अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 107/ मन्त्र 15
सूर्यो॑ दे॒वीमु॒षसं॒ रोच॑मानां॒ मर्यो॒ न योषा॑म॒भ्येति प॒श्चात्। यत्रा॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ यु॒गानि॑ वितन्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम् ॥
स्वर सहित पद पाठसूर्य॑: । दे॒वीम् । उ॒षस॑म् । रोच॑मानाम् । मर्य॑: । न । योषा॑म् । अ॒भि । ए॒ति॒ । प॒श्चात् ॥ यत्र॑ । नर॑: । दे॒व॒ऽयन्त॑: । यु॒गानि॑ । वि॒ऽत॒न्व॒ते । प्रति॑ । भ॒द्राय॑ । भ॒द्रम् ॥१०७.१५॥
स्वर रहित मन्त्र
सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात्। यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम् ॥
स्वर रहित पद पाठसूर्य: । देवीम् । उषसम् । रोचमानाम् । मर्य: । न । योषाम् । अभि । एति । पश्चात् ॥ यत्र । नर: । देवऽयन्त: । युगानि । विऽतन्वते । प्रति । भद्राय । भद्रम् ॥१०७.१५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मन्त्र १३-१ परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थ
(सूर्यः) सूर्यमण्डल (देवीम्) देवी [दिव्यगुणवाली] (रोचमानाम्) रुचि करानेवाली (उषसम्) उषा [प्रभात वेला] के (पश्चात्) पीछे-पीछे (अभि) सब ओर से (एति) प्राप्त होता है, (न) जैसे (मर्यः) मनुष्य (योषाम्) अपनी स्त्री को [प्रीति से प्राप्त होता है], (यत्र) जहाँ [संसार के बीच] (देवयन्तः) व्यवहार चाहनेवाले (नरः) नर [नेता लोग] (भद्रम् प्रति) आनन्दस्वरूप परमात्मा के सामने (भद्राय) आनन्द के लिये (युगानि) युगों [वर्षों] को (वितन्वते) फैलाते हैं ॥१॥
भावार्थ
जैसे ईश्वरकृत नियमों के अनुसार सूर्य और उषा के सम्बन्ध से प्रकाश, और पुरुष और स्त्री के सम्बन्ध से सन्तान होता है, वैसे ही बुद्धिमान् लोग सुखस्वरूप परमात्मा की आज्ञा में रहकर नियमपूर्वक सुख भोगते हुए अपना जीवनकाल बढ़ावें ॥१॥
टिप्पणी
यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।११।२ ॥ १−(सूर्यः) सविता (देवीम्) दिव्यगुणयुक्ताम् (उषसम्) प्रभातवेलाम्। सन्धिकालम् (रोचमानाम्) रुचिकारिकाम् (मर्यः) पतिर्मनुष्यः (न) इव (योषाम्) स्वभार्याम् (अभि) सर्वतः (एति) प्राप्नोति (पश्चात्) (यत्र) यस्मिन् संसारे (नरः) नेतारः (देवयन्तः) व्यवहारान् कामयमानाः (युगानि) वर्षाणि (वितन्वते) विस्तारयन्ति (प्रति) अभिमुखीकृत्य (भद्राय) कल्याणाय (भद्रम्) सुखस्वरूपं परमात्मानम् ॥
विषय
सूर्य व उषा का सच्चा पूजन
पदार्थ
१. (सूर्य:) = सूर्य (रोचमानाम्) = चमकती हुई (देवीम्) = प्रकाशमयी (उषसम्) = उषा के (पश्चात) = पीछे (अभ्येति) = उसी प्रकार आता है (न) = जैसेकि (मर्य:) = मनुष्य (योषाम्) = पत्नी के पीछे आता है। उषा मानो पत्नी है, सूर्य उसका पति हैं। ये पति-पत्नी जब आते हैं तब हमें इनके स्वागत के लिए तैयार रहना चाहिए। इस समय लेटे रहना-या व्यर्थ की प्रवृत्तियों में लगना तो इनका निरादर ही है। २. यह समय वह होता है (यत्रा) = जिसमें कि (देवयन्तः नरः) = अपने को देव बनाने की कामनावाले पुरुष (युगानि) = इन्द्ररूप में होकर, अर्थात् पति-पत्नी मिलकर (भद्राय) = कल्याण व सुख-प्राप्ति के लिए (भद्रम्) = कल्याण व सुख के साधक यज्ञ को (प्रतिवितन्वते) = प्रतिदिन विस्तृत करते हैं। इन यज्ञों से [क] उनकी वृत्ति दिव्य बनती है [ख] उनका कल्याण होता है [ग] के उषा व सूर्य का सच्चा पूजन कर पाते हैं। सूर्य के सामने हाथ जोड़ना सूर्य का पूजन नहीं है-सूर्योदय के समय यज्ञादि करना ही सूर्यपूजन है।
