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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - स्वराजपुनः स्थापन सूक्त
    268

    अचि॑क्रदत्स्व॒पा इ॒ह भु॑व॒दग्ने॒ व्य॑चस्व॒ रोद॑सी उरू॒ची। यु॒ञ्जन्तु॑ त्वा म॒रुतो॑ वि॒श्ववे॑दस॒ आमुं न॑य॒ नम॑सा रा॒तह॑व्यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अचि॑क्रदत् । स्व॒ऽपा: । इ॒ह । भु॒व॒त् । अग्ने॑ । वि । अ॒च॒स्व॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒रू॒ची इति॑ । यु॒ञ्जन्तु॑ । त्वा॒ । म॒रुत॑: । वि॒श्वऽवे॑दस: । आ । अ॒मुम् । न॒य॒ । नम॑सा । रा॒तऽह॑व्यम् ॥३.१।


    स्वर रहित मन्त्र

    अचिक्रदत्स्वपा इह भुवदग्ने व्यचस्व रोदसी उरूची। युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आमुं नय नमसा रातहव्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अचिक्रदत् । स्वऽपा: । इह । भुवत् । अग्ने । वि । अचस्व । रोदसी इति । उरूची इति । युञ्जन्तु । त्वा । मरुत: । विश्वऽवेदस: । आ । अमुम् । नय । नमसा । रातऽहव्यम् ॥३.१।

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (अचिक्रदत्) उस [परमेश्वर] ने पुकारकर कहा है, “(इह) यहाँ पर (स्वपाः) अपने जनों का पालनेवाला अथवा उत्तम कर्मोंवाला प्राणी (भुवत्) होवे।” (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (उरूची) बहुत पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (रोदसी) सूर्य और पृथिवी में (वि) विविध प्रकार से (अचस्व) गति कर। (विश्ववेदसः) सब प्रकार के ज्ञान वा ध्यानवाले (मरुतः) शूर और विद्वान् पुरुष (त्वा) तुझसे (युञ्जन्तु) मिलें। [हे राजन्] (रातहव्यम्) भेंट वा भक्ति का दान करनेवाले (अमुम्) उस [प्रजागण] को (नमसा) अन्न वा सत्कार के साथ (आ, नय) अपने समीप आ ॥१॥

    भावार्थ

    परमेश्वर ने यजुर्वेद में भी कहा है−कु॒र्वन्ने॒वेह कर्माणि जिजीवि॒षेच्छ॒त समाः॑ ॥ यजु० ४०।२ ॥ मनुष्य (इह) यहाँ पर (कर्माणि कुर्वन् एव) कर्मों को करता हुआ ही (शतंसमाः) सौ वर्षों तक (जिजीविषेत्) जीना चाहे ॥ इस प्रकार राजा परमेश्वर की आज्ञापालन और स्वप्रजापालन में कुशल होकर सूर्यविद्या और पृथिवी आदि विद्या में निपुण बनकर विज्ञानी होवे, शूरवीर विद्वान् लोग उससे मिलें और राजा उन भक्त प्रजागणों का सत्कार करे ॥

    टिप्पणी

    १−(अचिक्रदत्)। क्रदि आह्वाने रोदने च-ण्यन्तात् लुङि चङि रूपम्, नुमभावः। आहूतवान्, शब्दमकरोत्। स्वपाः। स्व+पा रक्षणे-विच्। (अथवा)। आपः कर्माख्यायां हृस्वो नुट्, च वा। उ० ४।२०८। इति सु+आप्लृ व्याप्तौ-असुन्। स्वकीयप्रजापालकः। शोभनकर्मा। (इह)। अत्र। अस्मिन् जन्मनि लोके वा। (भुवत्)। भू-लेट्। भवेत्। (वि)। विविधम्। (अचस्व)। अचु गतौ। गच्छ। प्राप्नुहि। (रोदसी)। अ० १।३२।३। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति रुधिर् आवरणे-असुन्। गौरादित्वात् ङीप्। धकारस्य दकारः। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति पूर्वसवर्णः। आभ्यां हि रुद्धानि सर्वभूतानि। रोदस्यौ। द्यावापृथिव्यौ-निघ०। ३।३०। भूमिस्वर्गौ। (उरूची)। उरु बहुनाम-निघ०। ३।१। ऋत्विग्दधृक्। पा० ३।२।५९। इति उरु+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन् अन्लोपो दीर्घश्च। अञ्चतेश्चोपसंख्यानम्। वा० पा० ४।१।६। इति ङीप्। ङीप उदात्तत्वम्। पूर्ववत् पूर्वसवर्णः। उरवो बहवः पदार्था अञ्चन्ति गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति याभ्यां ते उरूच्यौ। बहुपदार्थ प्रापिके। (युज्जन्तु)। प्राप्नुवन्तु। (त्वा)। त्वाम्। (मरुतः)। अ० १।२०।१। शूर। विद्वांसः। (विश्ववेदसः)। विश्व+विद ज्ञाने, वा विद्लृ लाभे-असुन्। सर्वविश्वज्ञातारः। सर्वधनयुक्ताः। (अमुम्)। परिदृश्यमानं प्रजागणम्। (आ नय)। समीपे प्रापय। (नमसा)। अन्नेन-निघ० ३।७। सत्कारेणा। (रातहव्यम्)। हु दानादनादानप्रीणनेषु। हूयते हव्यम्। रातं दत्तं हव्यं देवान्नं देवपूजनं येन तम् ॥

