अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 50 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 50/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - अश्विनौ छन्दः - विराड्जगती सूक्तम् - अभययाचना सूक्त
    पदार्थ -

    (अश्विना) हे कामों मे व्याप्त रहनेवाले स्त्री-पुरुषो ! (तर्दम्) हिंसा करनेवाले कौवे आदि को, (समङ्कम्) पृथिवी में अङ्क करनेवाले शूकर आदि को और (प्राखुम्) कुतरनेवाले चूहे आदि को (हतम्) तुम मारो, (शिरः) उनका शिर (छिन्तम्) काटो और (पृष्टीः) पसलियाँ (अपि) भी (शृणीतम्) तोड़ो। वे (यवान्) यवादि अन्नों को (न इत्) कभी न (अदान्) खावें, (मुखम्) उनका मुख (अपि) भी (नह्यतम्) तुम बाँधो, (अथ) और (धान्याय) धान्य के लिये (अभयम्) अभय (कृणुतम्) करो ॥१॥

    भावार्थ -

    जैसे किसान लोग हानिकारक पक्षी पशु आदि से खेती की रक्षा करके धान्य प्राप्त करते हैं, वैसे ही विद्वान् स्त्री-पुरुष काम क्रोध आदि शत्रुओं से अपनी रक्षा करके सुख भोगें ॥१॥

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