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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 12 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 12/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अङ्गिराः देवता - जातवेदा अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - ऋतयज्ञ सूक्त
    115

    समि॑द्धो अ॒द्य मनु॑षो दुरो॒णे दे॒वो दे॒वान्य॑जसि जातवेदः। आ च॒ वह॑ मित्रमहश्चिकि॒त्वान्त्वं दू॒तः क॒विर॑सि॒ प्रचे॑ताः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सम्ऽइ॑ध्द: । अ॒द्य । मनु॑ष: । दु॒रो॒णे । दे॒व: । दे॒वान् । य॒ज॒सि॒ । जा॒त॒ऽवे॒द॒: ।आ । च॒ । वह॑ । मि॒त्र॒ऽम॒ह॒: । चि॒कि॒त्वान् । त्वम् । दू॒त: । क॒वि: । अ॒सि॒ । प्रऽचे॑ता: ॥१२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः। आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम्ऽइध्द: । अद्य । मनुष: । दुरोणे । देव: । देवान् । यजसि । जातऽवेद: ।आ । च । वह । मित्रऽमह: । चिकित्वान् । त्वम् । दूत: । कवि: । असि । प्रऽचेता: ॥१२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 12; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य की उन्नति का उपदेश।

    पदार्थ

    (जातवेदः) हे बहुत ज्ञान वा धनवाले पुरुष ! (समिद्धः) प्रकाशयुक्त (देवः) दाता तू (अद्य) इस समय (मनुषः) मनुष्य के (दुरोणे) घर में (देवान्) दिव्य गुणों से (यजसि) संगति रखता है। (मित्रमहः) हे मित्रों के सत्कार करनेहारे ! [उन दिव्य गुणों को] (च) निश्चय करके (आवह) तू ला। (त्वम्) तू (चिकित्वान्) विज्ञानवान्, (दूतः) गमनशील वा दुष्टतापक, (कविः) बुद्धिमान् और (प्रचेताः) उत्तम चेतनावाला (असि) है ॥१॥

    भावार्थ

    पुरुषार्थी धार्मिक विद्वान् मनुष्य अपने कुल में प्रकाशित होकर संसार का उपकार करे ॥१॥ यह सूक्त कुछ भेद से ऋग्वेद में है−म० १० सू० ११० और यजुर्वेद में भी है−अ० २९ म० २५, २६, २८-३६। ऋषि जमदग्नि हैं। देवता प्रायः दयानन्दकृत यजुर्वेदभाष्य के अनुसार हमने माने हैं। मन्त्र १-१० निरुक्त में भी व्याख्यात हैं−अ० ८ ख० ५, ६, ८−१४, १७ ॥

    टिप्पणी

    १−(समिद्धः) सम्यक् प्रकाशितः (अद्य) इदानीम् (मनुषः) जनेरुसिः। उ० २।१५। इति मन ज्ञाने−उसि। मननशीलस्य मनुष्यस्य (दुरोणे) अ० ५।२६। दुस्तर्प्ये गृहे (देवः) देवो दानाद्वा दीपनाद्वा−निरु० ७।१५। दाता (देवान्) दिव्यगुणान् (यजसि) संगच्छसे (जातवेदः) अ० १।७।२। हे बहुप्रज्ञान। बहुधन (च) अवधारणे (आ वह) आनय (मित्रमहः) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति मह पूजायाम्−असुन्। हे मित्राणां पूजक (चिकित्वान्) कित ज्ञाने−क्वसु। प्रज्ञावान् (त्वम्) (दूतः) अ० १।७।६। गमनशीलः। दुष्टसंतापकः (प्रचेताः) प्रकृष्टं चेतः संज्ञानं यस्य सः ॥

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    विषय

    प्रभु का दूत

    पदार्थ

    १. (अद्य) = आज (मनुषः) = विचारपूर्वक कर्म करनेवाला व्यक्ति मनुष्य के (दुरोणे)= इस शरीररूप गृह में (समिद्धः) = ज्ञान को अत्यन्त दौप्तिवाला बना है। जहाँ इसने शरीर को सब बुराइयों से अपनीत किया है [दुर् ओण] वहाँ यह ज्ञान से दीप्त बना है। (जातवेदः) = उत्पन्न प्रज्ञानवाला अर्थात् ज्ञानी बना हुआ, (देव:) = दिव्य वृत्तिवाला होता हुआ (देवान् यजसि) = देवों का यजन करता है मान्य व्यक्तियों को आदर देता है, विद्वानों का संग करता है, उनके लिए सदा दानशील होता है। २. (मित्रमह:) = हे स्नेहयुक्त तेजस्वितावाले! तू (चिकित्वान्) =  चेतनावाला होकर (आवह) = इस ज्ञान को औरों को प्राप्त करानेवाला बन। (त्वं दूत:) = तू प्रभु का सन्देशवाहक है, (कविः असि) = तू क्रान्तदर्शी है-ठीक ही ज्ञान देनेवाला है। (प्रचेता:) = तू प्रकृष्ट संज्ञानवाला है-लोगों को एक दूसरे के समीप लानेवाला है। तू लोगों को वह ज्ञान देता है जो उन्हें परस्पर मिलानेवाला होता है। इसप्रकार लोकहित करता हुआ तू अपनी सच्ची ब्रह्मनिष्ठता को प्रकट करता है।

