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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 27 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - इळा, सरस्वती, भारती छन्दः - बृहतीगर्भा त्रिष्टुप् सूक्तम् - अग्नि सूक्त
    129

    ऊ॒र्ध्वा अ॑स्य स॒मिधो॑ भवन्त्यू॒र्ध्वा शु॒क्रा शो॒चींष्य॒ग्नेः। द्यु॒मत्त॑मा सु॒प्रती॑कः॒ ससू॑नु॒स्तनू॒नपा॒दसु॑रो॒ भूरि॑पाणिः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऊ॒र्ध्वा: । अ॒स्य॒ । स॒म्ऽइध॑: । भ॒व॒न्ति॒ । ऊ॒र्ध्वा । शु॒क्रा । शो॒चीषि॑ । अ॒ग्ने: । द्यु॒मत्ऽत॑मा । सु॒ऽप्रती॑क: । सऽसू॑नु: । तनू॒ऽनपा॑त् । असु॑र: । भूरि॑ऽपाणि: ॥२७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऊर्ध्वा अस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचींष्यग्नेः। द्युमत्तमा सुप्रतीकः ससूनुस्तनूनपादसुरो भूरिपाणिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ऊर्ध्वा: । अस्य । सम्ऽइध: । भवन्ति । ऊर्ध्वा । शुक्रा । शोचीषि । अग्ने: । द्युमत्ऽतमा । सुऽप्रतीक: । सऽसूनु: । तनूऽनपात् । असुर: । भूरिऽपाणि: ॥२७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 27; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    पुरुषार्थ का उपदेश।

    पदार्थ

    (अस्य) उस (अग्नेः) विद्वान् पुरुष की (समिधः) विद्या आदि प्रकाश क्रियायें (ऊर्ध्वाः) ऊँची, और (शुक्रा) अनेक वीर कर्म और (शोचींषि) तेज (ऊर्ध्वा) ऊँचे (भवन्ति) होते हैं [जो विद्वान्] (द्युमत्तमा) अतिशय प्रकाशवाला, (सुप्रतीकः) बड़ी प्रतीतिवाला (ससूनुः) प्रेरक अर्थात् प्रधान पुरुषों के साथ वर्त्तमान (तनूनपात्) विस्तृत पदार्थों का न गिरानेवाला (असुरः) बड़ी बुद्धिवाला, और (भूरिपाणिः) बहुत व्यवहारों में हाथ रखनेवाला होता है ॥१॥

    भावार्थ

    जो विद्वान् मनुष्य महागुणी और बहुक्रियाकुशल होता है, वह संसार में उन्नति करता है ॥१॥ यह सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है−अ० २७। म० ११-२२ ॥

    टिप्पणी

    १−(ऊर्ध्वाः) उन्नताः (अस्य) प्रसिद्धस्य (समिधः) विद्यादिप्रकाशक्रियाः (भवन्ति) (ऊर्ध्वा) उन्नतानि (शुक्रा) अ० २।११।५। शुक्राणि वीर्याणि (शोचींषि) अ० १।१२।२। तेजांसि (अग्नेः) विदुषः पुरुषस्य (द्युमत्तमा) दिव्−मतुप्, तमप्। विभक्तेराकारः। द्युमत्तमः। अतिशयेन प्रकाशवान् (सुप्रतीकः) अ० ४।२१।६। शोभनप्रतीतिवान् (ससूनुः) सुवः कित्। उ० ३।३५। इति षू प्रेरणे−नु। सवितृभिः प्रेरकैः प्रधानैः सह वर्तमानः (तनूनपात्) अ० ५।१२।२। तनूनां विस्तृतानां पदार्थानां न पातयिता (असुरः) अ० १।१०।१। असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वम्−निरु० १०।३४। प्रशस्यप्रज्ञावान् (भूरिपाणिः) भूरिषु व्यवहारेषु पाणिर्हस्तो यस्य सः। बहुव्यवहारकुशलः ॥

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    विषय

    ब्रह्मा का लक्षण

    पदार्थ

    १. (अस्य अग्नेः) = [अग्निः अग्रणी:] इस आगे-और-आगे बढ़नेवाले की (समिधः) = दीतियाँ (ऊर्ध्वा:) = उत्कृष्ट (भवन्ति) = होती हैं। इसकी सब इन्द्रियाँ शक्तियों से दीस होती हैं। इस अग्नि की (शुक्रा) = अत्यन्त शुद्ध (शोचीषि) = मानस पवित्रताएँ (ऊर्ध्वा भवन्ति) = उत्कृष्ट होती हैं। इसका शरीर नीरोग व शक्ति-सम्पत्र होता है तो मन भी पूर्ण निर्मल। इसकी ज्ञान-दीतियाँ भी (द्युमत्तमा) = अतिशयेन दीप्तिवाली होती है। २. इसप्रकार यह अग्नि (सुप्रतीक:) = तेजस्वी, शोभन मुखबाला (स-सूनुः) = उत्तम सन्तानों से युक्त (तनूनपात्) = शरीर के स्वास्थ्य को न गिरने देनेवाला, (असुरः) = अपने में प्राणशक्ति का सञ्चार करनेवाला, (भूरिपाणिः) = पालक व पोषक हाथोंवाला होता है।

