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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 17 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - गर्भदृंहणम्, पृथिवी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - गर्भदृंहण सूक्त
    207

    यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही भू॒तानां॒ गर्भ॑माद॒धे। ए॒वा ते॑ ध्रियतां॒ गर्भो॒ अनु॒ सूतुं॒ सवि॑तवे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । इ॒यम् । पृ॒थि॒वी । म॒ही । भू॒ताना॑म्। गर्भ॑म् । आ॒ऽद॒धे ।ए॒व । ते॒ । ध्रि॒य॒ता॒म् । गर्भ॑: । अनु॑ । सूतु॑म् । सवि॑तवे ॥१७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे। एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतुं सवितवे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । इयम् । पृथिवी । मही । भूतानाम्। गर्भम् । आऽदधे ।एव । ते । ध्रियताम् । गर्भ: । अनु । सूतुम् । सवितवे ॥१७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 17; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    गर्भाधान का उपदेश।

    पदार्थ

    (यथा) जैसे (इयम्) इस (मही) बड़ी (पृथिवी) पृथिवी ने (भूतानाम्) पञ्च महाभूतों के (गर्भम्) गर्भ को (आदधे) यथावत् धारण किया है, (एव) वैसे ही (ते) (गर्भः) गर्भ (सूतुम्) संतान को (अनु) अनुकूलता से (सवितवे) उत्पन्न करने के लिये (ध्रियताम्) स्थिर होवे ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे पृथिवी बीज को अपने में धारण करके अनुकूल समय पर उत्पन्न करती है, वैसे ही प्रयत्न किया जावे कि संतान गर्भ से पूरे दिनों में उत्पन्न होकर बली और पराक्रमी होवे, ऐसा ही भावार्थ आगे समझो ॥१॥ यह सूक्त स्वामी दयानन्द कृत संस्कारविधि में गर्भाधानप्रकरण में आया है ॥

    टिप्पणी

    १−(यथा) येन प्रकारेण (इयम्) परिदृश्यमाना (पृथिवी) (मही) विशाला (भूतानाम्) पृथिव्यादिपञ्चभूतानाम् (गर्भम्) अ० ३।१०।१२। स्तुत्यं बालकम् (आदधे) सम्यम् धृतवती (एव) एवम् (ते) तव (ध्रियताम्) गर्भाशये धृतः स्थिरो भवतु (गर्भः) (अनु) आनुकूल्येन (सूतुम्) पः किच्च। उ० १।७१। इति षूङ् प्राणिगर्भविमोचने−तुन् कित्। सूनुं संतानम् (सवितवे) षूङ्−तुमर्थे तवे प्रत्ययः। प्रसवितुं प्रजनयितुम् ॥

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    विषय

    अनुसूतं सवितवे

    पदार्थ

    १. (यथा) = जैसे (इयम्) = यह (मही पृथिवी) = विशाल पृथिवी (भूतानाम्) = सब प्राणियों के (गर्भम्) = मूलभूत बीज को (आदधे) = धारण करती है (एव) = इसीप्रकार हे प्रियतमे! (ते) = तेरा (गर्भ:) = गर्भ घियताम् धारण किया जाए। यह गर्भ (अनु सूतं सवितवे) = पुत्र को अनुकूल समय पर जन्म देने के लिए हो। २.( यथा इयं मही पृथिबी) = जिस प्रकार यह विशाल पृथिवी इमान् वनस्पतीन् दाधार-इन वनस्पतियों को धारण करती है, (एव) = इसीप्रकार ते (गर्भ ध्रियताम्) = तेरा यह गर्भ धारण किया जाए और (अनु सूतुं सवितवे) = पुत्र को अनुकूल समय पर जन्म देनेवाला हो। ३. (यथा इयं मही पृथिवी) = जैसे यह विशाल पृथिवी (पर्वतान् गिरीन्) = इन बड़े पर्वतों और छोटी पहाड़ियों को दाधार-धारण करती है। इसीप्रकार तेरा गर्भ धारण किया जाए और वह अनुकूल समय पर सन्तान को जन्म देनेवाला हो। ४. (यथा इयं मही पृथिवी) = जैसे यह विशाल पृथिवी (विष्ठितं जगत् दाधार) = नाना प्रकार से विभक्त-व्यवस्थित चराचर जगत् को धारण करती है उसी प्रकार तेरा यह गर्भ धारण किया जाए और वह अनुकूल समय पर सन्तान को जन्म देनेवाला हो।

