अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 28/ मन्त्र 7
ऋषिः - मृगारोऽअथर्वा वा
देवता - भवाशर्वौ रुद्रो वा
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - पापमोचन सूक्त
85
अधि॑ नो ब्रूतं॒ पृत॑नासूग्रौ॒ सं वज्रे॑ण सृजतं॒ यः कि॑मी॒दी। स्तौमि॑ भवाश॒र्वौ ना॑थि॒तो जो॑हवीमि॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥
स्वर सहित पद पाठअधि॑ । न॒: । ब्रू॒त॒म् । पृत॑नासु । उ॒ग्रौ॒ । सम् । वज्रे॑ण । सृ॒ज॒त॒म् । य: । कि॒मी॒दी । स्तौमि॑ । भ॒वा॒श॒र्वौ । ना॒थि॒त: । जो॒ह॒वी॒मि॒ । तौ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२८.७॥
स्वर रहित मन्त्र
अधि नो ब्रूतं पृतनासूग्रौ सं वज्रेण सृजतं यः किमीदी। स्तौमि भवाशर्वौ नाथितो जोहवीमि तौ नो मुञ्चतमंहसः ॥
स्वर रहित पद पाठअधि । न: । ब्रूतम् । पृतनासु । उग्रौ । सम् । वज्रेण । सृजतम् । य: । किमीदी । स्तौमि । भवाशर्वौ । नाथित: । जोहवीमि । तौ । न: । मुञ्चतम् । अंहस: ॥२८.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(उग्रौ) हे उग्र स्वभाववाले तुम दोनों (नः) हम से (पृतनासु) संग्रामों में (अधि) अनुग्रह से (ब्रूतम्) बोलो और [उसको] (वज्रेण) वज्र के साथ (सम् सृजतम्) संयुक्त करो (यः) जो (किमीदी) अब क्या हो रहा है, यह क्या हो रहा है, ऐसा खोजनेवाला लुतरा पुरुष है। (नाथितः) मैं अधीन होकर (भवाशर्वौ) सुख उत्पन्न करनेवाले और शत्रुनाश करनेवाले तुम दोनों को (स्तौमि) सराहता हूँ और (जोहवीमि) बारंबार पुकारता हूँ। (तौ) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥७॥
भावार्थ
मनुष्य सदाचारी और सत्यवादी होकर शत्रुओं को संग्राम में जीतें और परमेश्वर की उपासना करके सदा प्रसन्न रहें ॥७॥
टिप्पणी
७−(अधिब्रूतम्) अधिकमनुग्रहेण वदतम् (नः) अस्मभ्यम् (पृतनासु) संग्रामेषु (वज्रेण) (संसृतम्) संयोजयतम् (यः) पुरुषः (किमीदी) अ० १।७।१। किमिदानीं वर्तते किमिदं वर्तते-इत्येवमन्वेषणं कुर्वाणः। पिशुनः (स्तौमि) प्रशंसामि (भवाशर्वौ) सुखजनकशत्रुनाशकौ परमेश्वरगुणौ (नाथितः) अ० ४।२३।७। नाथवान्। अधीनः (जोहवीमि) पुनः पुनराह्वयामि। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
'किमीदी' का संहार
पदार्थ
१. हे (उग्रौ) = उद्गूर्ण बलवाले, तेजस्वी भव और शर्व! आप (पृतनासु) = संग्रामों में (नः) = हमें (अधिबूतम्) = आधिक्येन उपदेश कीजिए। काम आदि शत्रुओं से संग्राम होने पर 'हमें क्या करना चाहिए' इसका ज्ञान दीजिए। (य:) = जो (किमीदी) = [किम् इदानीम् उत्पन्नम्, किम् इदानीम् उत्पन्नम् इति रन्ध्रान्वेषी] पर-छिद्रान्वेषी स्वार्थी पुरुष है, उसे (वज्रेण) = वन से (संसृजतम्) = संसृष्ट करो वन से समाप्त कर दीजिए। २. मैं (भवाशी) = उस उत्पादक और पालनकर्ता प्रभु का (स्तौमि) = स्तवन करता हूँ। (नाथित:) = वासनाओं से सन्तप्त किया गया मैं उसे (जोहवीमि) = पुकारता हूँ। (तौ) = वे प्रभु (न:) = हमें (अहंसः मुञ्चतम्) = पाप से मुक्त करें।
भावार्थ
प्रभु संग्नामों में शत्रु-विजय के लिए हमें उपदेश करें, पर-छिद्रान्वेषी पुरुष को नष्ट करें। ये प्रभु हमें पाप-मुक्त करें।
अगले सूक्त में भी ऋषि 'मृगार' ही है -
भाषार्थ
(पृतनासु) देवासुर संग्रामों में (उग्रौ) उग्ररूप [भव और शर्व], (नः) हमें (अधिब्रुतम्) कहें अर्थात् जतलाएँ (यः) जोकि (किमीदी) किमीदी-असुर है, [अब क्या पाप करूं,–जो निज से पुछता है] (वज्रेण) वज्र के साथ (सं सृजतम्) उसका संसर्ग करो। (नाथितः) तुझ परमेश्वर को अपना स्वामी मानता हुआ, (भवाशर्वौ) तेरे भव और शर्वरूपों की (स्तौमि) में स्तुति करता हूँ, (जोहवीमि) और बार बार उनका आह्वान करता हूँ, (तौ) वे दोनों रूप (नः) हम सबको (अंहसः) पाप से (मुञ्चतम्) मुक्त करें, छुड़ाएँ।