भावार्थ
उषा के पीछे आते हुए सूर्य का हमें स्वागत करना चाहिए-उस समय यज्ञादि कर्मों में हमें प्रवृत्त होना चाहिए। यह यज्ञशील पुरुष सबके हित में प्रवृत्त हुआ-हुआ सबके साथ मिलकर चलता है, अत: इसका नाम 'नृमेध' हो जाता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।
भाषार्थ
(न) जैसे (मर्यः) पुरुष (योषाम्) अपनी पत्नी के (पश्चात्) पीछे-पीछे (अभ्येति) आता है, चलता है, वैसे ही (सूर्यः) सूर्यों का सूर्य परमेश्वर (रोचमानाम् देवीम् उषसम्) रुचिकर दिव्य-उषा के पीछे-पीछे आता है। (देवयन्तः) परमेश्वर-देव की कामनावाले (नरः) उपासक-नेता (यत्र) जिस ऐसी अवस्था में (युगानि) मानो नवीन युगों का (प्रति वितन्वते) विस्तार करते हैं, और (भद्राय) भद्र के प्रति (भद्रम्) सदा भद्र व्यवहार करते हैं।
टिप्पणी
[योगमार्ग पर आरूढ़ हुए योगी को, परमेश्वर के साक्षात्कार से पूर्व, नाना प्रकार की दिव्य ज्योतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। ये ज्योतियाँ आध्यात्मिक जीवन के रुचिकर उषःकाल की ज्योतियाँ हैं। यथा—कोहरा, धूम्र, सूर्य, वायु, अग्नि, खद्योत विद्युत्, स्फटिक, चन्द्रमा, तथा दिव्य रत्नादि—ये ज्योतियाँ प्रकट होती हैं, जो कि परमेश्वर के साक्षात्कार के पूर्वरूप हैं। इन दिव्य रुचिकर ज्योतियों के पश्चात् परमेश्वर का साक्षात्कार होता है। (श्वेताश्व০ द्र০—उप০ २.११); तथा (योगदर्शन १.३६) सूत्र पर व्यासभाष्य।]
विषय
परमेश्वर।
भावार्थ
(सूर्यः) सूर्य (देवीम्) प्रकाशमान (रोचमानाम्) स्वयं कान्तिमयी (उषसम्) उषा के (पश्चात्) पीछे पीछे (अभ्येति) चलता है। (यत्र) जहां (नरः) मनुष्य लोग (देवयन्तः) प्रकाशमान् दिव्य पदार्थों का अनुकरण करते हुए या उत्तम गुणों को धारण करते हुए (भद्राय) कल्याणकारी उत्तम पुरुष को (भद्रम् प्रति) कल्याणकारी सुखप्रद साथी का प्रदान करते हुए (युगानि) युगल जोड़ें (वितन्वते) बनाते हैं ! इधर और (न) उसी प्रकार (मर्यः) मनुष्य भी (देवीम्) उत्तम गुणों से युक्त (रोचमानाम्) चित्त को हरने वाली (योषाम्) स्त्री के (पश्चात्) पीछे (अभि एति) चलता है और परिक्रमा करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१-३ वत्सः, ४-१२ बृहद्दिवोऽथर्वा, १३-१४ ब्रह्मा, १५ कुत्सः। देवता—१-१२ इन्द्र, १३-१५ सूर्यः। छन्दः—१-३ गायत्री, ४-१२,१४,१५ त्रिष्टुप, १३ आर्षीपङ्क्ति॥
इंग्लिश (4)
Subject
Agni Devata
Meaning
The sun follows the brilliant and beautiful dawn just like a youthful lover who pursues his beloved. And therein, with reference to that, the leading astronomers of the stars extend their noble vision for the calculation of ages for the good of humanity.
