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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 23 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 23/ मन्त्र 3
    ऋषि: - शन्ताति देवता - आपः छन्दः - परोष्णिक् सूक्तम् - अपांभैषज्य सूक्त
    37

    दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे कर्म॑ कृण्वन्तु॒ मानु॑षाः। शं नो॑ भवन्त्व॒प ओष॑धीः शि॒वाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दे॒वस्य॑ । स॒वि॒तु: । स॒वे । कर्म॑ । कृ॒ण्व॒न्तु॒ । मानु॑षा: । शम् । न: । भ॒व॒न्तु॒ । अप: । ओष॑धी: । शिवा: ॥२३.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    देवस्य सवितुः सवे कर्म कृण्वन्तु मानुषाः। शं नो भवन्त्वप ओषधीः शिवाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    देवस्य । सवितु: । सवे । कर्म । कृण्वन्तु । मानुषा: । शम् । न: । भवन्तु । अप: । ओषधी: । शिवा: ॥२३.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 23; मन्त्र » 3
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    पदार्थ -
    (मानुषाः) सब मनुष्य (देवस्य) प्रकाशमय (सवितुः) सर्वप्रेरक परमेश्वर के (सवे) शासन में (कर्म) कर्म (कृण्वन्तु) करते रहें। (शिवाः) कल्याणकारक (ओषधीः=०−धयः) अन्न आदि पदार्थ (शम्) शान्ति से (नः) हमारे (अपः) कर्म को (भवन्तु) प्राप्त हों ॥३॥

    भावार्थ - मनुष्य वेदविहित कर्मों को करते हुए पुरुषार्थपूर्वक अन्न आदि पदार्थों को भोगें ॥३॥


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    Meaning -
    In this world of the creation of divine Savita, let people do their karma in the cosmic perspective, (without being prisoners of the ego in the personal situation), and may all streams of water and all herbs and trees, all streams of the existential flow and all icons of light and wisdom be good and blissful to us across the world.


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