    भावार्थ

    ब्रह्मनिष्ठ व्यक्ति 'शरीर-गृह' को पवित्र बनाकर ज्ञान-संचय करता है, देवों के सङ्ग में रहता है, स्नेहशील व तेजस्वी बनकर लोगों को ज्ञान प्राप्त कराता है। यह बड़ा समझदार होकर प्रभु का दूत बनता है।

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    भाषार्थ

    (मनुषः) मनुष्य के (दुरोणे) हृदय-गृह में (अद्य) आज (समिद्धः) सम्यक्-प्रदीप्त हुआ (जातवेदः) हे जातप्रज्ञ ! ( देवः) तु देव (देवान् ) उपासक-देवों को (यजसि) स्वरूप दर्शन देता है । (आ च वह) उपासक देवों को निज समीप प्राप्त कर या बुला । (मित्रमह:) हे उपासक मित्रों द्वारा पूजित ! (त्वम्) तू (चिकित्वान्) ज्ञानी, (दूतः) उपतापी, (कविः) वेदकाव्य का रचयिता, (प्रचेताः) तथा प्रकृष्ट संज्ञानवाला है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र-पठित "चिकित्वान्, कविः, तथा प्रचेता:" पदों द्वारा वर्णित देव, चेतन प्रतीत हो रहा है । इसलिए 'दुरोणे' का अर्थ 'हृदय-गृह' किया है। परमेश्वर हृदयवासी है और वहाँ ही वह प्रदीप्त होता है, 'ज्योतिरुप' में चमकता है। दूतः= टुुदु उपतापे (स्वादिः) काम आदि का उपतापी। महः= मह पूजायाम् (भ्वादिः) । यजसिः= यज् दाने, परन्तु यज्ञ तो घर में घर की यज्ञशाला में ही होता है और दर्शन हृदय-गृह में।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Yajna of Life

    Meaning

    This sukta is common to Rgveda (10, 110) Yajurveda (29) and Atharva-veda. Jataveda is the home- fire, yajna-fire, master of the home and the soul in the body. Each mantra can be interpreted differently in these different contexts. O Jataveda, lighted today in the man’s home, you are brilliant and generous. You invoke, join and serve the brilliant powers of nature and humanity. Friend of the highest refulgent order, pray bring in the divines, communicate and create with them. You are master of information and knowledge, refined manager, poetic creator and wide awake in the life around.

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    Subject

    Agnih

    Translation

    Kindled (samiddha) this day in the home (durene) of man (manus), thou, a god, O Jatavedas, dost sacrifice to the gods; and dost thou bring (them), understanding it, O thou of friendly might; thou art a fore thoughtful messenger, poet. (Samiddha). (Also Yv. XXIX.25)

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    Translation

    The fire of Yajna enkindled this day in the house of man gives the parts of oblation to various physical forces known as the gods of Yajna. It is wondrous in its power and is all pervading. Let it carry our offered oblations to all physical forces as it is brilliant like sun-rays, is the object of Knowledge, source of seeing, means of knowledge and the representative of all the Yajna-devas.

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    Translation

    O wise person, respecter of friends, thou, this day, kindled like the illuminated fire, walkest in their company, as a reflective, literary person. Rich in intellect, tormentor of the wicked, highly conscious, possessing unobstructed knowledge of all subjects, cultivate fully noble virtue in the house!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(समिद्धः) सम्यक् प्रकाशितः (अद्य) इदानीम् (मनुषः) जनेरुसिः। उ० २।१५। इति मन ज्ञाने−उसि। मननशीलस्य मनुष्यस्य (दुरोणे) अ० ५।२६। दुस्तर्प्ये गृहे (देवः) देवो दानाद्वा दीपनाद्वा−निरु० ७।१५। दाता (देवान्) दिव्यगुणान् (यजसि) संगच्छसे (जातवेदः) अ० १।७।२। हे बहुप्रज्ञान। बहुधन (च) अवधारणे (आ वह) आनय (मित्रमहः) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति मह पूजायाम्−असुन्। हे मित्राणां पूजक (चिकित्वान्) कित ज्ञाने−क्वसु। प्रज्ञावान् (त्वम्) (दूतः) अ० १।७।६। गमनशीलः। दुष्टसंतापकः (प्रचेताः) प्रकृष्टं चेतः संज्ञानं यस्य सः ॥

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