अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 4 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 4/ सूक्त 4/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वाजीकरण सूक्त
    पदार्थ -

    (याम् त्वा) जिस तुझको (गन्धर्वः) वेद विद्या धारण करनेवाले पुरुष ने (मृतभ्रजे) नष्ट बलवाले (वरुणाय) उत्तम गुण युक्त मनुष्य के लिये (अखनत्) खना है, (ताम् त्वा) उस तुझ (शेपहर्षणीम्) सामर्थ्य बढ़ानेवाली (ओषधिम्) ओषधि को (वयम्) हम (खनामसि) खनते हैं ॥१॥

    भावार्थ -

    जिस प्रकार पूर्व ऋषियों ने मनुष्य के हित के लिये परीक्षा करके श्रेष्ठ ओषधियों को प्राप्त किया है, उसी प्रकार हम उत्तम ओषधियों की परीक्षा और सेवन से बलवान् होकर सुखी रहें ॥१॥ संहिता के (शेपहर्षणीम्) के स्थान पर पदच्छेद में (शेपः हर्षणीम्) है ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top