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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 2
    ऋषिः - मयोभूः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
    68

    अ॒क्षद्रु॑ग्धो राज॒न्यः॑ पा॒प आ॑त्मपराजि॒तः। स ब्रा॑ह्म॒णस्य॒ गाम॑द्याद॒द्य जी॒वानि॒ मा श्वः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒क्षऽद्रु॑ग्ध: । रा॒ज॒न्य᳡: । पा॒प: । आ॒त्म॒ऽप॒रा॒जि॒त: । स: । ब्रा॒ह्म॒णस्‍य॑ । गाम् । अ॒द्या॒त् । अ॒द्य । जी॒वा॒नि॒ । श्व: ॥१८.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अक्षद्रुग्धो राजन्यः पाप आत्मपराजितः। स ब्राह्मणस्य गामद्यादद्य जीवानि मा श्वः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अक्षऽद्रुग्ध: । राजन्य: । पाप: । आत्मऽपराजित: । स: । ब्राह्मणस्‍य । गाम् । अद्यात् । अद्य । जीवानि । श्व: ॥१८.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 18; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (अक्षद्रुग्धः) इन्द्रियों से नष्ट किया हुआ, (पापः) पापी, (आत्मपराजितः) आत्मा से हारा हुआ (सः) वह (राजन्यः) क्षत्रिय (ब्राह्मणस्य) ब्राह्मण, वेदवेत्ता की (गाम्) वाणी को (अद्यात्) नाश करे, (अद्य) आज (जीवानि=जीवतु) वह जीवे, (श्वः) कल (मा) नहीं ॥२॥

    भावार्थ

    वेदविद्या पर न चलने से दुष्कर्मों के कारण अजितेन्द्रिय राजा का जीवन घट जाता है ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(अक्षद्रुग्धः) अक्षैरिन्द्रियैर्नाशितः। अजितेन्द्रियः (राजन्यः) राजा (पापः) पाप−अर्शआद्यच्। दुष्टः (आत्मपराजितः) आत्मना पराभूतः (सः) (ब्राह्मणस्य) वेदवेत्तुः विप्रस्य (गाम्) वाणीम् (अद्यात्) भक्षयेत् (अद्य) अस्मिन् दिने (मा) निषेधे (श्वः) आगामिनि दिवसे ॥

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    विषय

    अक्षदुग्ध राजन्य

    पदार्थ

    १. (अक्षगुग्ध:) = अपनी इन्द्रियों से ही (जिघांसित) = विषयासक्ति के कारण पाप की ओर ले जाया गया (राजन्य:) = क्षत्रिय राजा (पाप:) = पापमय जीवनवाला होता है। (आत्मपराजित) = वह अपने से ही पराजित हुआ-हुआ होता है, उसकी इन्द्रियाँ तथा मन ही उसे हरा देते हैं, वह इनका दास बन जाता है। २. नासमझी के कारण यह राष्ट्र के ज्ञानी ब्राह्मणों की वाणी पर प्रतिबन्ध लगाने की सोचता है, जिससे वे उसके उच्छल जीवन पर कोई टीका-टिप्पणी न कर दें, परन्तु (स:) = वह पापी राजा (ब्राह्मणस्य गाम्) = इस ज्ञानी ब्राह्मण की वाणी को यदि (अद्यात्) = खाये तो वह निश्चय से यह समझ ले कि (अध जीवानि) = आज बेशक जी ले (न श्वः) = कल न जी पाएगा,अर्थात् इसका शीघ्र ही बिनाश हो जाएगा।

    भावार्थ

    जो विलासी राजा ज्ञानी ब्राह्मणों की वाणी पर प्रतिबन्ध लगाता है, इस वाणी का ध्वंस करके बह देर तक जीवित नहीं रहता।

     

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    भाषार्थ

    (अक्षद्रुग्धः) निज इन्द्रियों द्वारा द्रोह-प्राप्त अर्थात हिंसित, (पापः) पापी, (आत्मपराजितः) स्वयमेव पराजित ( राजन्य:) राजा है, (स:) वह (ब्राह्मणस्य) वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञ की (गाम्) परामर्श वाणी को (अद्यात्) यदि खा ले, तदनुसार शासन न करे, तो वह जाने कि (अद्य) आज तो (जीवानि) सम्भवतः मैं जीवित रह सकूं (मा श्व:) कल नहीं।

    टिप्पणी

    [अक्षद्रुग्धः= अथवा न्यायसभा द्वारा द्रुग्ध। यथा "अक्षपटलम्= A court of law (आप्ट), न्यायालय। अक्ष= इन्द्रिय [सुप्रसिद्ध]। आत्मपराजित:= अपने कर्मों द्वारा स्वयम् पराजित। अद्=To Destroy (नष्ट कर देना), परामर्शवाणी को नष्ट कर देना, उसका उपयोग न करना।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brahma Gavi

    Meaning

    If the ruler of the people is sinful, spiritually broken by sensual indulgence, creates hate and division among people for personal gain and gambles with their interests, and if he violates the Brahmana’s Cow, then he may last for today but not tomorrow. Tomorrow he must go.

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    Translation

    If a prince, spoiled at dice, miserable and self-defeated, eats up an intellectual's cow, may he, living today, not be living tomorrow.

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    Translation

    A base King spoiled of dice, self-defeated and self-frustrated if eat of the cow of Brahmana should realize...... let me live today, not tomorrow.

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    Translation

    A voluptuous, sinful, spiritually degraded king, who destroys the Vedic knowledge of a learned person, may live for today, but not tomorrow.

    Footnote

    A king who is opposed to the spread of Vedic knowledge cannot enjoy a long life.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(अक्षद्रुग्धः) अक्षैरिन्द्रियैर्नाशितः। अजितेन्द्रियः (राजन्यः) राजा (पापः) पाप−अर्शआद्यच्। दुष्टः (आत्मपराजितः) आत्मना पराभूतः (सः) (ब्राह्मणस्य) वेदवेत्तुः विप्रस्य (गाम्) वाणीम् (अद्यात्) भक्षयेत् (अद्य) अस्मिन् दिने (मा) निषेधे (श्वः) आगामिनि दिवसे ॥

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