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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 15/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वा देवता - प्रपणः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - वाणिज्य
    76

    इ॒ध्मेना॑ग्न इ॒च्छमा॑नो घृ॒तेन॑ जु॒होमि॑ ह॒व्यं तर॑से॒ बला॑य। याव॒दीशे॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान इ॒मां धियं॑ शत॒सेया॑य दे॒वीम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒ध्मेन॑ । अ॒ग्ने॒ । इ॒च्छमा॑न: । घृ॒तेन॑ । जु॒होमि॑ । ह॒व्यम् । तर॑से । बला॑य । याव॑त् । ईशे॑ । ब्रह्म॑णा । वन्द॑मान: । इ॒माम् । धिय॑म् । श॒त॒ऽसेया॑य । दे॒वीम् ॥१५.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय। यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इध्मेन । अग्ने । इच्छमान: । घृतेन । जुहोमि । हव्यम् । तरसे । बलाय । यावत् । ईशे । ब्रह्मणा । वन्दमान: । इमाम् । धियम् । शतऽसेयाय । देवीम् ॥१५.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 15; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    व्यापार के लाभ का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्ने) हे अग्निसदृश तेजस्वी विद्वान् ! (इच्छमानः) [लाभ की] इच्छा करता हुआ मैं (इध्मेन) इन्धन और (घृतेन) घृत से (तरसे) तरानेवाले वा जितानेवाले (बलाय) बल के लिए (हव्यम्) हवनसामग्री का (जुहोमि) होम करता हूँ, (यावत्) जहाँ तक (ब्रह्मणा) ब्रह्म द्वारा [दी हुई] (इमाम्) इस (देवीम्) व्यवहारकुशल (धियम्) निश्चल बुद्धि की (वन्दमानः) वन्दना करता हुआ मैं (शतसेयाय) सैकड़ों उद्यम के लिए (ईशे) समर्थ हूँ ॥३॥

    भावार्थ

    जैसे समिधा और घृतादि से अग्नि का तेज बढ़कर अन्धकार हटता है, वैसे ही मनुष्य सर्वोत्तम वेदविद्या को प्रीतिपूर्वक ग्रहण करके सामर्थ्य भर वाणिज्य में उद्योग करके प्रभूत धन पावें और दरिद्रतादि को मिटावें ॥३॥ यह मन्त्र ऋग्वेद म० ३ सू० १८ म० ३ में है ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(इध्मेन)। इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति इन्धी दीप्तौ-मक्। इन्धनेन। (अग्ने)। हे अग्निवत् तेजस्विन्। विद्वन्। (इच्छमानः)। इषु इच्छायाम्-शानच्। वाणिज्यलाभं कामयमानः। (जुहोमि)। हु दानादनयोः-लट्। ददामि। (हव्यम्)। हु दानादनयोः-यत्। देवयोग्यान्नम्। हवनीयद्रव्यम्। (तरसे)। तॄ तरणे, प्लवने, अभिभवे च-असुन्। तारकाय। जयसाधनाय। वेगाय। (बलाय)। पराक्रमाय। (यावत्)। यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप्। पा० ५।२।३९। इति यत्-वतुप्। आ सर्वनाम्नः। पा० ६।३।९१। इति आत्वम्। यत्परिमाणाम्। (ईशे)। ईश्वरः शक्तो भवामि। (ब्रह्मणा)। वेदद्वारा दत्ताम्। (वन्दमानः)। स्तुवन्। (इमाम्)। उपस्थिताम्। (धियम्)। अ० २।५।४। धृञ्, यद्वा, डुधाञ् धारणे-क्विप्। घुमास्थागापाजहातिसां हलि। पा० ६।४।६६। इति ईत्वम्, ईत्वं च क्विब्लोपोऽपि। यद्वा। ध्यै चिन्तने-क्विप् संप्रसारणं च। वेदोक्तं कर्म। धारणावतीं बुद्धिम्। (शतसेयाय)। अचो यत्। पा० ३।१।९७। इति षो अन्तकर्मणि-यत्। आदेच उपदेशेऽशिति। पा० ६।१।४५। इति आत्वम्। ईद्यति। पा० ६।४।६५। इति ईत्वम्। आर्धधातुकत्वे गुणः। शतादिसंख्यापरिमितव्यवसायाय बहूद्यमाय। (देवीम्)। व्यवहारकुशलाम् ॥

