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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 116 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 116/ मन्त्र 1
    ऋषिः - जाटिकायन देवता - विवस्वान् छन्दः - जगती सूक्तम् - मधुमदन्न सूक्त
    99

    यद्या॒मं च॒क्रुर्नि॒खन॑न्तो॒ अग्रे॒ कार्षी॑वणा अन्न॒विदो॒ न वि॒द्यया॑। वै॑वस्व॒ते राज॑नि॒ तज्जु॑हो॒म्यथ॑ य॒ज्ञियं॒ मधु॑मदस्तु॒ नोऽन्न॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । या॒मम् । य॒क्रु: । नि॒ऽखन॑न्त: । अग्रे॑ । कार्षी॑वणा: । अ॒न्न॒ऽविद॑: । न । वि॒द्यया॑ । वै॒व॒स्व॒ते । राज॑नि । तत् । जु॒हो॒मि॒ । अथ॑ । य॒ज्ञिय॑म् । मधु॑ऽमत् । अ॒स्तु॒ । न:॒। अन्न॑म् ॥११६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यद्यामं चक्रुर्निखनन्तो अग्रे कार्षीवणा अन्नविदो न विद्यया। वैवस्वते राजनि तज्जुहोम्यथ यज्ञियं मधुमदस्तु नोऽन्नम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । यामम् । यक्रु: । निऽखनन्त: । अग्रे । कार्षीवणा: । अन्नऽविद: । न । विद्यया । वैवस्वते । राजनि । तत् । जुहोमि । अथ । यज्ञियम् । मधुऽमत् । अस्तु । न:। अन्नम् ॥११६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 116; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    पाप से निवृत्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्रे) पहिले (निखनन्तः) [भूमि को] खोदते हुए (कार्षीवणाः) खेती के सेवन करनेवाले किसानों ने (विद्यया) विद्या के साथ (अन्नविदः न) अन्न प्राप्त करनेवाले पुरुषों के समान, (यत् यामम्) जिस नियमसमूह को (चक्रुः) किया है। (तत्) उसी [नियमसमूह] को (वैवस्वते) मनुष्यों के स्वामी (राजनि) राजा परमेश्वर में (जुहोमि) मैं समर्पण करता हूँ, [जिससे] (अथ) फिर (नः) हमारा (अन्नम्) प्राणसाधन अन्न (यज्ञियम्) यज्ञ के योग्य और (मधुमत्) ज्ञानयुक्त (अस्तु) होवे ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे विद्वानों के समान किसान लोग भूमि जोत कर, बीज बोकर अन्न प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार सब मनुष्य सर्वनियन्ता जगदीश्वर का आश्रय लेकर कर्म करते हुए आनन्द भोगें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(यत्) (यामम्) तस्य समूहः। पा० ४।२।३७। इति यम−अण्। नियमानां समूहम् (चक्रुः) कृतवन्तः (निखनन्तः) भूमिं कर्षन्तः (अग्रे) पुरा (कार्षीवणाः) कृषि−ङीप्, कृष्या वनं सेवनं कृषीवणं, तदस्ति येषाम्। तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इत्यण्। कृषिसेविनः। कर्षकाः (अन्नविदः) अन्नप्रापकाः (न) उपमायाम्−निघ० ३।१३। (विद्यया) ज्ञानेन (वैवस्वते) तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इति विवस्वत−अण्। विवस्वन्तो मनुष्याः−निघ० २।३। विवस्वत आदित्याद् विवस्वान् विवासनवान्−निरु० ७।२६। विवस्वतां मनुष्याणां स्वामिनि (राजनि) शासके परमात्मनि (तत्) तथाविधं यामम् (जुहोमि) समर्पयामि (अथ) अनन्तरम् (यज्ञियम्) यज्ञार्हम् (मधुमत्) ज्ञानयुक्तम् (अस्तु) (नः) अस्माकम् (अन्नम्) जीवनसाधनम् ॥

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    विषय

    'यज्ञिय मधुमत्' अन्न

    पदार्थ

    १. (कार्षीवणा:) = कृषिकर्म का सेवन करनेवाले (अन्नविदः न) = अन्न प्राप्त करानेवालों के समान (विद्यया) = कृषिविद्या के अनुसार (निखनन्तः) = भूमि को खोदते हुए, अर्थात् हल आदि चलाकर भूमि में बीजों को बोते हुए अग्ने सर्वप्रथम (यत् याम चकः) = जिस नियम को कर देते हैं, (तत्) = उस नियमित अंश को निर्धारित कर के रूप में दिये जानेवाले भाग को (वैवस्वते राजनि) = प्रजा में ज्ञान का प्रकाश फैलानेवाले राजा में (जुहोमि) = आहुत करता हूँ। २. (अथ) = अब कर के रूप में निधारित अंश को दे देने पर (न:) = हमारे लिए (अन्नम्) = यह अन्न (यज्ञियम्) = संगतिकरण योग्य व पवित्र तथा (मधुमत्) = प्रशस्त माधुर्यवाला (अस्तु) = हो।