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    विषय

    आदर्श जीवन

    पदार्थ

    १. कैसे व्यक्ति को राजा बनना चाहिए' उसका संकेत करते हुए कहते हैं कि (अचिक्रदत्) = यह खूब ही प्रभु का आह्वान करता है और इह यहाँ (स्वपा:) = [स्व-पा] अपना रक्षण करनेवाला (भुवत्) = होता है-अपने को वासनाओं से आक्रान्त नहीं होने देता, अथवा 'सु+अपा' उत्तम कर्मोंवाला होता है। प्रभु का स्मरण इसे मार्ग-भ्रष्ट नहीं होने देता। २. हे (अग्ने:) = प्रगतिशील जीव । तू (उरूची) = [उर्वञ्चने] विशाल गतिवाले (रोदसी) = द्यावापृथिवी को (व्यचस्व) = व्यापक बनानेवाला हो। 'द्यावा' मस्तिष्क है और 'पृथिवी' शरीर है। तू मस्तिष्क और शरीर को व्यापक शक्तिवाला बना। तेरा शरीर पृथिवी की भाँति दृढ़ हो तो तेरा मस्तिष्क द्युलोक के समान ज्ञान-विज्ञान के सूर्य व नक्षत्रों से उज्ज्वल हो। ३. (विश्ववेदसः) = सम्पूर्ण धनोंवाले (मरुत:) = प्राण (त्वा) = तुझे (युञ्जन्तु) = प्राप्त हों अथवा तुझे योगयुक्त करें। प्राणसाधना से शरीर में सोम [वीर्य] की ऊर्ध्वगति होकर शरीर के सब कोश बड़े सुन्दर बनते हैं। अन्नमयकोश तेजस्वी हो जाता है, तो प्राणमय वीर्यवान् और मनोमय ओजस्वी और बलवान् बनता है। इस प्राणसाधना से विज्ञानमयकोश ज्ञानपूर्ण होता है तो आनन्दमयकोश 'सहस्' वाला बनता है एवं, ये मरुत् 'विश्ववेदस' हैं। ४. तू (नमसा) = नमन के द्वारा (अमुम्) = उस (रातहव्यम्) = सब हव्य [पवित्र] पदार्थों को देनेवाले प्रभु को (आनय) = अपने में प्राप्त करनेवाला हो। नमन के द्वारा तू हृदय में प्रभु का दर्शन करनेवाला बन। ५. राजा का ऐसा जीवन प्रजा को भी उत्तम बना सकेगा।

    भावार्थ

    प्रभु-स्मरणपूर्वक हम उत्तम कर्मोवाले हों। शरीर व मस्तिष्क दोनों का विकास करें। प्राणसाधना के द्वारा सब कोशों को सबल बनाएँ और नमन के द्वारा प्रभु को प्राप्त करें।

