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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 115 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 115/ मन्त्र 2
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - विश्वे देवाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - पापनाशन सूक्त
    64

    यदि॒ जाग्र॒द्यदि॒ स्वप॒न्नेन॑ एन॒स्योऽक॑रम्। भू॒तं मा॒ तस्मा॒द्भव्यं॑ च द्रुप॒दादि॑व मुञ्चताम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यदि॑। जाग्र॑त् ।यदि॑। स्वप॑न् । एन॑: । ए॒न॒स्य॑: । अक॑रम् । भू॒तम् । मा॒ । तस्मा॑त् । भव्य॑म् । च॒ । द्रु॒प॒दात्ऽइ॑व । मु॒ञ्च॒ता॒म् ॥११५.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यदि जाग्रद्यदि स्वपन्नेन एनस्योऽकरम्। भूतं मा तस्माद्भव्यं च द्रुपदादिव मुञ्चताम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यदि। जाग्रत् ।यदि। स्वपन् । एन: । एनस्य: । अकरम् । भूतम् । मा । तस्मात् । भव्यम् । च । द्रुपदात्ऽइव । मुञ्चताम् ॥११५.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 115; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    पाप से मुक्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (यदि) जो (जाग्रत्) जागते हुए, (यदि) जो (स्वपन्) सोते हुए (एनस्यः) पापी मैंने (एनः) पाप (अकरम्) किया है। (भूतम्) वर्तमान प्राणीसमूह (च) और (भव्यम्) भविष्यत् प्राणीसमूह (द्रुपदात् इव) काठ के बन्धन के सदृश वर्तमान (तस्मात्) उस [पाप] से (मा) मुझको (मुञ्चताम्) छोड़ावें ॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्य ऐसे अपराध कभी भी न करें, जिस से वर्तमान और भविष्यत् प्राणियों को दुःख होवे ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(यदि) सम्भावनायाम् (जाग्रत्) अ० ६।९६।३। जागरणं प्राप्तः (स्वपन्) निद्रां प्राप्तः (एनः) पापम् (एनस्यः) एनसि साधुः (अकरम्) अहं कृतवान् (भूतम्) लब्धसत्ताकं प्राणिजातम् (भव्यम्) भव्यगेय०। पा० ३।४।६८। इति कर्तरि यत्। भविष्यत्सत्ताकं प्राणिजातम् (द्रुपदात्) अ० ६।६२।३। काष्ठमयपादबन्धनात् (इव) यथा (मुञ्चताम्) उभे भूतभव्ये वियोजयताम् ॥

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    विषय

    एनस्यः

    पदार्थ

    १. [एनः पापं प्रियम् अस्य, एनसि साधुर्वा] (एनस्य:) = अज्ञानवश पाप की प्रवृत्तिवाला मैं (यदि जाग्रत्) = यदि जागता हुआ, (यदि स्वपन्) = यदि सोता हुआ (एन: अकरम्) = पाप कर बैठता हूँ तो (तस्मात्) = उस पाप से (मा) = मुझे (भूतं भव्यं च) = इहलोक और परलोक [अयं वै लोको भूतं, असौ भविष्यत्-तै० ब्रा०३.८.१८.६] इसप्रकार (मुञ्चताम्) = छुड़ाएँ (इव) = जैसे (द्रुपदात्) = पादबन्धनार्थ द्रुम से किसी पशु को छुड़ाते हैं। २. इहलोक व परलोक में प्राप्त होनेवाले पाप के अशुभ परिणाम को सोचता हुआ मैं पाप से मुक्त होने का प्रयत्न करूं।

    भावार्थ

    पापवृत्ति के उत्पन्न हो जाने पर सोते-जागते पाप होने लगते हैं। मैं इन पापों के इहलोक और परलोक में होनेवाले अशुभ परिणामों को सोचूँ और पापवृत्ति से बचूँ।

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    भाषार्थ

    (यदि जाग्रत्) यदि जागते हुए, (यदि स्वपन्) यदि सोते हुए [स्वप्ना वस्था में] (एनस्यः) पापी मैंने (एन:) पाप (अकरम्) किया है, तो (यूयम्) तुम हे विश्वे देवो ! (मा) मुझे (तस्मात्) उस पाप से (च) और (भव्यम्) भविष्य में हो सकने वाले पाप से (मुञ्चताम्) छुड़ाओ (द्रुपदात् इव) जैसे कि काष्ठनिर्मित पादबन्धन से पाद मुक्त हो जाता है।

    टिप्पणी

    [यदि = "एनस्य" को स्मरण नहीं कि उस ने जागते या सोते कोई पाप किया है। परन्तु फिर भी कोई पाप अनजाने हो गया हो, या भविष्य में हो जाय, तो ऐसे पाप से भी मुझे बचाओ। द्रुपदात्= पाप के कारण शासक वर्ग से यदि मेरे पाद में पादबन्धन लग गया हो तो दण्डविधि समाप्त हो जाने पर जैसे पाद बन्धन से पाद छूट जाता है, वैसे मुझे पाप से छुड़ाओ।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Freedom from Sin

    Meaning

    Whatever the sin or evil I have committed or I have wished to commit, whether when awake or asleep, then, the sinner as I am, may all people now present and all those people that will be present in future rescue and redeem me from that sin like one tied to the stake.

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    Translation

    If awake, or asleep, I the sinful commit any sin, may the beings that are and that would be, free me from that just as from a stake.

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    Translation

    If I, the evil-doer commit or desire to commit the wrong when awake or sleeping, keep us away from that, O learned man! in period going to become past, in present and in future like a man who is freed from the pole of binding.

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    Translation

    If I, a sinner, when awake or sleeping, have committed sin, free me there from, as an animal from a stake, from past and from future guilt.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(यदि) सम्भावनायाम् (जाग्रत्) अ० ६।९६।३। जागरणं प्राप्तः (स्वपन्) निद्रां प्राप्तः (एनः) पापम् (एनस्यः) एनसि साधुः (अकरम्) अहं कृतवान् (भूतम्) लब्धसत्ताकं प्राणिजातम् (भव्यम्) भव्यगेय०। पा० ३।४।६८। इति कर्तरि यत्। भविष्यत्सत्ताकं प्राणिजातम् (द्रुपदात्) अ० ६।६२।३। काष्ठमयपादबन्धनात् (इव) यथा (मुञ्चताम्) उभे भूतभव्ये वियोजयताम् ॥

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