अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 65 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 65/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विश्वमनाः देवता - इन्द्रः छन्दः - उष्णिक् सूक्तम् - सूक्त-६५
    पदार्थ -

    (सखायः) हे मित्रो ! (नु) शीघ्र (एतो) आओ भी, (स्तोम्यम्) स्तुतियोग्य, (नरम्) नेता [प्रेरक] (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] की (स्तवाम) हम स्तुति करें, (यः) जो (एकः) अकेला (इत्) ही (विश्वाः) सब (कृष्टीः) मनुष्यों को (अभि अस्ति) वश में रखता है ॥१॥

    भावार्थ -

    हम सब मिलकर सर्वशक्तिमान् परमात्मा की स्तुति करके आनन्द पावें ॥१॥

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