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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 7
    ऋषिः - अथर्वा देवता - लाक्षासूक्तम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - लाक्षा
    34

    हिर॑ण्यवर्णे॒ सुभ॑गे॒ शुष्मे॒ लोम॑शवक्षणे। अ॒पाम॑सि॒ स्वसा॑ लाक्षे॒ वातो॑ हा॒त्मा ब॑भूव ते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    हिर॑ण्यऽवर्णे । सुऽभ॑गे । शुष्मे॑ । लोम॑शऽवक्षणे । अ॒पाम् । अ॒सि॒ । स्वसा॑ । ला॒क्षे॒ । वात॑: । ह॒ । आ॒त्मा । ब॒भू॒व॒ । ते॒ ॥५.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हिरण्यवर्णे सुभगे शुष्मे लोमशवक्षणे। अपामसि स्वसा लाक्षे वातो हात्मा बभूव ते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हिरण्यऽवर्णे । सुऽभगे । शुष्मे । लोमशऽवक्षणे । अपाम् । असि । स्वसा । लाक्षे । वात: । ह । आत्मा । बभूव । ते ॥५.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 5; मन्त्र » 7
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    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्म विद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (हिरण्यवर्णे) हे तेजःस्वरूपिणी ! (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (शुष्मे) हे महाबलवाली ! (लोमशवक्षणे) हे छेदनशीलों पर रोषवाली ! (लाक्षे) हे दर्शनीयशक्ति परमात्मन् ! तू (अपाम्) व्यापक प्रजाओं की (स्वसा) अच्छे प्रकार प्रकाश करनेहारी (असि) है। (ते) तेरा (आत्मा) आत्मा (ह) निश्चय करके (वातः) व्यापक (बभूव) हुआ है ॥७॥

    भावार्थ

    महाधनी सर्वशक्तिमान् सर्वजनक परमेश्वर दुष्टों पर क्रोध करता है, इस से हम सदा उत्तम कर्म करते रहें ॥७॥ लोक में (लाक्षासूक्तम्) लाख वा लाह को भी कहते हैं ॥

    टिप्पणी

    ७−(हिरण्यवर्णे) हे तेजःस्वरूपे (सुभगे) हे शोभनैश्वर्ययुक्ते (शुष्मे) शुष्मं बलम्−२।९। अर्शआद्यच्। हे बलवति (लोमशवक्षणे) नामन्सीमन्व्योमन्लोमन्०। उ–––० ४।१५१। इति लूञ् छेदने−मनिन्। लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः। पा० ५।२।१००। इति लोम−श, मत्वर्थे। वक्ष रोषे−ल्युट्। हे लोमशेषु छेदनस्वभावेषु रोषशीले (अपाम्) व्याप्तानां प्रजानाम् (असि) (स्वसा) म० १। सुष्ठु दीपयित्री, (लाक्षे) गुरोश्च हलः। पा० ३।३।१०३। इति लक्ष दर्शनाङ्कनयोरालोचने च−अ, टाप्, पृषोदरादित्वाद्वृद्धिः। हे दर्शनीये शक्ते परमात्मन् (वातः) व्यापकः (ह) निश्चयेन (आत्मा) स्वरूपम् (बभूव) (ते) तव ॥

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    विषय

    सुभगा, शुष्मा

    पदार्थ

    १. (हिरण्यवर्णे) = सुवर्ण के समान वर्णवाली, (सुभगे) = उत्तम सौभाग्य की कारणभूत, (शुष्मे) = बलवाली-रोगरूप शत्रु के शोषक बल से सम्पन्न (लोमश-वक्षणे) = छेदनस्वभाववालों पर रोषवाली [लू छेदने, वक्ष रोषे] (लाक्षे) = लाक्षा नामक औषध! तू (अपाम् स्वसा असि) = प्रजाओं की स्वसा है, उन्हें उत्तम स्थिति में लानेवाली है [सु+अस्], रोग को दूर करके तू उन्हें सौभाग्यशाली बनाती है। २. (ह) = निश्चय से (वात:) = वायु ते आत्मा बभूव तेरा आत्मा है-वायु से ही तू पुष्ट होती है।

