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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 19 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 19/ मन्त्र 8
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - विश्वेदेवाः, चन्द्रमाः, इन्द्रः छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - अजरक्षत्र
    84

    अव॑सृष्टा॒ परा॑ पत॒ शर॑व्ये॒ ब्रह्म॑संशिते। जया॒मित्रा॒न्प्र प॑द्यस्व ज॒ह्ये॑षां॒ वरं॑वरं॒ मामीषां॑ मोचि॒ कश्च॒न ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अव॑ऽसृष्टा । परा॑ । प॒त॒ । शर॑व्ये । ब्रह्म॑ऽसंशिते । जय॑ । अ॒मित्रा॑न् । प्र । प॒द्य॒स्व॒ । ज॒हि । ए॒षा॒म् । वर॑म्ऽवरम् । मा । अ॒मीषा॑म् । मो॒चि॒ । क: । च॒न ॥१९.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते। जयामित्रान्प्र पद्यस्व जह्येषां वरंवरं मामीषां मोचि कश्चन ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अवऽसृष्टा । परा । पत । शरव्ये । ब्रह्मऽसंशिते । जय । अमित्रान् । प्र । पद्यस्व । जहि । एषाम् । वरम्ऽवरम् । मा । अमीषाम् । मोचि । क: । चन ॥१९.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 19; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    युद्धविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (ब्रह्मसंशिते) हे ब्रह्माओं, वेदवेत्ताओं से प्रशंसित वा यथावत् तीक्ष्ण की हुई (शरव्ये) बाण विद्या में चतुर सेना ! (अवसृष्टा) छोड़ी हुई तू (परा) पराक्रम के साथ (पत) झपट। (अमित्रान्) वैरियों को (जय) जीत, (प्र पद्यस्व) आगे बढ़, (एषाम्) इनमें से (वरंवरम्) एक एक बड़े वीर को (जहि) मार डाल, (अमीषाम्) इनमें से (कश्चन) कोई भी (मा मोचि) न छूटे ॥८॥

    भावार्थ

    धर्मज्ञ और युद्धविद्या में कुशल आचार्यों से शिक्षा पाकर सेना के स्त्री पुरुष सेनापति की आज्ञा पाते ही उमंग से धावा करके शत्रुओं को मार गिरावें ॥८॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद ६।७५।१६। और यजुर्वेद १७।४५। में है ॥

    टिप्पणी

    ८−(अवसृष्टा) सृज-क्त। प्रेरिता। (परा) पराक्रमेण। (पत) शीघ्रं गच्छ। (शरव्ये) अ० १।१९।१। शरु-यत्। हे शरौ बाणविद्यायां कुशले सेने। (ब्रह्मसंशिते) ब्रह्मभिर्वेदवेतृभिः प्रशंसिते वा सम्यक् शिते तीक्ष्णीकृते सुशिक्षिते। (एषाम्) शत्रूणां मध्ये। (वरंवरम्) अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते-निरु० १०।४२। प्रत्येकं श्रेष्ठं वीरम्। (अमीषाम्) दूरे दृश्यमानानां वैरिणां मध्ये। (कश्चन) कोऽपि। (मा मोचि) मुच्लृ मोक्षे-कर्मणि माङि लुङि रूपम्। मुक्तो मा भूत्। अन्यत् सुगमम् ॥

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    विषय

    शत्रु के चुने हुए वीरों का विनाश

    पदार्थ

    १. हे (ब्रह्मसंशिते) = ज्ञान के द्वारा तीन किये गये (शरव्ये) = हिंसा-कुशल इषो [बाण]! तू (अवसृष्टा) = धनुष से छोड़ा हुआ (परापत) = दूर जाकर शत्रुओं पर पड़, शस्त्र को विचारपूर्वक शत्रुओं पर फेंका जाए। २. शरव्ये! तू (जय) = विजय करनेवाली हो। तू (अमित्रान् प्रपद्यस्व) = शत्रुओं पर विशेषरूप से गिर । (एषाम्) = इनके (वरं वरम्) = श्रेष्ठ-श्रेष्ठ सैनिकों को-चुने हुए वीरों को (जहि) = समाप्त कर दे। (अमीषाम्) = इनमें (कश्चन) = कोई भी (मा मोचि) = छूट न जाए।