Translation
As a man follows a maiden so this sun follows the refulgent dawn. In this, the pious men extend their ages towards benevolent God for gain of good fortune.
Translation
As a man follows a maiden so this sun follows the refulgent dawn. In this, the pious men extend their ages towards benevolent God for gain of good fortune.
Translation
O Adorable Lord, Master of manifold Intelligence, Supervisor of all, letest, Thee fully invest us with valour and energy, wealth, vigor and daring’ capable of subduing the enemy.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।११।२ ॥ १−(सूर्यः) सविता (देवीम्) दिव्यगुणयुक्ताम् (उषसम्) प्रभातवेलाम्। सन्धिकालम् (रोचमानाम्) रुचिकारिकाम् (मर्यः) पतिर्मनुष्यः (न) इव (योषाम्) स्वभार्याम् (अभि) सर्वतः (एति) प्राप्नोति (पश्चात्) (यत्र) यस्मिन् संसारे (नरः) नेतारः (देवयन्तः) व्यवहारान् कामयमानाः (युगानि) वर्षाणि (वितन्वते) विस्तारयन्ति (प्रति) अभिमुखीकृत्य (भद्राय) कल्याणाय (भद्रम्) सुखस्वरूपं परमात्मानम् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
মন্ত্র ১৩-১ অধ্যাত্মোপদেশঃ
भाषार्थ
(সূর্যঃ) সূর্যমণ্ডল (দেবীম্) দেবী [দিব্যগুণযুক্ত] (রোচমানাম্) রুচিকারিকা (উষসম্) ঊষার [প্রভাত বেলার] (পশ্চাৎ) পেছনে-পেছনে (অভি) সর্ব দিকে (এতি) প্রাপ্ত হয়, (ন) যেভাবে (মর্যঃ) মানুষ (যোষাম্) নিজের স্ত্রীকে [প্রীতিপূর্বক প্রাপ্ত হয়], (যত্র) যেখানে [সংসারে] (দেবয়ন্তঃ) ব্যবহার ইচ্ছুক (নরঃ) নর [নেতাগণ] (ভদ্রম্ প্রতি) আনন্দস্বরূপ পরমাত্মার সামনে (ভদ্রায়) আনন্দের জন্য (যুগানি) যুগকে [বৎসরকে] (বিতন্বতে) বিস্তার করে ॥১৫॥
भावार्थ
যেমন ঈশ্বরকৃত নিয়ম অনুসারে সূর্য এবং উষার সম্পর্ক দ্বারা প্রকাশ হয়, এবং পুরুষ ও স্ত্রীর সম্পর্ক দ্বারা সন্তান উৎপন্ন হয়, তেমনই বুদ্ধিমানগণ সুখস্বরূপ পরমাত্মার আজ্ঞায় নিয়মপূর্বক সুখ ভোগ করে নিজের জীবনকাল বৃদ্ধি করুক ॥১৫॥ এই মন্ত্র ঋগ্বেদে আছে-১।১১।২।
भाषार्थ
(ন) যেমন (মর্যঃ) পুরুষ (যোষাম্) নিজের পত্নীর (পশ্চাৎ) পেছন-পেছন (অভ্যেতি) আসে, চলে, তেমনই (সূর্যঃ) সূর্য-সমূহের সূর্য পরমেশ্বর (রোচমানাম্ দেবীম্ উষসম্) রুচিকর দিব্য-ঊষার পেছন-পেছন আসেন। (দেবয়ন্তঃ) পরমেশ্বর-দেব-এর কামনাকারী (নরঃ) উপাসক-নেতা (যত্র) যে এই অবস্থায় (যুগানি) মানো নবীন যুগের (প্রতি বিতন্বতে) বিস্তার করে, এবং (ভদ্রায়) ভদ্র-এর প্রতি (ভদ্রম্) সদা ভদ্র ব্যবহার করে।
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