    भावार्थ

    ब्रह्मा वह है जिसकी तेजस्विता, मानस पवित्रता व ज्ञानदीप्ति उत्कृष्ट है, जो उत्तम मुखवाला, उत्तम सन्तानवाला, स्वस्थ, प्राणशक्ति-सम्पन्न व रक्षक हाथोंवाला है।

     

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    भाषार्थ

    (अस्य अग्नेः) इस महानग्नि की ( समिध:) समिधाएँ (भवन्ति) होती हैं (ऊर्ध्वा:) ऊर्ध्वदिशा में [सूर्यरश्मिरूप]; (ऊर्ध्वा) ऊर्ध्वदिशा में होती हैं (द्युमत्तमा) अत्यन्त द्युतिवाली (शुक्रा) पवित्र या चमकती हुई (शोचींषि) ज्योतियाँ [नक्षत्र-तारारूप], (सुप्रतीक:) महानग्नि उत्तम स्वरूप है। (ससूनुः) पुत्ररूप आदित्य के साथ रहता है, (तनूनपात्) सूर्य-रूपी तनू को गिरने नहीं देता [आकाश में थामे हुआ है] (असुरः) प्रज्ञा वान् है, (भूरिपाणि:) महाहस्त है [दान देने में] ।

    टिप्पणी

    [संसार का वर्णन यज्ञरूप में किया है। अग्नि है महानग्नि परमेश्वर। यथा 'अथैनं महान्तमात्मानमेषर्ग्गणः प्रवदतीन्द्रं मित्रं वरुणमन्निमाहूरिति (ऋ० १।१६४।४६); (निरुक्त अ० १३ (१४) । पा: २ (१) । खं० १५ (२ ) तथा (निरुक्त ७।४।१८) । ऊर्ध्वा शुक्रा= ऊर्ध्वानि शुक्राणि। द्युमत्तमा= द्युमत्तमानि । प्रतीकम् = मुखम् । सूनु:= सूर्य परमेश्वर द्वारा उत्पन्न, अतः सूनुः। तनूनपात्=तनू + न + पात् ( पतनम् ) सूर्य मानो परमेश्वर की तनू है और इसकी आत्मा है परमेश्वर, "योsसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। ओ३म् खं ब्रह्म" (यजु:० ४०।१७)। असुरः= असु प्रज्ञानाम (निघं० ३।९) +रः (मत्वर्थीयः)। भूरिपाणि:= "सं गृभाय पुरु शतोभयाहस्त्या वसु शिशीहि राय आ भर" (अथर्व० २०।५६।४)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Agni and Dynamics of Yajna

    Meaning

    High are the fuel sticks of this Agni in flames, high, radiant and pure its lights. Most refulgent, most glorious, assisted by many noble active forces, it is infallible and inviolable in body, highly energetic and boundless in power and force. (Agni is a metaphor. It stands for self-refulgent Divinity, brilliant leader, sagely scholar and any such other leading power.)

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    Subject

    Agnih (Apri-Hymn)

    Translation

    Uplifting are the kindling woods of this fire divine; uplifting and most enlightening are the brilliant glows of this, who is of fair face, accompanied with offspring, preserver of bodies, bestower of life and liberal handed. (also Yv. XXVII.11) (Samidha)

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    Translation

    Let the fuel-sticks of this fire of yajna be uplifted enkindled with fire, let the flames of it be lofty and brilliant this fire is splendidly bright, of tood and colors, with many other active forces, of the nature of maintaining the bodies of the objects, active with vital airs and it works out its activities like a man who has many hands.

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    Translation

    Lofty are the worlds like Sun, Moon, of this Refulgent God. Upliftedare His brilliant, shining lights. God is beautiful, coupled with all his off-spring, the protector of all heavenly bodies, the possessor of the strength ofmyriad hands.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(ऊर्ध्वाः) उन्नताः (अस्य) प्रसिद्धस्य (समिधः) विद्यादिप्रकाशक्रियाः (भवन्ति) (ऊर्ध्वा) उन्नतानि (शुक्रा) अ० २।११।५। शुक्राणि वीर्याणि (शोचींषि) अ० १।१२।२। तेजांसि (अग्नेः) विदुषः पुरुषस्य (द्युमत्तमा) दिव्−मतुप्, तमप्। विभक्तेराकारः। द्युमत्तमः। अतिशयेन प्रकाशवान् (सुप्रतीकः) अ० ४।२१।६। शोभनप्रतीतिवान् (ससूनुः) सुवः कित्। उ० ३।३५। इति षू प्रेरणे−नु। सवितृभिः प्रेरकैः प्रधानैः सह वर्तमानः (तनूनपात्) अ० ५।१२।२। तनूनां विस्तृतानां पदार्थानां न पातयिता (असुरः) अ० १।१०।१। असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वम्−निरु० १०।३४। प्रशस्यप्रज्ञावान् (भूरिपाणिः) भूरिषु व्यवहारेषु पाणिर्हस्तो यस्य सः। बहुव्यवहारकुशलः ॥

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