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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 8
    ऋषिः - अथर्वा देवता - लाक्षासूक्तम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - लाक्षा
    37

    सि॑ला॒ची नाम॑ कानी॒नोऽज॑बभ्रु पि॒ता तव॑। अश्वो॑ य॒मस्य॒ यः श्या॒वस्तस्य॑ हा॒स्नास्यु॑क्षि॒ता ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सि॒ला॒ची । नाम॑ । का॒नी॒न: । अज॑ऽबभ्रु । पि॒ता । तव॑ । अश्व॑: । य॒मस्य॑ । य: । श्या॒व: । तस्य॑ । ह॒ । अ॒स्ना । अ॒स‍ि॒ । उ॒क्षि॒ता ॥५.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सिलाची नाम कानीनोऽजबभ्रु पिता तव। अश्वो यमस्य यः श्यावस्तस्य हास्नास्युक्षिता ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सिलाची । नाम । कानीन: । अजऽबभ्रु । पिता । तव । अश्व: । यमस्य । य: । श्याव: । तस्य । ह । अस्ना । अस‍ि । उक्षिता ॥५.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 5; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्म विद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (सिलाची) सब में मेल रखनेवाली शक्ति (नाम) तू प्रसिद्ध है। (तव) तेरा (पिता) पालनेवाला गुण (कानीनः) कन्या अर्थात् कमनीय शक्ति [परमेश्वर] से आया हुआ, (अजबभ्रु) जीवात्माओं का पोषक है। (यमस्य) सर्वनियामक परमेश्वर का (यः) जो (श्यावः) गतिशील (अश्वः) व्यापक गुण है, (तस्य) उसके (अस्ना) प्रकाश से (ह) निश्चय करके तू (उक्षिता) सींची हुई (असि) है ॥८॥

    भावार्थ

    परमेश्वर के सर्वरक्षक आदि गुणों को विचार कर मनुष्य सदा उन्नति करें ॥८॥

    टिप्पणी

    ८−(सिलाची) म० १। सिलेन श्लेषेण संसर्गेण गतिशीला (नाम) प्रसिद्धौ (कानीनः) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति कनी दीप्तिकान्तिगतिषु−यक्, टाप्। इति कन्या कमनीया। कन्यायाः कनीन च। पा० ४।१।११६। इति कन्या−अण्, कनीन आदेशः। कन्यायाः कमनीयायाः शक्तेः परमेश्वराज्जाता (अजबभ्रु) अजः−अ० ४।१५।१। अजन्मा गतिशीलो वा जीवात्मा। कुर्भ्रश्च। उ० १।˜२२। इति डुभृञ् धारणपोषणयोः−कु, द्वित्वं च। विभक्तेर्लुक्। अजानां जीवात्मनां बभ्रुर्भर्ता पोषकः (पिता) रक्षको गुणः (तव) (अश्वः) व्यापको गुणः (यमस्य) अ० १।१४।२। नियामकस्य परमेश्वरस्य (यः) (श्यावः) कॄगॄशॄदृभ्यो वः। उ० १।१५५। इति श्यैङ् गतौ−व। गतिशीलः (तस्य) अश्वस्य (ह) निश्चयेन (अस्ना) असु क्षेपणे, यद्वा अस दीप्तौ−ऋजि। पद्दन्नोमास्। पा० ६।१।६३। इति असृज् शब्दस्य असन् टाविभक्तिः। प्रकाशेन (असि) (उक्षिता) सिञ्चिता प्रवर्धिता ॥

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    विषय

    'अजबभ्रू'लाक्षा

    पदार्थ

    १. हे लाक्षे! तू (सिलाची नाम) = [शिल श्लेषे, अञ्चु पूजायाम्] घावों को मिला देने में पूजित है, इसी से सिलाची नामवाली है। हे (अजबभ्रू) = [अज क्षेपणे, भृ धारणे] मलों के क्षेपण के द्वारा हमारा धारण करनेवाली लाक्षे! (कानीन:) = अतिशयेन दीसिवाला यह सूर्य (तव पिता) = तेरा पिता है, सूर्य की दीप्ति से ही वृक्षों से यह स्राव उत्पन्न होता है जो लाक्षा के रूप में वहाँ जम जाता है। २. (यमस्य) = उस सर्वनियन्ता प्रभु का (य:) = जो (श्याव:) = गतिशल [श्यै गतौ] यह (अश्वः) = घोड़े के समान सूर्य है अथवा सूर्य-किरण है (तस्य) = उसकी (अस्ना) = दीप्ति से [अस् दीसी] (ह) = ही (उक्षिता असि) = तू सिक्त होती है, अर्थात् सूर्य-किरणों की चमक से वृक्षों की त्वचा का सम्पर्क होने पर यह स्राव-सा निकलता है। यह कहलाता ही 'द्रुमामय' है। यही लाक्षा है।

    भावार्थ

    लाक्षा व्रणों के फटाव को मिलानेवाली है। यह मल-विक्षेप द्वारा हमारा धारण करती है। यह सूर्य-किरणों की दीप्ति के सम्पर्क से वृक्ष-त्वचा से खत होती है।

