अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 25 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 25/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शुनः शेप देवता - मन्याविनाशनम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - मन्याविनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (पञ्च) पाँच (च च) और (पञ्चाशत्) पचास (याः) जो पीड़ायें (मन्याः अभि) गले की नसों में (संयन्ति) सब ओर से व्याप्त होती हैं। (ताः सर्वाः) वे सब (इतः) यहाँ से (नश्यन्तु) नष्ट हो जावें, (इव) जैसे (अपचिताम्) निर्बलों के (वाकाः) वचन [नष्ट हो जाते हैं] ॥१॥

    भावार्थ -

    जैसे सद्वैद्य गले के गण्डमाला आदि रोगों को नष्ट करता है, इसी प्रकार मनुष्य अपने दोषों का निवारण करे ॥१॥

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