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    विषय

    'अग्निहोत्र व प्रभु-वन्दन' से व्यवहार में कुशलता

    पदार्थ

    १. हे  (अग्ने) = परमात्मन् ! (इच्छमान:) = वाणिज्यलाभ की कामना करता हुआ मैं (इध्मेन) = इन्धनसाधन समित् समूह से [समिधाओं से] (घृतेन) = घृत के साथ (हव्यम्) = हवि को (जुहोमि) = आहुत करता हैं, जिससे मुझमें (तरसे) = वेग-शीघ्र-गमनशक्ति हो तथा (बलाय) = शरीर का समाधैं बना रहे। २. (यावत्) = जितना-जितना मैं (ईशे) = ईश व धन-सम्पन्न बनता हूँ, उतना ही (ब्रह्मणा) = स्तोत्ररूप मन्त्रों से (वन्दमान:) = आपका वन्दन करता हुआ (इमाम्) = इस (देवीम्) = द्योतमान व्यवहार-कुशल (धियम्) = बुद्धि को (शतसेयाय) = असंख्यात धन लाभ के लिए करता हूँ। प्रभु-स्मरणपूर्वक मुझे वह व्यवहार कुशल बुद्धि प्राप्त होती है, जोकि मेरे लिए खूब लाभ का साधन बनती है।

    भावार्थ

    अग्निहोत्र से मैं शरीर में वेग व बल का सम्पादन करता हूँ। प्रभु-वन्दन से बुद्धि को व्यवहार-कुशल बनता हूँ, इसप्रकार खुब ही धन-लाभवाला होता हूँ।

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    भाषार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमंत्रिन् ! (इच्छमानः) चाहता हुआ में (तरसे बलाय) राष्ट्र के [दुःखों से] सन्तरण के लिए और शारीरिक बल की प्राप्ति के लिए, (इध्मेन) इध्म द्वारा, (घृतेन हव्यम्) घृतसम्मृक्त हवि की (जुहोमि) मैं आहुतियाँ देता हूँ (यावत् ईशे) जितनी कि मुझमें शक्ति है; (ब्रह्मणा वन्दमानः) वेद द्वारा परमेश्वर की स्तुति करता हुआ। तो (इमाम् देवीम् धियम्) मेरी इस दिव्य बुद्धि अर्थात् संकल्प को (शतसेयाय) शत-प्रति-शत दान कर देने के लिए [स्वीकृत कर।]

    टिप्पणी

    [जो व्यक्ति राष्ट्र को दुःखों तथा कष्टों से तैराने के लिए, तथा प्रजाजन के शारीरिक बल की वृद्धि के लिए, यावत्-शक्य निज सम्पत्ति लगा देना चाहता है, वह चाहता है कि अवशिष्ट को भी वह प्रजार्थ प्रदान कर दे तथा अवशिष्ट और आहुत सम्पत्ति पर "कर" न लगाया जाय-ऐसी प्रार्थना अग्रणी अर्थात् प्रधानमन्त्री से करता है। शतसेयाय= शत+षणु दाने (स्वादि:)। तरसे= तृ प्लवनसंतरणयोः (भ्वादिः)।]

