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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 50 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 50/ मन्त्र 2
    ऋषि: - अथर्वा देवता - अश्विनौ छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - अभययाचना सूक्त
    24

    तर्द॒ है पत॑ङ्ग॒ है जभ्य॒ हा उप॑क्वस। ब्र॒ह्मेवासं॑स्थितं ह॒विरन॑दन्त इ॒मान्यवा॒नहिं॑सन्तो अ॒पोदि॑त ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तर्द॑ । है । पत॑ङ्ग । है । जभ्य॑ । है । उप॑ऽक्वस । ब्र॒ह्माऽइ॑व । अस॑म्ऽस्थितम् । ह॒वि: । अन॑दन्त: । इ॒मान् । यवा॑न् । अहि॑सन्त: । अ॒प॒ऽउदि॑त ॥५०.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तर्द है पतङ्ग है जभ्य हा उपक्वस। ब्रह्मेवासंस्थितं हविरनदन्त इमान्यवानहिंसन्तो अपोदित ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तर्द । है । पतङ्ग । है । जभ्य । है । उपऽक्वस । ब्रह्माऽइव । असम्ऽस्थितम् । हवि: । अनदन्त: । इमान् । यवान् । अहिसन्त: । अपऽउदित ॥५०.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 50; मन्त्र » 2
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    पदार्थ -
    (है) हे (तर्द) हे हिंसक काक आदि ! (है) हे (पतङ्ग) फुदकनेवाले टिड्डी आदि ! (हा) हे (जभ्य) वधयोग्य (उपक्वस) भूमि पर रेंगनेवाले कीड़े ! (ब्रह्मा इव) विद्वान् पुरुष ब्रह्मा के समान (असंस्थितम्) बिना संस्कार किये हुए (हविः) अन्न को, (इमाम्) इन् (यवान्) यव आदि अन्न को (अनदन्तः) न खाते हुए और (अहिंसन्तः) न तोड़ते हुए (अपोदित) उड़ जाओ ॥२॥

    भावार्थ - जैसे विद्वान् पुरुष कुपथ्य अन्न को छोड़कर चला जाता है, इसी प्रकार हिंसक पशु आदि जवादि अन्नों के खेतों को छोड़कर चले जावें ॥२॥


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    Meaning -
    O damaging bird, O creeping insect, dangerous, worth elimination, just as the priest leaves aside the havi not properly prepared, similarly you also leave the barley fields undamaged and go away.


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