अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 117/ मन्त्र 1
अ॑प॒मित्य॒मप्र॑तीत्तं॒ यदस्मि॑ य॒मस्य॒ येन॑ ब॒लिना॒ चरा॑मि। इ॒दं तद॑ग्ने अनृ॒णो भ॑वामि॒ त्वं पाशा॑न्वि॒चृतं॑ वेत्थ॒ सर्वा॑न् ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒प॒ऽमित्य॑म् । अप्र॑तीत्तम् । यत् । अस्मि॑ । य॒मस्य॑। येन॑ । ब॒लिना॑ । चरा॑मि । इ॒दम् । तत् । अ॒ग्ने॒ । अ॒नृ॒ण: । भ॒वा॒मि॒ । त्वम् । पाशा॑न् । वि॒ऽचृ॒त॑म् । वे॒त्थ॒ । सर्वा॑न् ॥११७.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अपमित्यमप्रतीत्तं यदस्मि यमस्य येन बलिना चरामि। इदं तदग्ने अनृणो भवामि त्वं पाशान्विचृतं वेत्थ सर्वान् ॥
स्वर रहित पद पाठअपऽमित्यम् । अप्रतीत्तम् । यत् । अस्मि । यमस्य। येन । बलिना । चरामि । इदम् । तत् । अग्ने । अनृण: । भवामि । त्वम् । पाशान् । विऽचृतम् । वेत्थ । सर्वान् ॥११७.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ऋण से छूटने का उपदेश।
पदार्थ
(यमस्य) नियम करनेवाले [ऋणदाता] के (अप्रतीत्तम्) विना चुकाये (यत्) जिस (अपमित्यम्) अपमान के हेतु ऋण को (अस्मि=असामि) मैं ग्रहण करता हूँ, और (येन बलिना) जिस बलवान् के साथ [ऋण लेकर] (चरामि) मैं चेष्टा करता हूँ। (इदम्) अब (तत्) उससे, (अग्ने) हे विद्वान् ! मैं (अनृणः) ऋणरहित (भवामि) हो जाऊँ, (त्वम्) तू (सर्वान्) सब (पाशान्) बन्धनों को (विचृतम्) खोलना (वेत्थ) जानता है ॥१॥
भावार्थ
मनुष्य ज्ञानपूर्वक पुरुषार्थ करके माता पिता आचार्य आदि की सेवा से देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण चुकावें ॥१॥
टिप्पणी
१−(अपमित्यम्) तत्र साधुः। पा० ४।४।९८। इति अपमिति−यत्। अपमितौ अपमाने साधु। अपमानसाधकमृणम् (अप्रतीत्तम्) प्रतिपूर्वाद् ददातेर्निष्ठा। अच उपसर्गात्तः। पा० ७।४।४७। इत्याकारस्य तकारः। दस्ति। ६।३।१२४। उपसर्गस्य दीर्घः। अप्रत्यर्पितम् (यत्) (अस्मि) अस ग्रहणे भ्वादिः शपो लुक् छान्दसः। असामि। गृह्णामि (यमस्य) प्रवर्ते (इदम्) इदानीम् (तत्) तस्माद् ऋणात् (अग्ने) विद्वन् (अनृणः) ऋणरहितः (भवामि) (त्वम्) (पाशान्) बन्धान् (विचृतम्) शकि णमुल्कमुलौ। पा० ३।४।१२। इति विचृती हिंसाग्रन्थनयोः−बाहुलकात् कमुल् तुमर्थे। विचर्तितुं मोचयितुम् (वेत्थ) जानासि (सर्वान्) ॥
विषय
'ऋण' उतारना व 'कर' देना
पदार्थ
१. (अपमित्यम्) = [अपमातव्यं, अपाकर्तव्यम्] (अपाकर्तव्य) = फिर लौटाने योग्य जो धनादि ऋणरूप में उत्तमर्ण से लिया है, परन्तु (अप्रतीत्तम्) = फिर उसे लौटाया नहीं है, ऐसा (यत्) = जो ऋण मैं (अस्मि) = [असामि-अस-ग्रहणे] ग्रहण करता हूँ और (यमस्य) = उस नियामक राजा के (येन बलिना) = [भागधेयः करो बलि:] जिस देय कर से (चरामि) = स्वयं अपना भोजन करता हूँ-कर न देकर खा लेता हूँ. हे (अग्ने) = प्रभो! मैं आपके अनुग्रह से (इदम्) = अब (अनृण:) = उस ऋण से ऋणरहित (भवामि) = होता हूँ। २. हे प्रभो! (त्वम्) = आप उन (सर्वान्) = सब (पाशान्) = ऋण के कारण होनेवाले पाशों को-बन्धनों को (विचूतम्) = काटना (वेत्थ) = जानते हो। आप मुझे ऋण से अनृण होने की प्रेरणा व क्षमता देते हुए ऋणरहित करते हो।
भावार्थ
हम उत्तमर्ण से लिये गये ऋण को चुकाने का पूरा ध्यान रखें तथा राजा के लिए देय कर अवश्य दें।
भाषार्थ
(अपमित्यम्) वापिस कर देने योग्य (अप्रतीत्तम्) परन्तु जिसे वापिस नहीं दिया [ऐसे ऋण वाला] (यदस्मि) जो मैं हूं, (येन बलिना) और जिस बलवान् ऋण के कारण (यमस्य) यम के वश में हुआ (चरामि) मैं विचरता हूं, (अग्ने) हे अग्नि नामक परमेश्वर ! (इदम् तत्) यह वह (अनृणः भवामि) ऋण रहित में होता हूं [ऋण प्रदान करता हूं], हे अग्नि! (त्वम्) तू (सर्वान् पाशान्) सब पाशों को (विचृतम्) काट देना (वेत्थ) जानता है।
