Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 49 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 49/ मन्त्र 1
    ऋषि: - गार्ग्य देवता - अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अग्निस्तवन सूक्त
    14

    न॒हि ते॑ अग्ने त॒न्वः॑ क्रू॒रमा॒नंश॒ मर्त्यः॑। क॒पिर्ब॑भस्ति॒ तेज॑नं॒ स्वं ज॒रायु॒ गौरि॑व ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न॒हि । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । त॒न्व᳡: । क्रू॒रम् । आ॒नंश॑ । मर्त्य॑: । क॒पि: । ब॒भ॒स्ति॒ । तेज॑नम् । स्वम् । ज॒रायु॑ । गौ:ऽइ॑व ॥४९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नहि ते अग्ने तन्वः क्रूरमानंश मर्त्यः। कपिर्बभस्ति तेजनं स्वं जरायु गौरिव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नहि । ते । अग्ने । तन्व: । क्रूरम् । आनंश । मर्त्य: । कपि: । बभस्ति । तेजनम् । स्वम् । जरायु । गौ:ऽइव ॥४९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 49; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! (मर्त्यः) मनुष्य ने (ते) तेरे (तन्वः) स्वरूप की (क्रूरम्) क्रूरता को (नहि) नहीं (आनंश) पाया है। (कपिः) कँपानेवाले आप (तेजनम्) प्रकाशमान सूर्यमण्डल को (बभस्ति) खा जाते हैं (इव) जैसे (गौः) गौ (स्वम्) अपनी (जरायु) जरायु को [खा लेती है] ॥१॥

    भावार्थ - मनुष्य परमेश्वर की अनन्त शक्ति को नहीं जान सकता है। परमेश्वर ही इस संसार को बना कर फिर अपने में प्रविष्ट कर लेता है, जैसे गौ बच्चा उत्पन्न होने के पीछे अपने पेट से निकली झिल्ली को आप निगल जाती है ॥१॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    This sukta should better be read with Gita, chapter 11, especially verses 24-32. O lord self-refulgent, Agni, no mortal man can comprehend the inexorable dynamics of your creative manifestation in the universe—your spirit in form through the medium of Prakrti. The Sun devours its own blaze of light. Nature consumes its own creation, like the cow eating up its own embryo’s outer skin.


    Bhashya Acknowledgment
    Top