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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 32/ मन्त्र 2
    ऋषिः - काण्वः देवता - आदित्यगणः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कृमिनाशक सूक्त
    69

    वि॒श्वरू॑पं चतुर॒क्षं क्रिमिं॑ सा॒रङ्ग॒मर्जु॑नम्। शृ॒णाम्य॑स्य पृ॒ष्टीरपि॑ वृश्चामि॒ यच्छिरः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वि॒श्वऽरू॑पम् । च॒तु॒:ऽअ॒क्षम् । क्रिमि॑म् । सा॒रङ्ग॑म् । अर्जु॑नम् । शृ॒णामि॑ । अ॒स्य॒ । पृ॒ष्टी: । अपि॑ । वृ॒श्चा॒मि॒ । यत् । शिर॑: ॥३२.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विश्वरूपं चतुरक्षं क्रिमिं सारङ्गमर्जुनम्। शृणाम्यस्य पृष्टीरपि वृश्चामि यच्छिरः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विश्वऽरूपम् । चतु:ऽअक्षम् । क्रिमिम् । सारङ्गम् । अर्जुनम् । शृणामि । अस्य । पृष्टी: । अपि । वृश्चामि । यत् । शिर: ॥३२.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 32; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    कीड़ों के समान दोषों का नाश करे, इसका उपदेश।

    पदार्थ

    (विश्वरूपम्) नाना आकारवाले (चतुरक्षम्) [चार दिशाओं में] नेत्रवाले, (सारङ्गम्) रींगनेवाले [वा चितकबरे] और (अर्जुनम्) संचयशील [वा श्वेतवर्ण] (क्रिमिम्) कीड़े को (शृणामि) मैं मारता हूँ, (अस्य) इसकी (पृष्टीः) पसलियों को (अपि) भी और (यत्) जो (शिरः) शिर है [उसको भी] (वृश्चामि) तोड़े डालता हूँ ॥२॥

    भावार्थ

    पृथिवी और अन्तरिक्ष के नाना आकार और नाना वर्णवाले मकड़ी माँखी आदि क्षुद्र जन्तुओं को शुद्धि आदि द्वारा पृथक् रखने से शरीर स्वस्थ रहता है, इसी प्रकार आत्मिक दोषों की निवृत्ति से आत्मिक शान्ति होती है ॥२॥

    टिप्पणी

    टिप्पणी–(चतुरक्ष) चार आँखवाला–ऐसा प्रयोग वेद में अन्यत्र भी आया है, वहाँ भी चारों दिशाओं का ही ग्रहण है ॥ क॒श्यप॑स्य॒ चक्षु॑रसि शकु॒न्याश्च॑तुर॒क्ष्याः ॥१॥ अथर्ववेद ४।२०।७। [और ऋ० १०।१४।१०, ११ भी देखिये।] तू (कश्यपस्य) सूर्य की और (चतुरक्ष्याः) चार आँखवाली (शकुन्याः) व्याप्तिवाली दिशा की (चक्षुः) आँख है ॥ २–विश्वरूपम्। नानाकारम्। चतुरक्षम्। बहुव्रीहौ। सक्थ्यक्ष्णिः स्वाङ्गात् षच्। पा० ५।४।११३। इति षच्। चतुर्नेत्रम्। चतुर्दिक्षु नेत्रयुक्तम्। सारङ्गम्। सृवृञोर्वृद्धिश्च। उ० १।१२२। इति सृ गतौ–अङ्गच्, धातोर्वृद्धिश्च। सरणशीलम्। शबलवर्णम्। अर्जुनम्। अर्जेर्णिलुक् च। उ० ३।५८। इति अर्ज सम्पादने–उनन्। संचयशीलम्। श्वेतवर्णम्। शृणामि। शॄ हिंसायाम्। हन्मि। पृष्टीः। अ० २।७।५। पार्श्वस्थीनि। वृश्चामि। छिनद्मि। शिरः। अ० २।२५।२। मस्तकम् ॥

