Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 5 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वा देवता - लाक्षासूक्तम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - लाक्षा
    45

    वृ॒क्षंवृ॑क्ष॒मा रो॑हसि वृष॒ण्यन्ती॑व क॒न्यला॑। जय॑न्ती प्रत्या॒तिष्ठ॑न्ती॒ स्पर॑णी॒ नाम॒ वा अ॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वृ॒क्षम्ऽवृ॑क्षम् । आ । रो॒ह॒सि॒ । वृ॒ष॒ण्यन्ती॑ऽइव । क॒न्यला॑ । जय॑न्ती । प्र॒ति॒ऽआ॒तिष्ठ॑न्ती । स्पर॑णी । नाम॑ । वै । अ॒सि॒ ॥५.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वृक्षंवृक्षमा रोहसि वृषण्यन्तीव कन्यला। जयन्ती प्रत्यातिष्ठन्ती स्परणी नाम वा असि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वृक्षम्ऽवृक्षम् । आ । रोहसि । वृषण्यन्तीऽइव । कन्यला । जयन्ती । प्रतिऽआतिष्ठन्ती । स्परणी । नाम । वै । असि ॥५.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्म विद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (वृक्षंवृक्षम्) प्रत्येक स्वीकारयोग्य पदार्थ में (आ) सब प्रकार (रोहसि) तू प्रकट है, (वृषण्यन्ती इव) जैसे ऐश्वर्यवान् सूर्य को चाहनेवाली (कन्यला) प्रकाश पानेहारी उषा [सूर्य में] है। (जयन्ती) जप करनेहारी (प्रत्यातिष्ठन्ती) प्रत्यक्ष स्थिर रहनेहारी और (स्परणी) प्रीति करनेवाली शक्ति (नाम) नाम (वै) अवश्य (असि) तू है ॥३॥

    भावार्थ

    वह सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी प्रत्येक वस्तु में ऐसा प्रीति से रम रहा है, जैसे उषा सूर्य्य में ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(वृक्षंवृक्षम्) वृक्ष स्वीकारे−पचाद्यच्। प्रत्येकं वरणीयं पदार्थम् (आ)। समन्तात् (रोहसि) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च। प्रकटोऽसि (वृषण्यन्ती) वृषन्−अ० १।१२।१। सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। इति क्यच्−शतृ। वृषाणं सूर्यमिच्छन्ती (इव) यथा (कन्यला) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति कनी दीप्तिकान्तिगतिषु−यक्, ला आदाने−क टाप्। प्रकाशाग्निहोत्री। उषाः (जयन्ती) तॄभूवहिवसि०। उ०। ३।१२८। इति जि जये−झच्, ङीष्। विजया (प्रत्यातिष्ठन्ती) ष्ठा−शतृ। प्रत्यक्षेण स्थात्री (स्परणी) स्पृ प्रीतिपालनयोः−ल्युट्, ङीप्। प्रीणयित्री (नाम) (वै) (असि) ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    जयन्ती स्परणी

    पदार्थ

    १. हे लाक्षे! तू (वृषण्यन्तीव कन्यला इव) = पति की अभिलाषा करनेवाली कन्या की भौति वृक्ष (वृक्षं आरोहसि) = प्रत्येक वृक्ष पर आरोहण करती है। २. (जयन्ती) = तु रोगों को जीतनेवाली है। (प्रति आतिष्ठन्ती) = प्रत्येक रोग का मुकाबला करनेवाली है। (वा) = निश्चय से (स्परणी नाम असि) = स्परणी नामवाली है [to deliver from] रोगों से मुक्त करनेवाली है, [to proleet] रोगों के आक्रमण से रक्षित करनेवाली है, [to gratify] प्रीति का कारण बननेवाली है, [स्प प्रीतिपालनयो:] नीरोगता देकर प्रीति उत्पन्न करनेवाली है।

     

    भावार्थ

    'लाक्षा' वृक्षों पर आरोहण करती है, रोगमुक्त करके प्रीति प्रदान करती है, जयन्ती है, स्परणी है। रोगों का मुकाबला करनेवाली प्रत्यातिष्ठन्ती है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    हे लाक्षा ! (वृक्षं वृक्षम् ) वृक्ष-वृक्ष पर (आ रोहसि) तू आरोहण१ करती है, (इव) जैसे (वृषण्यन्ती) पति को चाहती हुई (कन्यला) कमनीया कन्या२। (जयन्ती) घावों पर विजय पाती हुई, (प्रत्यातिष्ठन्ती) उन घावों की प्रतिकूलता में स्थित हुई, (स्परणी) सेवा करनेवाली ( नाम वे असि) प्रसिद्ध तू है।

    टिप्पणी

    ["वृक्षवृक्षम्"= यथा (मन्त्र ५)। स्परणी= स्पृ प्रीतिसेवनयोः (स्वादिः)। जयन्ती, घावों पर विजय (मन्त्र ४) पाने वाली।] [१. लाक्षा का वृक्ष-वृक्ष पर आरोहरण करने का अभिप्राय है, वृक्षों से पैदा होना ( मन्त्र ४), नकि लता के सदृश वृक्षों पर चढ़ना । २. 'वृषण्यति कन्या' के साथ क्रिया अपेक्षित है जोकि "आरोहति" सम्भव है। विवाह विधि में कन्या का अश्मारोहण, अर्थात् शिलारोहण होता है, वह ही आरोहण यहाँ अभिप्रेत है। यथा "आरोहेममअथ्मानमश्मेव त्वं स्थिरा भव। अभि तिष्ठ पृतन्यतोऽवबावस्व पृतनायतः" पारस्करगृहासूत्र १।७।१ तथा "स्योनं ध्रुवं प्रजायै धारयामि तेऽश्मानं देव्या: पृथिव्या उपस्थे। तमा तिष्ठानुमाद्या सुवर्चा दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु। (अथर्व० १४।१। ४७)।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Laksha

    Meaning

    You cling and rise by every tree like a loving maiden eager for a lover in marriage. You are Jayanti, covering all over the tree, conquering the disease, Pratyatishthanti, staying strong by the tree, and your name is Sparani.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    You cling to each ana every tree like a passionate maiden; you are conquering, standing fast and, verily, sparani (the winner) by name.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    This clings close to every tree like a woman desiring husband. It is sure that this Laksha is the conqueror of diseases, rescuer from affection and it remains in the body for long.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Just as a girl longing for her husband, at the time of marriage resolves to seek his protection, so thou clingest close to every tree, and spreading thyself over it, coverest it, standest fast over it. Thy other name is sparni, the conqueror.

    Footnote

    It is called Sparni, as it conquers old age.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(वृक्षंवृक्षम्) वृक्ष स्वीकारे−पचाद्यच्। प्रत्येकं वरणीयं पदार्थम् (आ)। समन्तात् (रोहसि) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च। प्रकटोऽसि (वृषण्यन्ती) वृषन्−अ० १।१२।१। सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। इति क्यच्−शतृ। वृषाणं सूर्यमिच्छन्ती (इव) यथा (कन्यला) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति कनी दीप्तिकान्तिगतिषु−यक्, ला आदाने−क टाप्। प्रकाशाग्निहोत्री। उषाः (जयन्ती) तॄभूवहिवसि०। उ०। ३।१२८। इति जि जये−झच्, ङीष्। विजया (प्रत्यातिष्ठन्ती) ष्ठा−शतृ। प्रत्यक्षेण स्थात्री (स्परणी) स्पृ प्रीतिपालनयोः−ल्युट्, ङीप्। प्रीणयित्री (नाम) (वै) (असि) ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top