टिप्पणी
[ऋण है अन्नरूपी ऋण, धान्य का ऋण (मन्त्र २)। अपमित्यम्= अप + मेङ् प्रणिदाने (भ्वादिः) क्यप् छन्दसः। अप्रतीत्तम्= अ + प्रति + दा + क्तः। धातोः तकारादेशः (अच उपसर्गातः, अष्टा० ७।४।४७); उपसर्गस्य दीर्घः ("दस्ति" अष्टा० ६/३/१२४)। ऋण बली है बलवान् है। इसे वापिस न करने पर मुकदमें हो जाते, और उत्तमण द्वारा लड़ाई तथा मार-पीट हो जाती है।]
विषय
ऋण रहित होने का उपदेश।
भावार्थ
ऋण परिशोध का उपदेश करते हैं—(यद्) जिस (अपमित्यम्) अपमान योग्य या प्रदान करने योग्य (अप्रतीत्तं) न चुकाये हुए धन को (अस्मि) लेता हूं और (यमस्य) नियन्ता राजा के राज्य में (येन) जिस (बलिना) बलि, कर से (चरामि) मैं स्वयं अपना भोजन प्राप्त करूं (इदं तत्) उसको मैं यह हे (अग्ने) राजन् ! तेरे समक्ष ही चुका दूं और इस प्रकार उससे मैं (अनृणः) ऋणरहित (भवामि) हो जाऊँ। हे अग्ने ! राजन् ! (त्वं) तू ही (सर्वान् पाशान्) सब बन्धनों को (विचृतम्) नाना प्रकार से बांधना और खोलना भी (वेत्थ) जानता है। राजा की साक्षी में जिसका ऋण देना हो दो और राजा का कर भी चुकाओ, नहीं तो वह न चुकाने वाले कर्जदार को नाना प्रकार के दण्ड देगा।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अनृणकामः कौशिक ऋषिः। अग्नि र्देवता। त्रिष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Debt of Obligation
Meaning
The debt of obligation I owe is not paid. I am a debtor to Yama, lord of ultimate law. However, I walk with the mighty, and that mighty, O Agni, lord of light and leadership, you are. You know all the rules of freedom from the bonds. Enlighten me that I may be free from the bonds of the debt of obligation.
Subject
Agnih
Translation
A borrowed loan and not payed back yet, that am I, who move about bound by the mighty controller. O adorable Lord, now may I be free from that debt (anr no bhavami). You know how to unfasten all the nooses.
Translation
O learned person! you know how to rend all the bonds asunder. By your teaching may I be free from all the debt which is insulting and still remains owing and the assessment payable to the ruler whereby I support me,
Translation
I am a debtor as I have not paid the debt which I ought to have paid, and have fallen into the clutches of the creditor, due to heavy debt. May I now be free from that debt by its payment. O learned person, thou knowest how to rend all bonds asunder.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१−(अपमित्यम्) तत्र साधुः। पा० ४।४।९८। इति अपमिति−यत्। अपमितौ अपमाने साधु। अपमानसाधकमृणम् (अप्रतीत्तम्) प्रतिपूर्वाद् ददातेर्निष्ठा। अच उपसर्गात्तः। पा० ७।४।४७। इत्याकारस्य तकारः। दस्ति। ६।३।१२४। उपसर्गस्य दीर्घः। अप्रत्यर्पितम् (यत्) (अस्मि) अस ग्रहणे भ्वादिः शपो लुक् छान्दसः। असामि। गृह्णामि (यमस्य) प्रवर्ते (इदम्) इदानीम् (तत्) तस्माद् ऋणात् (अग्ने) विद्वन् (अनृणः) ऋणरहितः (भवामि) (त्वम्) (पाशान्) बन्धान् (विचृतम्) शकि णमुल्कमुलौ। पा० ३।४।१२। इति विचृती हिंसाग्रन्थनयोः−बाहुलकात् कमुल् तुमर्थे। विचर्तितुं मोचयितुम् (वेत्थ) जानासि (सर्वान्) ॥
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