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    विषय

    विश्वरूप चतुरक्ष कृमि

    पदार्थ

    १. (विश्वरूपम्) = नाना आकारोंवाले, (चतुरक्षम्) = चार नेत्रोंवाले, (सारङ्गम्) = शबल [sable]

    वर्णवाले अथवा (अर्जुनम्) = शुभ्र वर्णवाले इसप्रकार अनेक आकारोंवाले (क्रिमिम्) = कृमियों को नष्ट करता हूँ। २, (अस्य) = इन कृमियों की (पुष्टिः अपि) = पावियवों को भी (शणामि) = हिंसित करता हूँ और (अस्य) = इनका (यत् शिर:) = जो सिर व प्रधान अङ्ग है, उसे भी (वृश्चामि) = छिन करता हूँ। इसप्रकार इसे नष्ट करके इसे रोगोत्पादन के सामर्थ्य से शून्य करता हूँ।

     

    भावार्थ

    हम सूर्यकिरणों से विश्वरूप, चतुरक्ष कृमियों का विनाश करते हैं।

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    भाषार्थ

    (विश्वरूपम्) नानारूपों या आकृतियोंवाले, (चतुरक्षम्) चार आँखोंवाले, (सारङ्गम् ) विविध रंगोंवाले, (अर्जुन म्) शुभ्रवर्णवाले, (क्रिमिम्) क्रिमि की (शृणामि) मैं हिंसा करता हूँ, (अस्य) इसकी (पृष्टीः) पसलियों को, (अपि यत् शिरः) और जो सिर है, उसे भी ( वृश्चामि ) मैं काटता हूँ।

    टिप्पणी

    [इस प्रकार के त्रिमि कौन से हैं, यह अनुसंधेय है।]

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    विषय

    रोगकारी क्रिमियों के नाश करने का उपदेश ।

    भावार्थ

    मैं (विश्वरूपं) नाना आकार के, (चतुरक्षं) चार २ आंखों वाले, या मकड़ी के समान चारों तरफ देखने वाले, (सारङ्गं) श्याम शरीर वाले, या सरक कर चलने वाले, (अर्जुनम्) श्वेत वर्ण के, या कुटिल गति से जाने वाले, कीट जाति को भी (शृणामि) विनाश करूं। और (अस्य) इसके (पृष्टीः) पसलियों या पीठ के प्रत्येक मोहरों को भी विनाश करूं और (यत्) जो (शिरः) उसका मुख्य शिर या अगला सिरा है उसको भी (वृश्चामि) काट डालूं । इन रोगकीटों के प्रत्येक अंग अंग का विनाश करना चाहिये क्योंकि उनका प्रत्येक अंग अलग अलग कर देने पर भी वे जीते रहते हैं ।

    टिप्पणी

    (प्र० द्वि०) यो द्विशीर्षा चक्षुरक्षुः क्रिमिश्शरगोऽर्जुनः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कण्व ऋषिः। आदित्यो देवता। १ त्रिपदा भुरिग् गायत्री। २-५ अनुष्टुभः। चतुष्पदा निचृदुष्णिक्। षडृचं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Elimination of Insects

    Meaning

    I destroy the germs and insects of varied colour, of four eyes, creeping ones and white, all. I break their back, I break their head, and I uproot them totally.

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    Translation

    Of the worm, having all forms, having four eyes, and the speckled one and the whitish one, I break the ribs and I chop its head off.

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    Translation

    I break the ribs and crush the head of those germs which have many shapes, which see in four direction which creep on the ground and which are white.

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    Translation

    I break and crush the ribs and tear away the head of the worm, variegated in shape, four-eyed, prone to creep, and white in color. [1]

