अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 14 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 14/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - सौभरिः देवता - इन्द्रः छन्दः - प्रगाथः सूक्तम् - सूक्त-१४
    पदार्थ -

    (अपूर्व्य) हे अनुपम ! [राजन्] (कत् चित्) कुछ भी (स्थूरम्) स्थिर (न) नहीं (भरन्तः) रक्खे हुए, (अवस्यवः) रक्षा चाहनेवाले (वयम्) हम (वाजे) संग्राम के बीच (चित्रम्) विचित्र स्वभाववाले (त्वाम्) तुझको (उ) ही (हवामहे) बुलाते हैं ॥१॥

    भावार्थ -

    जब दुष्ट चोर डाकू लोग अत्यन्त सतावें, प्रजागण वीर राजा की शरण लेकर रक्षा करें ॥१॥

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