    भावार्थ

    हम ज्ञानपूर्वक कृषिकार्य करते हुए राष्ट्र में अन्न की कमी न होने दें। राजा को कर के रूप में उचित अन्नभाग प्राप्त कराके अविशष्ट यज्ञिय, मधुमत् अन्न का सेवन करें।

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    भाषार्थ

    (अन्नविद:) अन्न का लाभ करने वाले (कार्षीवणाः) कृषकों अर्थात् किसानों ने (न विद्यया) न जाने अर्थात् अज्ञानवश (अग्रे) प्रारम्भ में (निखनन्तः) भूमि का विदारण करते हुए (यद्) जो (यामम्) यमसम्बन्धी दण्डनीय कर्म (चक्रुः) किया है तदर्थ (वैवस्वते) विवस्वान् अर्थात् सूर्य के (राजनि) राजा परमेश्वर के निमित्त, (तत्) उस अन्न को (जुहोमि) मैं आहुति पूर्वक समर्पित करता हूं, (अथ) तदनन्तर (यज्ञियम्) यज्ञपूर्वक प्राप्त (नः) हमें (अन्नम्) अन्न (मधुमत्) मधुर (अस्तु) हो जाय।

    टिप्पणी

    [निखनन्तः= खनु अवदारणे (भ्वादिः)। अवदारण= विदारण, हल द्वारा भूमि का विदारण कार्षीवणाः= “कृषि वनन्ति सम्भजन्ते" इति कृषिवणाः, ते एव कार्षीवणाः, स्वार्थे अण्। विवस्वान्= सूर्य, विवासयति रात्र्याः अन्धकारम्। विवासन अर्थात् स्थान से च्युत करना। अन्न पकने पर प्रथम यज्ञ द्वारा अन्नाहुतियां परमेश्वर को समर्पित करनी चाहिये, तब कृषक यम सम्बन्धी दण्ड से मुक्त हो जाते हैं। भूमि का विदारण करते समय भूमिष्ठ कीटों का हनन होता है, हनन पाप कर्म है, अतः दण्डनीय है। परमेश्वर "महायम" है (अथर्व० १३।४।५)]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Our Share Vs Sin

    Meaning

    Whatever practice and course of action ancient farmers, tilling the land for the production of food with knowledge like knowledgeable people, established and left us I follow, and unto the brilliant sovereign render the ruler’s part of the produce. May the food be honey sweet for us all, for the ruler as well as for the producer.

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    Subject

    Vivasvan

    Translation

    What rule the farm-labourers, in days of old, made while ploughing the earth, like those who acquire food with their knowledge, that I offer to the king, the rehabilitator; now may our food be sweet and fit for sacrifice.

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    Translation

    I offer the wealth dug out to the King, the sovereign of the subject according to that rule which the persons digging the wealth (under earth) with knowledge of excavation like the peasants who ‘pay the fix portion of their grain to the men-enjoying with return, make at first and let our grain be sweet and fit for the oblation in yajna.

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    Translation

    Whatever law, the peasants, like experts in agriculture have wisely fixed before digging the earth; according to that rule, I, the landlord, pay revenue to the opulent king. Sweet be our food, conducive to the development of the state.

    Footnote

    The peasants should pay to the Govt., the revenue fixed by law. They should feel no hesitation in its payment, and should try to grow more food for the development of the state.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यत्) (यामम्) तस्य समूहः। पा० ४।२।३७। इति यम−अण्। नियमानां समूहम् (चक्रुः) कृतवन्तः (निखनन्तः) भूमिं कर्षन्तः (अग्रे) पुरा (कार्षीवणाः) कृषि−ङीप्, कृष्या वनं सेवनं कृषीवणं, तदस्ति येषाम्। तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इत्यण्। कृषिसेविनः। कर्षकाः (अन्नविदः) अन्नप्रापकाः (न) उपमायाम्−निघ० ३।१३। (विद्यया) ज्ञानेन (वैवस्वते) तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इति विवस्वत−अण्। विवस्वन्तो मनुष्याः−निघ० २।३। विवस्वत आदित्याद् विवस्वान् विवासनवान्−निरु० ७।२६। विवस्वतां मनुष्याणां स्वामिनि (राजनि) शासके परमात्मनि (तत्) तथाविधं यामम् (जुहोमि) समर्पयामि (अथ) अनन्तरम् (यज्ञियम्) यज्ञार्हम् (मधुमत्) ज्ञानयुक्तम् (अस्तु) (नः) अस्माकम् (अन्नम्) जीवनसाधनम् ॥

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