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    भाषार्थ

    (सिलाची नाम) तू प्रसिद्ध सिलाची है; (कानीनः) दीप्तिमान् सूर्य से उत्पन्न, (अजबभ्रु) गतिमान् और भरण-पोषण करनेवाला मेघ [हे लाक्षा !] (तव पिता) तेरा पिता है [ यतः पितामह है अर्यमा, आदित्य (मन्त्र १ ) ] । (यमस्य ) जगन्नियन्ता का (यः) जो (श्यावः) गतिशील (अश्वः) अश्व है, (तस्य) उस अश्व के (अस्ना या आस्ना) मुख द्वारा ( ह ) निश्चय से [हे लाक्षा !] (उक्षिता) सींची गई ( असि) तू है। [कई शाखाग्रन्थों में सिलाची१ के स्थान में घृताची२ पाठ है । ]

    टिप्पणी

    [कानीनः=कनी दीप्तिकान्तिगतिषु (भ्वादिः), कनीन:= सूर्यः, तस्य पुत्रः कानीनः मेघः। अजबभ्रु= मेघः, अज ( गतौ, भ्वादिः) +बभ्रु (डुभृञ्) धारणपोषणयोः (जुहोत्यादिः)। श्यावः अश्वः=आदित्यः, यथा "एकोऽअश्वो वहति सप्तनामा" (ऋ० १।१६४।२), तथा "एको अश्वो वहति सप्तनामादित्यः” (निरुक्त ४।४।२७)। श्याव:=श्यैङ् गतौ (भ्वादिः), आदित्य गतिशील है, पूर्व से पश्चिम की ओर गति करता प्रतीत होता है। मन्त्र में लाक्षा का वर्णन है। उसका पिता है मेघ (मन्त्र १)। अश्व है सूर्य, उसका मुख है मेघ। मुख से मुखरस अर्थात् मुखजल पैदा होता है, इसी प्रकार मेघ से वर्षाजल प्राप्त होता है, इसलिए मेघ को मुख कहा है। यह मेध सूर्य-सम्बन्धी है, सूर्य का मानो अवयवरूप है, मुखरूप है। इस मुखरस द्वारा लाक्षा सिंचित होती है। सिंचित तो होते हैं वृक्ष, लाक्षा वृक्षों से पैदा होती है, अतः वृक्षनिष्ठलाक्षा मानो सिंचित हुई है (मन्त्र ९)।] [१. सिलाची= सिला, सिरा=नाड़ी (उणा० २।१३), सिनाति बध्नाति मांसरुधिरा-दिकमिति सिरा, नाड़ी (दयानन्द) तामचति, गच्छति प्राप्नोति इति सिरा लाक्षा। नाड़ी के क्षत-विक्षत के उपचार में लाक्षा का प्रयोग होता है (मन्त्र ४)। २. घृताची=घृतम् उदकनाम (निघं० १।१२)+अच् गतौ, प्राप्तिः। लाक्षा उदक-धारा को प्राप्त कर उत्पन्न होती है।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Laksha

    Meaning

    Laksha, silachi by name, refreshing and energetic, your origin is Ajababhru, and you are sprinkled with the showers of the waves of light from the sun which is the child of Yama, lord of the laws of life.

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    Translation

    Silachi is your name. O goat-brown, your begetter is beneficial for eye-balls. Verily, you have been sprinkled with the blood of the fast moving horse of the ordainer Lord (Yama).

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    Translation

    The name of this Laksha is silachi and the splendid, goat-brown sun is its father, the Producing agent. It is produced by the glamour of whatever is called the all-pervading heat of fire.

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    Translation

    Silachi is thy name, thy sire is full of luster, and the ripener of corns. Thou hast been sprinkled by the multi-colored horse of the Sun.

    Footnote

    Multi-colored horse: Rays of the sun of seven different colors. Sire: The sun.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(सिलाची) म० १। सिलेन श्लेषेण संसर्गेण गतिशीला (नाम) प्रसिद्धौ (कानीनः) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति कनी दीप्तिकान्तिगतिषु−यक्, टाप्। इति कन्या कमनीया। कन्यायाः कनीन च। पा० ४।१।११६। इति कन्या−अण्, कनीन आदेशः। कन्यायाः कमनीयायाः शक्तेः परमेश्वराज्जाता (अजबभ्रु) अजः−अ० ४।१५।१। अजन्मा गतिशीलो वा जीवात्मा। कुर्भ्रश्च। उ० १।˜२२। इति डुभृञ् धारणपोषणयोः−कु, द्वित्वं च। विभक्तेर्लुक्। अजानां जीवात्मनां बभ्रुर्भर्ता पोषकः (पिता) रक्षको गुणः (तव) (अश्वः) व्यापको गुणः (यमस्य) अ० १।१४।२। नियामकस्य परमेश्वरस्य (यः) (श्यावः) कॄगॄशॄदृभ्यो वः। उ० १।१५५। इति श्यैङ् गतौ−व। गतिशीलः (तस्य) अश्वस्य (ह) निश्चयेन (अस्ना) असु क्षेपणे, यद्वा अस दीप्तौ−ऋजि। पद्दन्नोमास्। पा० ६।१।६३। इति असृज् शब्दस्य असन् टाविभक्तिः। प्रकाशेन (असि) (उक्षिता) सिञ्चिता प्रवर्धिता ॥

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