टिप्पणी
[अधिब्रुतम= परमेश्वर का स्तोता स्वयं नहीं जान रहा कि देवासुर संग्राम में किस समय, किस पापी असुर ने, उसे आ घेरना है, इसलिए परमेश्वर से उसका पूर्व ज्ञान वह चाहता है, ताकि उसके साथ संघर्ष के लिए सन्नद्ध हो सके। संग्राम दो प्रकार के होते हैं आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक। मन्त्र ६ में तो आधिभौतिक शत्रुओं का कथन हुआ है, और मन्त्र ७ में आध्यात्मिक शत्रुओं का।]
विषय
पापमोचन की प्रार्थना।
भावार्थ
हे (उग्रौ) उग्रस्वरूप बलवान् भव और शर्व ! आप दोनों (नः) हमें (अधिब्रूतं) उत्तम रीति से उपदेश करो कि संसार में उत्पादक और संहारक शक्तियां, परमात्मा से प्रेरित हुई २ मनुष्यों के हृदयों में समय २ पर मौन रूप में उपदेश करती हैं। और (पृतनासु) मनुष्यों में (यः) जो (किमीदी) संशयात्मा, अस्थिर चित्त या प्रत्येक पदार्थ और जीव को तुच्छ देख कर उसे नष्ट कर डालने वाला, अत्याचारी, क्षुद्रवृत्ति है उसको (वज्रेण) तुच्छ कार्य से रोकने वाले आयुध से (संसृजतम्) दण्डित करो। हे (भवाशर्वौ) भव और शर्व मैं (नाथितः) संतापित होकर (स्तौमि) आप के गुण वर्णन करता हूं और (जोहवीमि) पुकारता हूं कि (तौ नः अंहसः मुञ्चतम्) वे आप दोनों हमें पाप से मुक्त करें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मृगार ऋषिः। षष्ठं मृगारसूक्तम्। नाना देवताः। १ द्वयतिजागतगर्भा भुरिक् २-७ त्रिष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Freedom from Sin
Meaning
Lustrous Bhava and terrible Sharva, speak and guide us in the battles of life, and strike the fatal bolt on him that is selfish, cruel and destructive. I invoke you, celebrate and call upon you, I need help and succour, and pray save us from sin and suffering in this world of life and death.
Translation
May you two, formidable against the invaders (kimidin), speak favourably, for us. Strike him with your bolt, who is a robber. I praise Bhava and Sarva. Being a suppliant, I invoke them again and again, May both of them free us from sins.
Translation
These two strong powers (the Bhava and Sharva) make us to pronounce the words in the world’s battle and hurl their weapon, the thunder-bolt, on the germs which are disease creating. I equipped with strength praise and describe frequently the properties of these Bhava and Sharva, May these two become the sources of our deliverance from grief and troubles.
Translation
O strong forces of God, instruct us nicely, punish with your thunder- bolt. in battles, a man of selfish and wavering nature. O Bhava and Sarva, 1 suppliant, praise and ever call on thee. Set us free from sin.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७−(अधिब्रूतम्) अधिकमनुग्रहेण वदतम् (नः) अस्मभ्यम् (पृतनासु) संग्रामेषु (वज्रेण) (संसृतम्) संयोजयतम् (यः) पुरुषः (किमीदी) अ० १।७।१। किमिदानीं वर्तते किमिदं वर्तते-इत्येवमन्वेषणं कुर्वाणः। पिशुनः (स्तौमि) प्रशंसामि (भवाशर्वौ) सुखजनकशत्रुनाशकौ परमेश्वरगुणौ (नाथितः) अ० ४।२३।७। नाथवान्। अधीनः (जोहवीमि) पुनः पुनराह्वयामि। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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