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    भाषार्थ

    (अग्नि) हे अग्रणी प्रधानमंत्री ! (अचिक्रदत्त) [इन्द्र] ने बार-बार तुझे पुकारा है, (स्वपा:) ताकि उत्तमकर्मी वह इन्द्र (इह) इस अपने राष्ट्र में (भुवत्) पुनः सूचित हो जाय, एतदर्थ (उरूची) व्यापनशील, (रोदसी) द्युलोक और पृथिवी में (व्यचस्व) विविध प्रकार की गतियाँ कर [इन्द्र के अन्वेषण के लिए]। (विश्ववेदसः) विश्व के नेता प्रज्ञाशील (मरुतः) मनुष्य (त्वा) तुझे (युञ्जन्तु) इस कार्य में नियुक्त करें, (रात-हव्यम) सव प्रजा को अदनीय-अन्न देनेवाले ! (अमुम्) उस इन्द्र को (नमसा) नमस्कार के साथ नमस्कारपूर्वक (आ नय) इस साम्राज्य में वापिस ले आ।

    टिप्पणी

    [प्रजाजनों ने किसी कारण निज इंद्र अर्थात् सम्राट् को साम्राज्य से पदच्युत कर दिया है। वह रुष्ट होकर कहीं चला गया है। प्रज्ञानी पुरुष, अग्रणी अर्थात् प्रधानमन्त्री को इन्द्र को वापिस लाने के लिए नियुक्त करते हैं। अचिक्रदत्=क्रदि आह्वाने (भ्वादिः), चङ् आगम, लुङ् लकार। उरूची=उर्वञ्चने व्यापनशीले (सायण) उरु=अच् (अञ्चु, अच्, अचि, गतौ भ्वादिः)।]

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    विषय

    राजा की पुनः स्थापना ।

    भावार्थ

    राजा राष्ट्र को प्राप्त करे इसका उपदेश करते हैं । हे अग्ने ! सेनापते ! (स्वपाः) निज प्रजा का उत्तम रूप से पालने वाला राजा (अचिक्रदत्) सर्वत्र अपनी शासन घोषणाएं करता हुआ और राष्ट्र के अधिकारियों को बुलाता हुआ (इह भुवद्) इस राष्ट्र में शासन करने में समर्थ हो । हे (अग्ने) सब के अग्रणी नेता ! तू (उरूची) बड़े, सर्वव्यापक (रोदसी) द्यौ और पृथिवी के समान राजवर्ग=शासकवर्ग और प्रजा=शास्य वर्ग दोनों को (व्यचस्व) अपने वश कर । (विश्ववेदसः) समस्त विद्याओं, देशों और पदार्थों को जानने हारे (मरुतः) विद्वान् गण (त्वा) तेरे साथ (युञ्जन्तु) सहयोग करें (रातहव्यम्) अपनी प्रजा से हव्य अर्थात् अपना षष्ठांश रूप कर प्राप्त करने हारे (अमुं) इस राष्ट्रपति राजा को (नमसा) बड़े भारी आदर सत्कार पूर्वक (आ नय) राष्ट्र पर आरूढ कर । एक वार राष्ट्र हाथ से निकल जाने पर भी पुनः सेनापति को चाहिये कि वह अपने हाथ से गये राष्ट्र पर अपने राजा को आरूढ करे और राष्ट्र से उसको कर दिलवादे और विद्वानों को अपने साथ मिलाये रखे । ब्रह्मपक्ष में- हे अग्ने ! (इह) तू इस संसार में ‘सु-अपाः’ उत्तम कर्म और ज्ञान से सम्पन्न, (भुवद्) हैं। (उरूची रोदसी व्यचस्व) तू विशाल पृथिवी और द्यौ को व्याप्त करता या फैलाता है। (विश्ववेदसः मरुतः त्वा युंजन्तु) ज्ञानी विद्वान् तुझे योग से साक्षात् करते हैं । हे पुरुष ! (अमुं) उस (रातहव्यं) अन्न और ज्ञान सुखप्रद परमेश्वर को (नमसा आनय) भक्ति से प्राप्त कर । अध्यात्मपक्ष में - यह आत्मा इस देहरूप राष्ट्र में सब इन्द्रियों का पालक शुभ कर्मकर्त्ता दोनों प्राण और अपान पर वश करता है सब मरुत् = प्राण उसके साथ सहयोग करें । परमात्मा उस जीवात्मा को अन्न और ज्ञान द्वारा पुष्ट करके सन्मार्ग पर ले जावे ।