    भावार्थ

    हम समझदारी से अस्त्रवर्षा करके शत्रु के चुने हुए बीरों का विध्वंस कर दें। इनमें से कोई बच न पाये। मुख्य सैनिकों के विनाश से सामान्य सैनिकों का विनाश अनावश्यक हो जाता है।

    विशेष

    विजयी राष्ट्र में तेजस्विता व अभ्युदय की वृद्धि होती है। लोग उत्तम वसुओंवाले, उत्तम निवासवाले 'वसिष्ठ' बनते हैं। यही सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (ब्रह्मसंशिते) वेदोक्त विधि द्वारा तेज की गई (शरव्ये) हे शरसंहति। (अवसृष्टा) धनुष् से विमुक्त हुई तू (परापत) परे शत्रुसेना की ओर जा। (अमित्रान्) शत्रुओं पर (जय) विजय पा, (प्र पद्यस्य) शत्रुओं को तू प्राप्त हो, (एषाम्) इनमें का (वरंवरम्) प्रत्येक श्रेष्ठ का (जहि) हनन कर, (अमीषाम्) इनमें का (कश्चन) कोई भी (मा मोचि) न छूटने पाए।

    टिप्पणी

    [शरव्या= यह ऐसा यन्त्र है जिसमें नाना शर होते हैं , जोकि युगपत् शत्रु पर छोड़े जाते हैं। शरव्या= शरसंहतिः (सायण) अथर्व० १।१९।३।]

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    विषय

    शत्रुओं पर विजय करने के लिये अपने राष्ट्र की शक्ति बढ़ाने का उपदेश ।

    भावार्थ

    हे (ब्रह्म-संशिते शरव्ये) ब्रह्म = वेदज्ञान और विचार के अनुसार तीक्ष्ण, प्रबल और उग्र बनाये हुए बाण, (अवसृष्टा) धनुष् से छूटकर (परा पत) दूर जा, अर्थात् हे क्षत्रिय धनुर्धारी तू ब्राह्मण गुरुओं से खूब शिक्षित होकर शत्रु पर जा पड़ और (अमित्रान् जय) शत्रुओं पर विजय कर, (प्र पद्यस्व) आगे बढ़ और उनमें घुस जा, (एषाम् वरम्-वरम्) इनमें से उत्तम उत्तम, प्रधान २ पुरुष को (जहि) विनाश कर, (अमीषां कः चन मा मोचि) इनमें से किसी को मत छोड़, किसी को बचा न रहने दे ।

    टिप्पणी

    ऋग्वेदे पायुर्भारद्वाज ऋषिः। इषवो देवता। (तृ०) ‘गच्छामित्रान्’ (च०) ‘मामीषां कञ्चनोच्छिषः’ इति ऋ०, यजु०। ‘अवसृष्टः परापत शरो ब्रह्मसंशितः।’ आ० श्रौ० सू०। ऋ० यजु०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः। विश्वेदेवा उत चन्द्रमा उतेन्दो देवता । पथ्याबृहती । ३ भुरिग् बृहती, व्यवसाना षट्पदा त्रिष्टुप् ककुम्मतीगर्भातिजगती। ७ विराडास्तारपंक्तिः । ८ पथ्यापंक्तिः। २, ४, ५ अनुष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Strong Rashtra

    Meaning

    O volley of arrows and missiles shot and charged, sharpened and calibrated with the highest knowledge and expertise, go far and fall upon the targets. Conquer the foes, go fast forward, take the best ones of the enemy one by one, let none of them be spared.

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    Translation

    O killer arrow, sharpened with ;the scientific knowledge, having been shot, let you go far and fall. Let you enter the enemies and -coriquer them. Kill each and every prominent among thei. Let nonē of them escape.(Cf.Rv. VI.75.16):

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    Translation

    Let the arrows loosed from the bow-strings made through the skill of archery fly away, assail the enemies, vanquish them, kill the bravest of them and let not one of them scape.