    भावार्थ

    लाक्षा 'हिरण्यवर्णा, सुभगा, शुष्मा, लोमशवक्षणा' है। यह हमारे घावों को भरकर तथा रोगों को दूर करके उत्तम स्थिति में प्रास कराती है।

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    भाषार्थ

    (हिरण्यवर्णे) हे सुवर्ण के सदृश वर्णवाली ! (सुभगे) हे सुन्दर रूपेश्वर्य-वाली ! (शुष्मे) हे बलशालिनी ! (लोमशवक्षणे) हे लोमभरी वक्षणाओं-वाली (लाक्षे) लाख ! तू (अपाम् ) उदकों की (स्वसा) बहिन (असि) है, (ह) निश्चय से (वातः) वायु (ते ) तेरी ( आत्मा) आत्मा (बभूव) हुई है ।

    टिप्पणी

    [शुष्मे; शुष्मम् बलनाम (निघं० २।९) । लाक्षा बलशालिनी है, यतः यह घावों को परास्त कर देती है, इसलिए इसे "जयन्ती" और "प्रत्यातिष्ठन्ती" कहा है (मन्त्र ३) । लोमशवक्षणे= लोमवाली नदियों-वाली। लोम होते हैं प्राणियों के शरीर पर, इसलिए लोमश का अर्थ भेड़ भी होता है, परन्तु मन्त्र में वक्षणाओं को लोमश कहा है। वक्षणा है नदी। यथा "वक्षणाः नदीनाम" (निघं० १।१३ ) । वैदिक साहित्य में शारीरिक रक्तनाड़ियों को भी नदियाँ कहा है। इसीलिए हृदय को "सिन्धु" और रक्त को "आप:" कहा है (अथर्व० १०।२।११) देखो अथर्ववेदभाष्य। घाव शरीर और शारीरिक नस-नाड़ियों में होते हैं, जिसकी ओषधि है लाक्षा (मन्त्र ४)। इसलिए लाक्षा है '"लोमशवक्षणा "। "अपां स्वसा" देखो (मन्त्र १)। वातः आत्मा= लाक्षा की उत्पत्ति होती है वृक्षों से और वृक्षों का अङ्कुरित होना, बढ़ना और फूलना-फलना वायुमण्डल पर निर्भर है, अतः वायुमण्डल आत्मा है वृक्षों का, और परम्परया आत्मा है वृक्षों से उत्पन्न लाक्षा का।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Laksha

    Meaning

    Laksha, golden hued, auspicious, powerful, hairy chested, you are the sister of waters as cleanser, and Vata, energy, is really your very soul.

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    Translation

    O gold-coloured, bringer of good fortune, potent, and hairybodied, you are sister of waters. O lac (làksa), the wind is, verily, your soul. (Láksà = a plant on which the cochineal insect, which produces the red dye is found)

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    Translation

    This Laksha is golden-colored, beautiful, Powerful and hairy-bodied. This is the sister of water and wind is its soul.

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    Translation

    Gold-colored, lustrous, adorous, hairy-bodied one, the sister of the waters art thou, O lac, thy soul is wind!

    Footnote

    Sisters of waters: It melts in waters, und leaves its juice in them, Thy soul is wind: It is solidified and strengthened by the wind.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(हिरण्यवर्णे) हे तेजःस्वरूपे (सुभगे) हे शोभनैश्वर्ययुक्ते (शुष्मे) शुष्मं बलम्−२।९। अर्शआद्यच्। हे बलवति (लोमशवक्षणे) नामन्सीमन्व्योमन्लोमन्०। उ–––० ४।१५१। इति लूञ् छेदने−मनिन्। लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः। पा० ५।२।१००। इति लोम−श, मत्वर्थे। वक्ष रोषे−ल्युट्। हे लोमशेषु छेदनस्वभावेषु रोषशीले (अपाम्) व्याप्तानां प्रजानाम् (असि) (स्वसा) म० १। सुष्ठु दीपयित्री, (लाक्षे) गुरोश्च हलः। पा० ३।३।१०३। इति लक्ष दर्शनाङ्कनयोरालोचने च−अ, टाप्, पृषोदरादित्वाद्वृद्धिः। हे दर्शनीये शक्ते परमात्मन् (वातः) व्यापकः (ह) निश्चयेन (आत्मा) स्वरूपम् (बभूव) (ते) तव ॥

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