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    विषय

    वणिग्-व्यापार का उपदेश ।

    भावार्थ

    हे अग्ने ! जिस प्रकार (इच्छमानः) तुम को चाहने वाला या तुझ द्वारा यज्ञ करने का अभिलाषी मैं (घृतेन) घृत के साथ (हव्यं) आहवनीय पदार्थ को (इध्मेन) काष्ठ के संग (तरसे बलाय) दुःखों से पार हो जाने और बल प्राप्त करने के लिये (जुहोमि) आहुति देता हूं, (यावद् ईशे) और जितना मैं कर सकता हूं उतना (ब्रह्मणा वन्दमानः) वेद मन्त्रों से स्तुति करता हुआ यज्ञ करता हूं (इमां) इस (देवीम्) दिव्यगुणयुक्त, उत्तम शुभ (धियं) धारणावती बुद्धि को भी पुष्ट करता हूं कि मुझे (शतसेयाय) अपरिचित सैकड़ों धन प्राप्त हों । अर्थात् संसार के सागर से पार करने और इसमें दृढ़ता से चित्त को बल देने के लिये यज्ञ, होम और वेदमन्त्रों से ईश्वर का भजन आवश्यक है । वहां साथ ही व्यापार करने के लिये सैकड़ों धन प्राप्त करने के लिये दृढ़ धारणा भी आवश्यक है ।

    टिप्पणी

    ऋग्वेदे कतो वैश्वामित्र ऋषिः । अग्निर्देवता ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पण्यकामोऽथर्वा ऋषिः। विश्वेदेवाः उत इन्द्राग्नी देवताः। १ भुरिक्, ४ त्र्यवसाना बृहतीगर्भा विराड् अत्यष्टिः । ५ विराड् जगती । ७ अनुष्टुप् । ८ निचृत् । २, ३, ६ त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Business and Finance

    Meaning

    O leading light of life, divine Agni, with the desire for correct and creative business to my utmost power and passion for success with a hundred possibilities, I offer holy materials with ghrta into the lighted fire, controlling this divine intelligence of mine and worshipping Divinity with hymns of the Veda.

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    Translation

    Desirous of wealth and overwhelming might, I offer you, O adorable Lord, my dedicated actions, further enlivened by devotion, and supported by knowledge. Praising you with sacred hymns, as much as I can, I propitiate you that you may render this praise resplendent with infinite treasure.(Cf.v. III.18.3)

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    Translation

    I desiring strength and vigor offer the oblation of molten butter in the fire with fuel according to the power and means within my control. I Praying God with Vedic hymns attain the wonderful knowledge which Possess to employ in my hundreds of undertakings.

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    Translation

    O Agni, with fuel and butter longing for profit, mine offering presentfor strength and conquest. So far as I have strength, adoring the fine intellect with vedic knowledge, may I become competent to gain a hundred treasures.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(इध्मेन)। इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति इन्धी दीप्तौ-मक्। इन्धनेन। (अग्ने)। हे अग्निवत् तेजस्विन्। विद्वन्। (इच्छमानः)। इषु इच्छायाम्-शानच्। वाणिज्यलाभं कामयमानः। (जुहोमि)। हु दानादनयोः-लट्। ददामि। (हव्यम्)। हु दानादनयोः-यत्। देवयोग्यान्नम्। हवनीयद्रव्यम्। (तरसे)। तॄ तरणे, प्लवने, अभिभवे च-असुन्। तारकाय। जयसाधनाय। वेगाय। (बलाय)। पराक्रमाय। (यावत्)। यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप्। पा० ५।२।३९। इति यत्-वतुप्। आ सर्वनाम्नः। पा० ६।३।९१। इति आत्वम्। यत्परिमाणाम्। (ईशे)। ईश्वरः शक्तो भवामि। (ब्रह्मणा)। वेदद्वारा दत्ताम्। (वन्दमानः)। स्तुवन्। (इमाम्)। उपस्थिताम्। (धियम्)। अ० २।५।४। धृञ्, यद्वा, डुधाञ् धारणे-क्विप्। घुमास्थागापाजहातिसां हलि। पा० ६।४।६६। इति ईत्वम्, ईत्वं च क्विब्लोपोऽपि। यद्वा। ध्यै चिन्तने-क्विप् संप्रसारणं च। वेदोक्तं कर्म। धारणावतीं बुद्धिम्। (शतसेयाय)। अचो यत्। पा० ३।१।९७। इति षो अन्तकर्मणि-यत्। आदेच उपदेशेऽशिति। पा० ६।१।४५। इति आत्वम्। ईद्यति। पा० ६।४।६५। इति ईत्वम्। आर्धधातुकत्वे गुणः। शतादिसंख्यापरिमितव्यवसायाय बहूद्यमाय। (देवीम्)। व्यवहारकुशलाम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (অগ্নে) হে অগ্রণী প্রধানমন্ত্রী ! (ইচ্ছমানঃ) কামনাকারী আমি (তরসে বলায়) রাষ্টের [দুঃখ থেকে] সন্তরণের জন্য ও শারীরিক বল/শক্তি প্রাপ্তির জন্য, (ইধ্মেন) ইধ্ম/সমিধা দ্বারা, (ঘৃতেন হব্যম্) ঘৃতসম্পৃক্ত হবির (জুহোমি) আমি আহুতি প্রদান করি (যাবৎ ঈশে) যতটা আমার মধ্যে শক্তি আছে; (ব্রহ্মণা বন্দমানঃ) বেদ দ্বারা পরমেশ্বরের স্তুতি করে। (ইমাম্ দেবীম্ ধিয়ম্) আমার এই দিব্য বুদ্ধি অর্থাৎ সংকল্পকে (শতসেয়ায়) শত শতাংশ দান করে দেওয়ার জন্যে [স্বীকৃত করো।]

