहः असि) सहनशील, सब संसार की शक्तियों को सहन करने हारे हैं। आप (में) मुझे (सहः) सहनसामर्थ्य (दाः) प्रदान करें (स्वाहा) ऐसी उत्तम प्रार्थना है।

    टिप्पणी

    ‘सहोदा अग्रेः सहो मे धाः स्वाहा’ इति पैप्प० सं० ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः । प्राणापानौ वायुश्च देवताः । १-६ एकावसाना आसुर्यस्त्रिष्टुभः । ७ आसुरी उष्णिक् । सप्तर्चं सूक्तम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Elan Vital at the Full

    Meaning

    You are courage, patience and fortitude in the spirit of invincible challenge. Give me courage, patience and fortitude. This is the voice of truth in faith.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    You are endurance (sahas). May you bestow endurance on me. Svāhā.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O God! Thou art tolerance, give me toleration. What a beautiful utterance.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O God, Endurance art Thou, give me endurance! This is my humble prayer.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २–सहः। षह अभिभवे, क्षमायाम्–असुन्। मानसिकबलम्। पराक्रमः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (সহঃ অসি) শত্রুর পরাভব করার তেজ তুমি, (সহঃ) পরাজিত করার তেজ (মে দাঃ) আমাকে প্রদান করো। (স্বাহা) সু আহ।

    टिप्पणी

    [মন্ত্র ১ এবং মন্ত্র ২ এ যতঃ বিশ্বম্ভর পদের অন্বয়, অতঃ শত্রু হচ্ছে অস্মদাদির কাম, ক্রোধ, লোভ আদি যা পরমেশ্বর পরাস্ত করে দেন, উপাসিত হয়ে।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    मन्त्र विषय

    আয়ুর্বর্ধনায়োপদেশঃ

    भाषार्थ

    [হে পরমাত্মা !] তুমি (সহঃ) পরাক্রমস্বরূপ (অসি) হও, (মে) আমাকে (সহঃ) আত্মিক পরাক্রম (দাঃ) প্রদান করো, (স্বাহা) এই সুন্দর আশীর্বাদ হোক ॥২॥

    भावार्थ

    অনন্ত ব্রহ্মাণ্ডের রচয়িতা ও ধারক পরমেশ্বর পরাক্রমস্বরূপ। এমনটা মেনে বিদ্যাদি উপায় দ্বারা মনুষ্য নিজের আত্মিক শক্তি বৃদ্ধি করুক ॥২॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top