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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 51 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 51/ मन्त्र 1
    ऋषिः - प्रस्कण्वः देवता - इन्द्रः छन्दः - प्रगाथः सूक्तम् - सूक्त-५१
    74

    अ॒भि प्र वः॑ सु॒राध॑स॒मिन्द्र॑मर्च॒ यथा॑ वि॒दे। यो ज॑रि॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ पुरू॒वसुः॑ स॒हस्रे॑णेव शिक्षति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भि । प्र । व॒: । सु॒ऽराध॑सम् । इन्द्र॑म् । अ॒र्च॒ । यथा॑ । वि॒दे ॥ य: । ज॒रि॒तृभ्य॑: । म॒घऽवा॑ । पु॒रु॒ऽवसु॑: । स॒हस्रे॑णऽइव । शिक्ष॑ति ॥५१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे। यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभि । प्र । व: । सुऽराधसम् । इन्द्रम् । अर्च । यथा । विदे ॥ य: । जरितृभ्य: । मघऽवा । पुरुऽवसु: । सहस्रेणऽइव । शिक्षति ॥५१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 51; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    परमेश्वर की उपासना का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे विद्वान् !] (सुराधसम्) सुन्दर धनों के देनेवाले (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमेश्वर] को (अभि) सब ओर से (प्र) अच्छे प्रकार (वः) स्वीकार कर और (यथा) जैसा (विदे) वह है [वैसा उसे] (अर्च) पूज। (यः) जो (मघवा) पूजनीय, (पुरूवसुः) बड़ा धनी [परमेश्वर] (जरितृभ्यः) स्तुति करनेवालों को (सहस्रेण इव) सहस्र प्रकार से (शिक्षति) देता है ॥१॥

    भावार्थ

    जिस परमात्मा ने हमें अनेक सुख दिये हैं, उसके गुणों को मनुष्य यथावत् जानकर उसकी सदा उपासना करें ॥१॥

    टिप्पणी

    मन्त्र १, २ ऋग्वेद में है-८।४९।१, २ [सायणभाष्य, परिशिष्ट, बालखिल्य १।१, २]। सामवेद-उ० २।१।१३ तथा मन्त्र १ पू० ३।।३ ॥ १−(अभि) सर्वतः (प्र) प्रकर्षेण (वः) वृञ् वरणे स्वीकरणे-लोडर्थे लुङ्। मन्त्रे घस०। पा० २।४।८०। च्लेर्लुक्। बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि। पा० ६।४।७। अडभावः। वृणु। स्वीकुरु (सुराधसम्) सु शोभनानि राधांसि धनानि यस्मात् तम्। बहुधनदातारम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (अर्च) पूजय (यथा) येन प्रकारेण (विदे) अ० २०।२२।४। विद्यते सः (यः) परमेश्वरः (जरितृभ्यः) स्तोतृभ्यः (मघवा) पूजनीयः (पुरूवसुः) प्रभूतधनः (सहस्रेण) बहुप्रकारेण (इव) पादपूरणः (शिक्षति) ददाति-निघ० ३।२० ॥

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    विषय

    मघवा-पुरूवसुः

    पदार्थ

    १. (सुराधसम्) = उत्तम सफलता देनेवाले (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली प्रभु का ही (प्र वः) = प्रकर्षण वरण करनेवाला बन । (यथा विदे) = यथार्थ ज्ञान के लिए उस प्रभु को ही (अभि अर्च) = प्रात:-सायं पूजित कर । २. (यः) = जो (मघवा) = यज्ञशील (पुरूवसुः) = पालक व पूरक धनोवाले प्रभु हैं, वे जरितृभ्यः-स्तोताओं के लिए सहखेण इव शिक्षति-हजारों के रूप में देने की कामना करते हैं|

    भावार्थ

    हम प्रभु का वरण करें, प्रभु का अर्चन करें। यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति का यही मार्ग है। वे प्रभु स्तोताओं के लिए सब आवश्यक धनों को देते हैं।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    To the best of your intention and purpose and for whatever you wish to achieve, pray to Indra, lord of glory, world power and promotion and means of success, who gives a thousandfold wealth, honour and excellence to his celebrants.

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    Translation

    O man, you accept well-adoroable Almighty Divinity and worship Him as He is, He who is the Master of Yajnas and possessor of plentiful localities bestows for ever thousand-fold gift to the men praying Him.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    मन्त्र १, २ ऋग्वेद में है-८।४९।१, २ [सायणभाष्य, परिशिष्ट, बालखिल्य १।१, २]। सामवेद-उ० २।१।१३ तथा मन्त्र १ पू० ३।।३ ॥ १−(अभि) सर्वतः (प्र) प्रकर्षेण (वः) वृञ् वरणे स्वीकरणे-लोडर्थे लुङ्। मन्त्रे घस०। पा० २।४।८०। च्लेर्लुक्। बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि। पा० ६।४।७। अडभावः। वृणु। स्वीकुरु (सुराधसम्) सु शोभनानि राधांसि धनानि यस्मात् तम्। बहुधनदातारम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (अर्च) पूजय (यथा) येन प्रकारेण (विदे) अ० २०।२२।४। विद्यते सः (यः) परमेश्वरः (जरितृभ्यः) स्तोतृभ्यः (मघवा) पूजनीयः (पुरूवसुः) प्रभूतधनः (सहस्रेण) बहुप्रकारेण (इव) पादपूरणः (शिक्षति) ददाति-निघ० ३।२० ॥

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