    टिप्पणी

    अदिद्युतत् स्क्पाको विभावाऽग्ने यजस्व रोदसी उरूची । आयुं नय नमसा रातहव्या अञ्जन्ति सुप्रयसं पंचजनाः । इति मैं० सं०। (प्र०) भवदग्ने (तृ० च०) ‘अमुं नय नमसा रातहव्यो युजन्ति सुप्रजसं पंचजनाः’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। नाना देवाः अग्निर्वा देवता । १, २, ४ त्रिष्टुभः । ३ चतुष्पदा भुरिक्पंक्तिः । ५, ६ अनुष्टुभौ । षडृचं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Re-establishment of Order

    Meaning

    O high priest of the nation, Agni, let the noble man of holy and independent action be here in the ruling seat, let his voice of rule and order be ringing over earth and reverberate over the vast skies. O ruler, let the Maruts, vibrant citizens and leading lights of nation join you, and with them, with power and self sacrifice, carry on the national yajna which is worthy of total dedication.

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    Subject

    Agni

    Translation

    O Army Chief, he (the exiled king) calls on you. May he be ' of good conduct. Fill the specious heaven and earth ( with your forces). Let'the all-winning storm-troopers the Maruts, join you. With homage here may you bring him, who is worthy of tributes.

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    Translation

    He source of nice purposes, this fire roars in the clouds, it remains in every thing and spreads over Spacious earth and heavenly region, The priests of Yajna Possessing all knowledge use it in the Yajna and offer in it rich oblation with the great sense of reverence.

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    Translation

    O Commander of the army, may this king, the nice nourisher of hissubjects, proclaiming his edicts, be fit to rule over this kingdom. O leader ofmen, control the officials and the public, spacious like the Earth and Heaven.May learned persons, knowing all sciences, co-operate with thee. O Commander, bring back to the throne most respectfully, this king, who collectstaxes from his subjects.

    Footnote

    Here is a reference to re-occupy the throne once lost. ‘Leader of men’ means theking.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अचिक्रदत्)। क्रदि आह्वाने रोदने च-ण्यन्तात् लुङि चङि रूपम्, नुमभावः। आहूतवान्, शब्दमकरोत्। स्वपाः। स्व+पा रक्षणे-विच्। (अथवा)। आपः कर्माख्यायां हृस्वो नुट्, च वा। उ० ४।२०८। इति सु+आप्लृ व्याप्तौ-असुन्। स्वकीयप्रजापालकः। शोभनकर्मा। (इह)। अत्र। अस्मिन् जन्मनि लोके वा। (भुवत्)। भू-लेट्। भवेत्। (वि)। विविधम्। (अचस्व)। अचु गतौ। गच्छ। प्राप्नुहि। (रोदसी)। अ० १।३२।३। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति रुधिर् आवरणे-असुन्। गौरादित्वात् ङीप्। धकारस्य दकारः। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति पूर्वसवर्णः। आभ्यां हि रुद्धानि सर्वभूतानि। रोदस्यौ। द्यावापृथिव्यौ-निघ०। ३।३०। भूमिस्वर्गौ। (उरूची)। उरु बहुनाम-निघ०। ३।१। ऋत्विग्दधृक्। पा० ३।२।५९। इति उरु+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन् अन्लोपो दीर्घश्च। अञ्चतेश्चोपसंख्यानम्। वा० पा० ४।१।६। इति ङीप्। ङीप उदात्तत्वम्। पूर्ववत् पूर्वसवर्णः। उरवो बहवः पदार्था अञ्चन्ति गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति याभ्यां ते उरूच्यौ। बहुपदार्थ प्रापिके। (युज्जन्तु)। प्राप्नुवन्तु। (त्वा)। त्वाम्। (मरुतः)। अ० १।२०।१। शूर। विद्वांसः। (विश्ववेदसः)। विश्व+विद ज्ञाने, वा विद्लृ लाभे-असुन्। सर्वविश्वज्ञातारः। सर्वधनयुक्ताः। (अमुम्)। परिदृश्यमानं प्रजागणम्। (आ नय)। समीपे प्रापय। (नमसा)। अन्नेन-निघ० ३।७। सत्कारेणा। (रातहव्यम्)। हु दानादनादानप्रीणनेषु। हूयते हव्यम्। रातं दत्तं हव्यं देवान्नं देवपूजनं येन तम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (অগ্নে) হে অগ্রণী প্রধানমন্ত্রী ! (অচিক্রদৎ) [ইন্দ্র] বারংবার তোমাকে আহ্বান করেছে, (স্বপাঃ) যাতে উত্তমকর্মী সেই ইন্দ্র (ইহ) এই নিজের রাষ্ট্রে (ভুবৎ) পুনঃ সঞ্চিত হয়ে যায়, এতদর্থে (উরূচী) ব্যাপনশীল, (রোদসী) দ্যুলোক এবং পৃথিবীতে (ব্যচস্ব) তুমি বিবিধ প্রকারে অগ্রধাবন/গমন করো [ইন্দ্রের অন্বেষণের জন্য]। (বিশ্ববেদসঃ) বিশ্বের বেত্তা প্রজ্ঞাশীল (মরুতঃ) মনুষ্য (ত্বা) তোমাকে (যুঞ্জন্তু) এই কার্যে নিযুক্ত করুক, (রাতহব্যম্) সকল প্রজাদের অদনীয়-অন্ন প্রদানকারী! (অমুম্) সেই ইন্দ্রকে (নমসা) নমস্কারের সাথে নমস্কারপূর্বক (আ নয়) এই সাম্রাজ্যে ফিরিয়ে নিয়ে এসো।