    भावार्थ

    माता पृथिवी के समान है। पृथिवी की भाँति ही सब भूतों के गर्भ को धारण करती है और अनुकूल समय पर सन्तान को जन्म देती है।

    विशेष

    अथर्वा ही अगले सूक्त का ऋषि है। इसमें यह 'ईर्ष्या' को एक महान् दोष के रूप में देखता है। माता में ईर्ष्या की वृत्ति गर्भस्थ बालक की मृत्यु का भी कारण बन जाती है, अत: ईर्ष्या के त्याग का उपदेश करते हैं |

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    भाषार्थ

    (यथा, इयम्, मही पृथिवी) जैसे यह महती या महिमा वाली पृथिवी (भूतानाम्) भूतों की उत्पत्ति के लिये (गर्भ आदधे) गर्भाधान करती है, (एव) इसी प्रकार [हे पत्नी] (ते) तेरा (गर्भः) गर्भ ( ध्रियताम्) धृत हो, स्थित हो, (अनुसूतुम्) उत्पत्ति विधि के अनुसार (सवितवे) पैदा होने के लिये।

    टिप्पणी

    ["भूत" शब्द के दो अर्थ हैं, भूत अर्थात् प्राणी, जैसे पञ्च महायज्ञों में "भूतयज्ञः" तथा पञ्च महाभूतों में "भूत" शब्द। पृथिवी जब सूर्य से फेट कर अलग हुई तव इस पर कोई प्राणी तथा कालान्तर में प्राणी पृथिवी के गर्भ से ही पैदा हुए। इसी प्रकार पृथिवी सम्बन्धी पञ्च महाभूत भी पृथिवी के गर्भ से पैदा हुए। पार्थिव पदार्थ अप [जल], तेज [पार्थिवाग्नि], तथा वायुमण्डल भी पृथिवी से ही पैदा हुए]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Garbhadrnhanam

    Meaning

    Just as this great mother earth bears the seed of life forms, so may your womb bear the seed of life to mature and deliver the child.

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    Subject

    Development of Garbha (Embryo)

    Translation

    As this vast earth receives the germ of would-be beings, so may your embryo form and develop for birth under favourable conditions.

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    Translation

    Even as this mighty earth conceives the seed of all the beings so may the germs of life be laid in you, O wife! that you may deliver a child.

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    Translation

    Just as this mighty Earth conceives the germs of all the things that be, so may the germ of life be laid in thee that thou mayst bear a son.

    Footnote

    ‘Thee’ refers to wife.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यथा) येन प्रकारेण (इयम्) परिदृश्यमाना (पृथिवी) (मही) विशाला (भूतानाम्) पृथिव्यादिपञ्चभूतानाम् (गर्भम्) अ० ३।१०।१२। स्तुत्यं बालकम् (आदधे) सम्यम् धृतवती (एव) एवम् (ते) तव (ध्रियताम्) गर्भाशये धृतः स्थिरो भवतु (गर्भः) (अनु) आनुकूल्येन (सूतुम्) पः किच्च। उ० १।७१। इति षूङ् प्राणिगर्भविमोचने−तुन् कित्। सूनुं संतानम् (सवितवे) षूङ्−तुमर्थे तवे प्रत्ययः। प्रसवितुं प्रजनयितुम् ॥

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