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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 107 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 107/ मन्त्र 15
    ऋषिः - कुत्सः देवता - सूर्यः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-१०७
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    सूर्यो॑ दे॒वीमु॒षसं॒ रोच॑मानां॒ मर्यो॒ न योषा॑म॒भ्येति प॒श्चात्। यत्रा॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ यु॒गानि॑ वितन्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सूर्य॑: । दे॒वीम् । उ॒षस॑म् । रोच॑मानाम् । मर्य॑: । न । योषा॑म् । अ॒भि । ए॒ति॒ । प॒श्चात् ॥ यत्र॑ । नर॑: । दे॒व॒ऽयन्त॑: । यु॒गानि॑ । वि॒ऽत॒न्व॒ते । प्रति॑ । भ॒द्राय॑ । भ॒द्रम् ॥१०७.१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात्। यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सूर्य: । देवीम् । उषसम् । रोचमानाम् । मर्य: । न । योषाम् । अभि । एति । पश्चात् ॥ यत्र । नर: । देवऽयन्त: । युगानि । विऽतन्वते । प्रति । भद्राय । भद्रम् ॥१०७.१५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 107; मन्त्र » 15
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    मन्त्र १३-१ परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    (सूर्यः) सूर्यमण्डल (देवीम्) देवी [दिव्यगुणवाली] (रोचमानाम्) रुचि करानेवाली (उषसम्) उषा [प्रभात वेला] के (पश्चात्) पीछे-पीछे (अभि) सब ओर से (एति) प्राप्त होता है, (न) जैसे (मर्यः) मनुष्य (योषाम्) अपनी स्त्री को [प्रीति से प्राप्त होता है], (यत्र) जहाँ [संसार के बीच] (देवयन्तः) व्यवहार चाहनेवाले (नरः) नर [नेता लोग] (भद्रम् प्रति) आनन्दस्वरूप परमात्मा के सामने (भद्राय) आनन्द के लिये (युगानि) युगों [वर्षों] को (वितन्वते) फैलाते हैं ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे ईश्वरकृत नियमों के अनुसार सूर्य और उषा के सम्बन्ध से प्रकाश, और पुरुष और स्त्री के सम्बन्ध से सन्तान होता है, वैसे ही बुद्धिमान् लोग सुखस्वरूप परमात्मा की आज्ञा में रहकर नियमपूर्वक सुख भोगते हुए अपना जीवनकाल बढ़ावें ॥१॥

    टिप्पणी

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।११।२ ॥ १−(सूर्यः) सविता (देवीम्) दिव्यगुणयुक्ताम् (उषसम्) प्रभातवेलाम्। सन्धिकालम् (रोचमानाम्) रुचिकारिकाम् (मर्यः) पतिर्मनुष्यः (न) इव (योषाम्) स्वभार्याम् (अभि) सर्वतः (एति) प्राप्नोति (पश्चात्) (यत्र) यस्मिन् संसारे (नरः) नेतारः (देवयन्तः) व्यवहारान् कामयमानाः (युगानि) वर्षाणि (वितन्वते) विस्तारयन्ति (प्रति) अभिमुखीकृत्य (भद्राय) कल्याणाय (भद्रम्) सुखस्वरूपं परमात्मानम् ॥

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    विषय

    सूर्य व उषा का सच्चा पूजन

    पदार्थ

    १. (सूर्य:) = सूर्य (रोचमानाम्) = चमकती हुई (देवीम्) = प्रकाशमयी (उषसम्) = उषा के (पश्चात) = पीछे (अभ्येति) = उसी प्रकार आता है (न) = जैसेकि (मर्य:) = मनुष्य (योषाम्) = पत्नी के पीछे आता है। उषा मानो पत्नी है, सूर्य उसका पति हैं। ये पति-पत्नी जब आते हैं तब हमें इनके स्वागत के लिए तैयार रहना चाहिए। इस समय लेटे रहना-या व्यर्थ की प्रवृत्तियों में लगना तो इनका निरादर ही है। २. यह समय वह होता है (यत्रा) = जिसमें कि (देवयन्तः नरः) = अपने को देव बनाने की कामनावाले पुरुष (युगानि) = इन्द्ररूप में होकर, अर्थात् पति-पत्नी मिलकर (भद्राय) = कल्याण व सुख-प्राप्ति के लिए (भद्रम्) = कल्याण व सुख के साधक यज्ञ को (प्रतिवितन्वते) = प्रतिदिन विस्तृत करते हैं। इन यज्ञों से [क] उनकी वृत्ति दिव्य बनती है [ख] उनका कल्याण होता है [ग] के उषा व सूर्य का सच्चा पूजन कर पाते हैं। सूर्य के सामने हाथ जोड़ना सूर्य का पूजन नहीं है-सूर्योदय के समय यज्ञादि करना ही सूर्यपूजन है।

    भावार्थ

    उषा के पीछे आते हुए सूर्य का हमें स्वागत करना चाहिए-उस समय यज्ञादि कर्मों में हमें प्रवृत्त होना चाहिए। यह यज्ञशील पुरुष सबके हित में प्रवृत्त हुआ-हुआ सबके साथ मिलकर चलता है, अत: इसका नाम 'नृमेध' हो जाता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    Agni Devata

    Meaning

    The sun follows the brilliant and beautiful dawn just like a youthful lover who pursues his beloved. And therein, with reference to that, the leading astronomers of the stars extend their noble vision for the calculation of ages for the good of humanity.

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    Translation

    As a man follows a maiden so this sun follows the refulgent dawn. In this, the pious men extend their ages towards benevolent God for gain of good fortune.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।११।२ ॥ १−(सूर्यः) सविता (देवीम्) दिव्यगुणयुक्ताम् (उषसम्) प्रभातवेलाम्। सन्धिकालम् (रोचमानाम्) रुचिकारिकाम् (मर्यः) पतिर्मनुष्यः (न) इव (योषाम्) स्वभार्याम् (अभि) सर्वतः (एति) प्राप्नोति (पश्चात्) (यत्र) यस्मिन् संसारे (नरः) नेतारः (देवयन्तः) व्यवहारान् कामयमानाः (युगानि) वर्षाणि (वितन्वते) विस्तारयन्ति (प्रति) अभिमुखीकृत्य (भद्राय) कल्याणाय (भद्रम्) सुखस्वरूपं परमात्मानम् ॥

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