अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 8
अ॒पां मा॒ पाने॑ यत॒मो द॒दम्भ॑ क्र॒व्याद्या॑तू॒नां शय॑ने॒ शया॑नम्। तदा॒त्मना॑ प्र॒जया॑ पिशा॒चा वि या॑तयन्तामग॒दो॒यम॑स्तु ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒पाम् । मा॒ । पाने॑ । य॒त॒म: । द॒दम्भ॑ । क्र॒व्य॒ऽअत् । या॒तू॒नाम् । शय॑ने । शया॑नम् । ॥२९.८॥
स्वर रहित मन्त्र
अपां मा पाने यतमो ददम्भ क्रव्याद्यातूनां शयने शयानम्। तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदोयमस्तु ॥
स्वर रहित पद पाठअपाम् । मा । पाने । यतम: । ददम्भ । क्रव्यऽअत् । यातूनाम् । शयने । शयानम् । ॥२९.८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
शत्रुओं और रोगों के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(यतमः) जिस किसी (क्रव्यात्) मांसभक्षक ने (अपाम्) जल के (पाने) पान करने में (यातूनाम्) यात्रियों के (शयने) शयन स्थान में (शयानम्) सोते हुए (मा) मुझ को (ददम्भ) ठगा है। (तत्) उससे.... म० ६ ॥८॥
टिप्पणी
८−(अपाम्) जलानाम् (मा) माम् (पाने) पानकरणे (यतमः) (ददम्भ) (क्रव्यात्) अ० २।२५।५। मांसभक्षकाः (यातूनाम्) कमिमनिजनि०। उ० १।७३। इति या प्रापणे−तु। गन्तॄणाम्। पथिकानाम् (शयने) शय्यास्थाने (शयानम्) स्वपन्तम् ॥
विषय
क्षीरे, मन्थे अपां पाने, शयने
पदार्थ
१. (यतमः) = जो भी कोई रोगजन्तु (क्षीरे) = दूध में, (मन्थे) = मठे में, (अकृष्टपच्ये धान्ये) = बिना खेती किये उत्पन्न हुए अन्न में, तथा (य:) = जो (अशने) = भोजन में प्रविष्ट होकर (मा ददम्भ) = मुझे हिसित करता है। २. (यातूनाम्) = यातना देनेवालों में (यतमः क्रव्यात) = जो मांसभक्षक कृमि (अपां पाने) = जलों का पान करने में अथवा (शयने शयानं मा) = बिस्तर पर सोते हुए मुझे (ददम्भ) = हिंसित करता है, ३. (यातूनां यतमः) = पीड़ा देनेवालों में जो भी (क्रव्यात्) = मांसाहारी कृमि (दिवा नक्तम्) = दिन-रात के समय में (शयने शयानम्) = बिस्तर पर सोये हुए (मा ददम्भ) = मुझे हिंसित करता है, (तत्) = वह पिशाच (आत्मना प्रजया) = स्वयं और अपनी सन्ततिसहित विनष्ट हो जाए। (पिशाचा:) = सब रोगजन्तु (वियातयन्ताम्) = नाना प्रकार से पीड़ा को प्राप्त होकर शरीर को छोड़ जाएँ। (अयं अगदः अस्तु) = यह पुरुष नीरोग हो जाए।
भावार्थ
भोजन में, जलों में या दिन व रात में सोने के समय जो भी रोगकमि हमारी हिंसा का कारण बनता है, वह कृमि नष्ट हो जाए और हमारे शरीर नीरोग बनें।
भाषार्थ
(यातूनाम्) यातना देनेवाले रोज-जीवाणुओं में (यतमः) जिस किसी (क्रव्याद्) कच्चामांस खानेवाले रोग-जीवाणु ने, ( शयने शयानम् ) शय्या में सोते हुए, या (अपाम् पाने) जलपान में ( माँ ददम्भ ) मुझे हिंसित किया है, रुग्ण किया है, (तत् ) तो वह क्रव्याद, तथा अन्य (पिशाचा: ) सव मांस- भक्षक रोग-जीवाणु भी, (आत्मना) निजस्वरूप से, (प्रजया) तथा सन्तानों से (वियातयन्ताम् ) वियुक्त कर दिये जाएं और (अयम् ) यह रुग्ण (अगद:) रोगरहित (अस्तु) हो जाय। [क्रव्याद्=क्रव्य=हिंसा द्वारा प्राप्त कच्चा मांस +अद भक्षणे । कृवि हिंसायाम् (भ्वादि)। क्रव्याद् और पिशाच समानार्थक हैं। कच्चा मांस है शरीरस्थ मांस, जिसे कि रोग-जीवाणु रुग्ण करते हैं। राष्ट्राधिपति के सम्बन्ध में मन्त्रार्थ, पूर्ववत्।]
विषय
रोगों का नाश करके आरोग्य होने का उपाय।
भावार्थ
(यातूनाम्) यातना देने वालों में से (यतमः) जो कोई (क्रव्यात्) कच्चा मांस खाने वाले रोग जन्तु (अपां पाने) जलों के पान करने के स्थान, घाट, बावड़ी, प्याऊ आदि में और (शयने) विस्तर में (मां शयानं) सोते हुए मुझको (ददम्भ) विनाश करने का यत्न करता है (तत् आत्मना०) वह स्वयं अपनी सन्तानों सहित नष्ट हो और यह रोगी नीरोग हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
चातन ऋषिः। जातवेदा मन्त्रोक्ताश्व देवताः। १२, ४, ६-११ त्रिष्टुमः। ३ त्रिपदा विराड नाम गायत्री। ५ पुरोतिजगती विराड्जगती। १२-१५ अनुष्टुप् (१२ भुरिक्। १४, चतुष्पदा पराबृहती ककुम्मती)। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Destruction of Germs and Insects
Meaning
Of the flesh eating damagers, whatever germs of waters in our drink damage us, and whatever bugs or germs in bed infect the person sleeping there, let these be countered and destroyed in themselves and with their further growth, and let the person affected be restored to good health.
Translation
Whosoever a flesh-eater injures me through drinking waters lying in the bed of severe pains, let those blood-suckers along with their progeny be removed. May this person be free from disease.
Translation
If any germ eating flesh injure me intering in draught of water and injure me when I am sleeping on the bed of travelers let these germs with their lives, their offspring’s be terrorized and Jet the man affected will be healthy.
Translation
If some flesh-consuming germ, entering the drinking water, or my bed while sleeping on the ground with travelers, hath injured me, let the germs with their lives and offspring be destroyed, so that this man be free from disease.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
८−(अपाम्) जलानाम् (मा) माम् (पाने) पानकरणे (यतमः) (ददम्भ) (क्रव्यात्) अ० २।२५।५। मांसभक्षकाः (यातूनाम्) कमिमनिजनि०। उ० १।७३। इति या प्रापणे−तु। गन्तॄणाम्। पथिकानाम् (शयने) शय्यास्थाने (शयानम्) स्वपन्तम् ॥
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