अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 134 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 134/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शुक्र देवता - वज्रः छन्दः - परानुष्टुप्त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (अयम्) यह (वज्रः) वज्र [दण्ड] (ऋतस्य) सत्य धर्म की (तर्पयताम्) तृप्ति करे, (अस्य) इस [शत्रु] के (राष्ट्रम्) राज्य को (अव=अवहत्य) नाश करके [उसके] (जीवितम्) जीवन को (अप हन्तु) नाश कर देवे, (ग्रीवाः) गले की नाड़ियों को (शृणातु) काटे और (उष्णिहा) गुद्दी की नाड़ियों को (प्रशृणातु) तोड़ डाले, (इव) जैसे (शचीपतिः) कर्म्मों वा बुद्धियों का पति [मनुष्य] (वृत्रस्य) अपने शत्रु के [ग्रीव आदि] को ॥१॥

    भावार्थ -

    राजा यथावत् शासन से शत्रुओं को नाश करके प्रजापालन करे ॥१॥

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