    Footnote

    [1] I refers to a physician.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    टिप्पणी–(चतुरक्ष) चार आँखवाला–ऐसा प्रयोग वेद में अन्यत्र भी आया है, वहाँ भी चारों दिशाओं का ही ग्रहण है ॥ क॒श्यप॑स्य॒ चक्षु॑रसि शकु॒न्याश्च॑तुर॒क्ष्याः ॥१॥ अथर्ववेद ४।२०।७। [और ऋ० १०।१४।१०, ११ भी देखिये।] तू (कश्यपस्य) सूर्य की और (चतुरक्ष्याः) चार आँखवाली (शकुन्याः) व्याप्तिवाली दिशा की (चक्षुः) आँख है ॥ २–विश्वरूपम्। नानाकारम्। चतुरक्षम्। बहुव्रीहौ। सक्थ्यक्ष्णिः स्वाङ्गात् षच्। पा० ५।४।११३। इति षच्। चतुर्नेत्रम्। चतुर्दिक्षु नेत्रयुक्तम्। सारङ्गम्। सृवृञोर्वृद्धिश्च। उ० १।१२२। इति सृ गतौ–अङ्गच्, धातोर्वृद्धिश्च। सरणशीलम्। शबलवर्णम्। अर्जुनम्। अर्जेर्णिलुक् च। उ० ३।५८। इति अर्ज सम्पादने–उनन्। संचयशीलम्। श्वेतवर्णम्। शृणामि। शॄ हिंसायाम्। हन्मि। पृष्टीः। अ० २।७।५। पार्श्वस्थीनि। वृश्चामि। छिनद्मि। शिरः। अ० २।२५।२। मस्तकम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (বিশ্বরূপম্) নানারূপ বা আকৃতিবিশিষ্ট, (চতুরক্ষম্) চারটি চোখবিশিষ্ট, (সারঙ্গম্) বিবিধ রঙবিশিষ্ট, (অর্জুনম্) শুভ্রবর্ণযুক্ত, (ক্রিমিম) কৃমির (শৃণামি) আমি হত্যা করি, (অস্য) এর (পুষ্টিঃ) মাংসপেশীকে, (অপি যৎ শিরঃ) এবং যে মাথা রয়েছে, তাও (বৃশ্চামি) আমি ছেদন করি।

    टिप्पणी

    [এই প্রকারের কৃমি কোনগুলো, তা অনুসন্ধেয়।]

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    मन्त्र विषय

    ক্রিমিতুল্যান্ দোষান্ নাশয়েৎ, ইত্যুপদেশঃ

    भाषार्थ

    (বিশ্বরূপম্) নানা আকৃতিবিশিষ্ট (চতুরক্ষম্) [চতুর্দিকে] নেত্রবিশিষ্ট, (সারঙ্গম্) সর্পণকারী [বা চিত্রবিচিত্র/বিভিন্ন বর্ণযুক্ত] ও (অর্জুনম্) সঞ্চয়শীল [বা শ্বেতবর্ণ] (ক্রিমিম্) কৃমিকে (শৃণামি) আমি হনন করি, (অস্য) এর[কৃমির] (পৃষ্টীঃ) পেশীগুলোকে (অপি) এবং (যৎ) যে (শিরঃ) মস্তক রয়েছে [তাও] (বৃশ্চামি) ছিন্ন করি॥২॥

    भावार्थ

    পৃথিবী ও অন্তরিক্ষের নানা আকার এবং নানা বর্ণবিশিষ্ট মাকড়সা, মাছি আদি ক্ষুদ্র জীবদের শুদ্ধি আদি দ্বারা পৃথক্ রাখলে শরীর সুস্থ থাকে, এইভাবে প্রকার আত্মিক দোষের নিবৃত্তি দ্বারা আত্মিক শান্তি হয় ॥২॥ (চতুরক্ষ) চার চক্ষুবিশিষ্ট–এমন প্রয়োগ বেদে অন্যত্রও আছে, সেখানেও চতুর্দিশার গ্রহণ হয়েছে ॥ ক॒শ্যপ॑স্য॒ চক্ষু॑রসি শকু॒ন্যাশ্চ॑তুর॒ক্ষ্যাঃ ॥১॥ অথর্ববেদ ৪।২০।৭। [এবং ঋ০ ১০।১৪।১০, ১১ দেখুন।] তুমি (কশ্যপস্য) সূর্যের এবং (চতুরক্ষ্যাঃ) চতুর্চক্ষুবিশিষ্ট (শকুন্যাঃ) ব্যাপ্ত দিশার (চক্ষুঃ) চক্ষু ॥

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