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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 117 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 117/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्रः छन्दः - विराड्गायत्री सूक्तम् - सूक्त-११७
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    पिबा॒ सोम॑मिन्द्र॒ मन्द॑तु त्वा॒ यं ते॑ सु॒षाव॑ हर्य॒श्वाद्रिः॑। सो॒तुर्बा॒हुभ्यां॒ सुय॑तो॒ नार्वा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पिब॑ । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ । मन्द॑तु । त्वा॒ । यम् । ते॒ । सु॒साव॑ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । अद्रि॑: ॥ सो॒तु: । बा॒हुऽभ्या॑म् । सुऽय॑त: । न । अर्वा॑ ॥११७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पिब । सोमम् । इन्द्र । मन्दतु । त्वा । यम् । ते । सुसाव । हरिऽअश्व । अद्रि: ॥ सोतु: । बाहुऽभ्याम् । सुऽयत: । न । अर्वा ॥११७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 117; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    राजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (हर्यश्व) हे फुरतीले घोड़ोंवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (सोमम्) सोम [तत्त्व रस] का (पिब) पान कर, (त्वा) तुझको (मन्दतु) वह [तत्त्व रस] आनन्द देवे। (यम्) जिसको (ते) तेरे लिये (सुयतः) अच्छे सिखाये हुए (अर्वा न) घोड़े के समान, (अद्रिः) मेघ [के तुल्य उपकारी पुरुष] ने (सोतुः) सार निकालनेवाले की (बाहुभ्याम्) दोनों भुजाओं से (सुषाव) सिद्ध किया है ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे अच्छा सधा हुआ घोड़ा अपने स्वामी को ठिकाने पर पहुँचाता है, वैसे ही विद्वानों के सिद्ध किये हुए तत्त्व रस को ग्रहण करके राजा पराक्रमी होवे ॥१॥

    टिप्पणी

    यह सूक्त ऋग्वेद में है-७।२२।१-३; सामवेद-उ० ३।१। तृच १३, म० १ साम० पू० ।१।८ ॥ १−(पिब) (सोमम्) तत्त्वरसम् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (मन्दतु) आनन्दयतु (त्वा) (यम्) सोमम् (ते) तुभ्यम् (सुषाव) निष्पादितवान् (हर्यश्व) हरयो हरणशीलाः प्रापणशीला अश्वा यस्य तत्सम्बुद्धौ (अद्रिः) मेघ इवोपकारी पुरुषः (सोतुः) अभिषवकर्तुः (बाहुभ्याम्) भुजाभ्याम् (सुयतः) सुशिक्षितः (न) इव (अर्वा) अश्वः ॥

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    विषय

    अहिंसक सोम [न अर्वा]

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! तू (सोमं पिब) = अपने अन्दर इस सोम का पान कर-इसे तू शरीर में ही व्याप्त कर। यह (त्वा मन्दतु) = तुझे आनन्दित करनेवाला हो। हे हर्यश्व कमनीय इन्द्रियाश्वोंवाले इन्द्र ! उस सोम का तू पान कर (यम्) = जिसको (ते) = तेरे लिए (अद्रिः) = उस आदरणीय प्रभु ने (सुषाव) = उत्पन्न किया है। प्रभु से उत्पन्न किये गये इस सोम का समुचित रक्षण करना ही चाहिए। २. वह सोम (सोतु:) = स्तोता की-उत्पन्न करनेवाले की (बाहुभ्याम्) = बाहुओं से (सुयत:) = सम्यक् यत होता है, अर्थात् यदि सोम का सम्पादन करनेवाला यह व्यक्ति क्रियाशील बना रहता है तो वह वासनाओं से आक्रान्त न होकर इस सोम को शरीर में ही सुरक्षित कर पाता है। रक्षित हुआ-हुआ यह सोम (न अर्वा) = हिंसित करनेवाला नहीं होता [अर्व to kill] रोगकृमियों का संहार करता हुआ यह सोम हमारा रक्षण ही करता है।

    भावार्थ

    शरीर में सुरक्षित सोम आनन्द की वृद्धि का कारण बनता है। यह हमें रोगों से हिंसित नहीं होने देता। सतत क्रियाशील बने रहना ही सोम-रक्षण का साधन है।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Indra, lord ruler and controller of the dynamic forces of the world, drink this soma of ecstasy which, I am sure, would exhilarate you. The cloud, generative power of nature, has distilled it and showered on you. And just as a horse well controlled by the hands and reins of the driver moves to the right destination, so is this soma generated by the hands of the creator meant to exhort you to take the dominion to its destination.

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    Translation

    O lord of horse, O mighty ruler, you drink the herbacious juice and let it make you cheerful. This is that juice which has been pressed for you by the man who is as strong as rock and is like a trained horse and this has been produced with the hands of the man preparing it.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह सूक्त ऋग्वेद में है-७।२२।१-३; सामवेद-उ० ३।१। तृच १३, म० १ साम० पू० ।१।८ ॥ १−(पिब) (सोमम्) तत्त्वरसम् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (मन्दतु) आनन्दयतु (त्वा) (यम्) सोमम् (ते) तुभ्यम् (सुषाव) निष्पादितवान् (हर्यश्व) हरयो हरणशीलाः प्रापणशीला अश्वा यस्य तत्सम्बुद्धौ (अद्रिः) मेघ इवोपकारी पुरुषः (सोतुः) अभिषवकर्तुः (बाहुभ्याम्) भुजाभ्याम् (सुयतः) सुशिक्षितः (न) इव (अर्वा) अश्वः ॥

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