अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 44 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 44/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विश्वामित्र देवता - वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रोगनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (द्यौः) सूर्य लोक (अस्थात्) ठहरा है, (पृथिवी) पृथिवी (अस्थात्) ठहरी है, (इदम्) यह (विश्वम्) सब (जगत्) जगत् (अस्थात्) ठहरा है। (ऊर्ध्वस्वप्नाः) ऊपर को मुख करके सोनेवाले (वृक्षाः) वृक्ष (अस्थुः) ठहरे हुए हैं, [ऐसे ही] (तव) तेरा (अयम्) यह (रोगः) रोग (तिष्ठात्) ठहर जावे [और न बढ़े] ॥१॥

    भावार्थ -

    जैसे संसार के सब लोक परस्पर धारण और आकर्षण द्वारा अपनी-अपनी कक्षा और परिधि में स्थित हैं, वैसे ही मनुष्य अपने दोषों को नियम में रक्खे ॥१॥

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