Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 20 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 20/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विश्वामित्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-२०
    60

    शु॒ष्मिन्त॑मं न ऊ॒तये॑ द्यु॒म्निनं॑ पाहि॒ जागृ॑विम्। इन्द्र॒ सोमं॑ शतक्रतो ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शु॒ष्मिन्ऽत॑मम् । न॒: । ऊ॒तये॑ । द्यु॒म्निन॑म् । पा॒हि॒ । जागृ॑विम् ॥ इन्द्र॑ । सोम॑म् । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो ॥२०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शुष्मिन्तमं न ऊतये द्युम्निनं पाहि जागृविम्। इन्द्र सोमं शतक्रतो ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शुष्मिन्ऽतमम् । न: । ऊतये । द्युम्निनम् । पाहि । जागृविम् ॥ इन्द्र । सोमम् । शतक्रतो इति शतऽक्रतो ॥२०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 20; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (शतक्रतो) हे सैकड़ों कर्मों वा बुद्धियोंवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिये (शुष्मिन्तमम्) अत्यन्त बलवान्, (द्युम्निनम्) अत्यन्त धनी वा यशस्वी और (जागृविम्) जागनेवाले [चौकस] पुरुष की और (सोमम्) ऐश्वर्य की (पाहि) रक्षा कर ॥१॥

    भावार्थ - राजा धर्मात्मा शूर वीरों की और सबके ऐश्वर्य की यथावत् रक्षा करके प्रजा का पालन करे ॥१॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    Indra, lord ruler of the world, protector of life and humanity, leader of a hundred noble actions and master of knowledge, for our protection and progress, protect, defend, govern and promote the strongest and most prosperous, most brilliant and honourable, and the most wakeful and vigilant powers and people, and thus defend and safeguard the honour, happiness and excellence of the nation.


    Bhashya Acknowledgment
    Top