    टिप्पणी

    [যে ব্যক্তি রাষ্টেকে দুঃখ এবং কষ্ট-সমূহ থেকে উদ্ধার করার জন্য, এবং প্রজাদের শারীরিক শক্তি বৃদ্ধির জন্য, যাবৎ-শক্য নিজ সম্পত্তি প্রয়োগ করতে চায়, সে চায়/কামনা করে সে যেন অবশিষ্ট সম্পত্তিও প্রজার্থে প্রদান করে দিতে পারে এবং অবশিষ্ট ও আহুত সম্পত্তির ওপর "কর" না লাগানো হয়—এমন প্রার্থনা অগ্রণী অর্থাৎ প্রধানমন্ত্রীর প্রতি করা হচ্ছে। শতসৈয়ায়=শত+ ষণু দানে (স্বাদিঃ)। তরসে= তৄ প্লবনসন্তরণয়োঃ (ভ্বাদিঃ)।]

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    मन्त्र विषय

    ব্যাপারলাভোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (অগ্নে) হে অগ্নিসদৃশ তেজস্বী বিদ্বান্ ! (ইচ্ছমানঃ) [লাভের] অভিলাষী আমি (ইধ্মেন) সমিধা ও (ঘৃতেন) ঘৃত দ্বারা (তরসে) পার করতে সমর্থ বা জয়ী করতে সমর্থ (বলায়) বলের/শক্তির জন্য (হব্যম্) হবনসামগ্রীর (জুহোমি) হোম করি, (যাবৎ) যেখান পর্যন্ত (ব্রহ্মণা) ব্রহ্ম দ্বারা [প্রদত্ত] (ইমাম্) এই (দেবীম্) ব্যবহার কুশল (ধিয়ম্) নিশ্চল বুদ্ধির (বন্দমানঃ) বন্দনা করে আমি (শতসেয়ায়) শত উদ্যমের জন্য (ঈশে) সমর্থ ॥৩॥

    भावार्थ

    যেমন সমিধা ও ঘৃতাদি দ্বারা অগ্নির তেজ বৃদ্ধি হয়ে অন্ধকার দূরীভূত হয়, তেমনই মনুষ্য সর্বোত্তম বেদবিদ্যা, প্রীতিপূর্বক গ্রহণ করে সামর্থ্য অনুযায়ী বাণিজ্যে প্রয়োগ করে প্রভূত ধন প্রাপ্ত করুক এবং দরিদ্রতাদি দূর করুক॥৩॥ এই মন্ত্র ঋগ্বেদ ম০ ৩ সূ০ ১৮ ম০ ৩ এ আছে॥

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