    टिप्पणी

    [প্রজাগণ কোনো কারণে নিজ ইন্দ্র অর্থাৎ সম্রাটকে সাম্রাজ্য থেকে পদচ্যুত করে দিয়েছে। এবং সম্রাট রুষ্ট হয়ে কোথাও চলে গিয়েছে। প্রজ্ঞানী পুরুষ, অগ্রণী অর্থাৎ প্রধানমন্ত্রীকে ইন্দ্রকে ফিরিয়ে নিয়ে আসার জন্য নিযুক্ত করে। অচিক্রদৎ=ক্রদি আহ্বানে (ভ্বাদিঃ), চঙ্ আগম, লুঙ্ লকার। উরূচী=উর্বঞ্চনে ব্যাপনশীলে (সায়ণ) উরু=অচ্ (অঞ্চু, অচ্, অচি, গতৌ ভ্বাদিঃ)।]

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    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাধর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (অচিক্রদৎ) সেই [পরমেশ্বর] আহ্বান করে/আহ্বানপূর্বক বলেছেন, “(ইহ) এখানে (স্বপাঃ) স্ব-প্রজাদের পালনকর্তা/স্ব-প্রজাপালক অথবা উত্তম কর্মকারী/কর্মশীল প্রাণী (ভুবৎ) হোক।” (অগ্নে) হে অগ্নি [সমান তেজস্বী রাজন্ !] (উরূচী) বহু পদার্থ প্রদানকারী/প্রাপ্তিতে সহায়ক (রোদসী) সূর্য এবং পৃথিবীতে (বি) বিবিধ প্রকারে (অচস্ব) গমন করো। (বিশ্ববেদসঃ) সকল প্রকারের জ্ঞান বা ধ্যানযুক্ত (মরুতঃ) বীর এবং বিদ্বান্ পুরুষ (ত্বা) তোমার সঙ্গে (যুঞ্জন্তু) যুক্ত হোক। [হে রাজন্] (রাতহব্যম্) হব্য বা ভক্তির প্রদানকারী (অমুম্) সেই [প্রজাগণ] কে (নমসা) অন্ন বা সৎকারের সাথে (আ, নয়) নিজের সন্নিকটে নিয়ে এসো ॥১॥

    भावार्थ

    পরমেশ্বর যজুর্বেদে বলেছেন− কুর্বন্নেবেহ কর্মাণি জিজীবিষেচ্ছত সমাঃ॥ যজু০ ৪০।২ ॥ মনুষ্য (ইহ) এখানে (কর্মাণি কুর্বন্ এব) কর্ম করেই (শতংসমাঃ) শত বর্ষ পর্যন্ত (জিজীবিষেৎ) বাঁচতে চাইবে/বাঁচার ইচ্ছা করুক॥ এইভাবে রাজা পরমেশ্বরের আজ্ঞাপালন এবং স্বপ্রজাপালনে কুশল হয়ে সূর্যবিদ্যা এবং পৃথিবী আদি বিদ্যায় নিপুণ হয়ে বিজ্ঞানী হবে/হোক, শৌর্যশালী বিদ্বান্ লোক তাঁর সাথে যুক্ত হবে/হোক এবং রাজা সেই ভক্ত প্রজাগণের সৎকার করবে/করুক॥

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