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    Translation

    Loosed from the bowstring fly away, thou arrow, sharpened by our vedic knowledge. Assail the foemen, vanquish them, conquer each bravest man of theirs, and let not one of them escape.

    Footnote

    See Rig, 6-75-16 and Yajur, 17-45.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(अवसृष्टा) सृज-क्त। प्रेरिता। (परा) पराक्रमेण। (पत) शीघ्रं गच्छ। (शरव्ये) अ० १।१९।१। शरु-यत्। हे शरौ बाणविद्यायां कुशले सेने। (ब्रह्मसंशिते) ब्रह्मभिर्वेदवेतृभिः प्रशंसिते वा सम्यक् शिते तीक्ष्णीकृते सुशिक्षिते। (एषाम्) शत्रूणां मध्ये। (वरंवरम्) अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते-निरु० १०।४२। प्रत्येकं श्रेष्ठं वीरम्। (अमीषाम्) दूरे दृश्यमानानां वैरिणां मध्ये। (कश्चन) कोऽपि। (मा मोचि) मुच्लृ मोक्षे-कर्मणि माङि लुङि रूपम्। मुक्तो मा भूत्। अन्यत् सुगमम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (ব্রহ্মসংশিতে) বেদোক্ত বিধি দ্বারা তীক্ষ্ণকৃত (শরব্যে) হে শরসংহতি ! (অবসৃষ্টা) ধনুক থেকে বিমুক্ত তুমি (পরাপত) দূরের শত্রুসেনাদের দিকে যাও। (অমিত্রান্) শত্রুদের ওপর (জয়) বিজয় প্রাপ্ত করো, (প্র পদ্যস্ব) শত্রুদের তুমি প্রাপ্ত হও, (এষাম্) এঁদের মধ্যে (বরংবরম্) প্রত্যেক শ্রেষ্ঠ-এর (জহি) হনন করো, (অমীষাম্) এঁদের মধ্যে (কশ্চন) কেউই যেন (মা মোচি) না ছাড়া পায়/মুক্ত হয়।

    टिप्पणी

    [শরব্যা= এটি এমন যন্ত্র যার মধ্যে নানা শর থাকে, যা যুগপৎ/একসাথে শত্রুদের ওপর নিক্ষেপ করা হয়। শরব্যা= শরসংহতিঃ (সায়ণ) অথর্ব০ ১।১৯।৩।]

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    मन्त्र विषय

    যুদ্ধবিদ্যায়া উপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ব্রহ্মসংশিতে) হে ব্রহ্মাগণ, বেদবেত্তাগণ দ্বারা প্রশংসিত বা যথাবৎ তীক্ষ্ণ কৃত (শরব্যে) বাণ বিদ্যায় চতুর সেনা ! (অবসৃষ্টা) মুক্ত/প্রেরিত তোমরা (পরা) পরাক্রমপূর্বক (পত) আক্রমণ করো। (অমিত্রান্) শত্রুদের (জয়) জয় করো, (প্র পদ্যস্ব) অগ্ৰগামী হও, (এষাম্) এঁদের মধ্যে (বরংবরম্) এক একজন বড়ো বীরকে (জহি) বিনাশ করো, (অমীষাম্) এঁদের মধ্যে (কশ্চন) কেউই যেন (মা মোচি) বাদ না যায়/মুক্ত না থাকে॥৮॥

    भावार्थ

    ধর্মজ্ঞ ও যুদ্ধ বিদ্যায় কুশল আচার্যদের থেকে শিক্ষা প্রাপ্ত করে সেনাবাহিনীর স্ত্রী পুরুষ সেনাপতির আজ্ঞামাত্রই শীঘ্রই অগ্রসর হয়ে শত্রুদের পরাজিত করুক ॥৮॥ এই মন্ত্র কিছু ভেদে ঋগ্বেদ ৬।৭৫।১৬। এবং যজুর্বেদ ১৭।৪৫। এ আছে ॥

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